* नरेंद्र मोदी की कूटनीति: युद्धों के दौर में संतुलन की राजनीति
India Diplomacy : आज की दुनिया कई मोर्चों पर बंटी हुई है—कहीं युद्ध, कहीं प्रतिबंध, कहीं ऊर्जा संकट। लेकिन इसी दौर में एक ऐसा देश भी था जो हर धड़े से संवाद करता रहा, हर संकट में संतुलन बनाता रहा।
आज से तीन दशक बाद, जब ऑक्सफोर्ड और हार्वर्ड जैसे विश्वविद्यालयों में कूटनीति (Diplomacy) का इतिहास पढ़ाया जाएगा, तब एक अध्याय सबसे अलग और चमकदार होगा। वह अध्याय होगा— “The Era of Unstoppable India.” वह दौर जब दुनिया गुटों में बंटी थी, लेकिन भारत अपना रास्ता खुद बना रहा था। और उस देश के नेतृत्व में थे भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। इतिहास जब इस दौर को याद करेगा, तो शायद इसे “भारतीय कूटनीति का स्वर्ण काल” कहा जाएगा।
स्ट्रेस ऑफ हॉर्मुज: दुश्मनों के बीच से निकलता भारतीय तिरंगा
जहाँ एक ओर खाड़ी के देश युद्ध की आग में झुलस रहे थे और समुद्री रास्ते बंद थे, वहाँ भारत की साख ऐसी थी कि…
ईरान और अरब देशों के बीच तनाव के बावजूद भारतीय जहाजों को ‘सुरक्षित रास्ता’ (Safe Passage) मिला। यह कूटनीति नहीं, बल्कि उस भरोसे की जीत थी जिसे 2014 के बाद सींचा गया।
एक तरफ भारत Saudi Arabia, United Arab Emirates, Kuwait जैसे खाड़ी देशों से ऊर्जा खरीद रहा था।
दूसरी तरफ Iran के साथ संवाद बनाए रखते हुए भारतीय जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित की गई।
रूस-यूक्रेन युद्ध: जब भारतीयों की सुरक्षा बनी प्राथमिकता
‘ऑपरेशन गंगा’: जब युद्ध के मैदान में गूँजा ‘वंदे मातरम’
रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच जब आसमान से आग बरस रही थी, तब पूरी दुनिया ने एक करिश्मा देखा…
एक नेता के फोन कॉल पर 6 घंटे के लिए युद्ध रुक गया।
तिरंगा हाथ में लेकर निकले छात्र न केवल सुरक्षित रहे, बल्कि विदेशी नागरिकों ने भी अपनी जान बचाने के लिए भारतीय ध्वज का सहारा लिया।
प्रतिबंधों को चुनौती: ‘इंडिया फर्स्ट’ का संकल्प
जब पश्चिम ने रूस पर पाबंदियां लगाईं, तब भारत ने दुनिया को साफ संदेश दिया कि हमारी प्राथमिकता हमारे नागरिक हैं।
रूस से सस्ता तेल खरीदा गया ताकि आम भारतीय की जेब पर बोझ न पड़े।
वही तेल यूरोप को बेचकर भारत ने वैश्विक ऊर्जा संकट को संभाला। इसे ‘रिअलपोलिटिक’ (Realpolitik) का मास्टरस्ट्रोक कहा जाता है।
विरोधाभासों का मिलन: इजराइल और फिलिस्तीन
दुनिया के इतिहास में शायद ही कोई ऐसा नेता हो जिसे इजराइल और फिलिस्तीन, दोनों ने अपने ‘सर्वोच्च नागरिक सम्मान’ से नवाजा हो। यह भारत की उस नीति का प्रमाण है जहाँ हम ‘पक्ष’ नहीं, ‘न्याय’ और ‘शांति’ के साथ खड़े होते हैं।
ग्लोबल ब्रिज: महाशक्तियों के बीच का सेतु
एक तरफ पुतिन से गले मिलना और दूसरी तरफ व्हाइट हाउस में भव्य स्वागत—यह संतुलन केवल मोदी युग में संभव हुआ।
* रूस से सामरिक सुरक्षा।
* अमेरिका से अत्याधुनिक तकनीक।
* चीन के साथ व्यापारिक संतुलन।
2014-2034 – भारत का पुनरुत्थान
यह 20 वर्षों का कालखंड (2014-2034) केवल एक शासनकाल नहीं, बल्कि भारत के ‘विश्वगुरु’ बनने की नींव के रूप में याद किया जाएगा। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने साबित किया कि बिना किसी के आगे झुके, सबको साथ लेकर कैसे चला जाता है।
अगर आने वाले 25–30 वर्षों बाद इतिहासकार इस दौर का अध्ययन करेंगे, तो वे पाएंगे कि एक ऐसा समय था जब दुनिया ध्रुवों में बंट रही थी—लेकिन भारत संवाद का पुल बन रहा था।
