Iran Israel War : मिडिल ईस्ट की महाजंग: क्या बैकफुट पर हैं ट्रंप? नेतन्याहू की ‘ना’ और ईरान के ‘क्लस्टर प्रहार’ ने बदला खेल

Bindash Bol

Iran Israel War : मध्य पूर्व (Middle East) इस वक्त बारूद के ऐसे ढेर पर है, जिसकी चिंगारी पूरी दुनिया को झुलसाने की ताकत रखती है। एक तरफ वाइट हाउस के गलियारों में रणनीति बदल रही है, तो दूसरी तरफ तेल अवीव की सड़कों पर क्लस्टर बमों का शोर है। सवाल यह है कि क्या दुनिया का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति—डोनाल्ड ट्रंप—इस चक्रव्यूह में फंस गए हैं?

1. ट्रंप का ‘यू-टर्न’: डर, रणनीति या मजबूरी?

​अभी कुछ दिन पहले तक ईरान को 48 घंटे का अल्टीमेटम देने वाले और उसे नक्शे से मिटाने की बात करने वाले ट्रंप के सुर अचानक बदल गए हैं।

अघोषित युद्धविराम: 23 मार्च को ट्रंप ने ईरान के पर 5 दिनों तक हमला न करने का ऐलान किया।

बदला हुआ बयान: ट्रंप अब कह रहे हैं कि “ईरान शांति चाहता है।” विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव ट्रंप की किसी कूटनीतिक जीत का नहीं, बल्कि उन पर पड़ रहे चौतरफा अंतरराष्ट्रीय दबाव का परिणाम है।

2. नेतन्याहू की बगावत: “फैसला अमेरिका नहीं, इजरायल करेगा”

​ट्रंप के लिए सबसे बड़ा झटका उनके सबसे करीबी सहयोगी बेंजामिन नेतन्याहू की ओर से आया है। नेतन्याहू ने स्पष्ट कर दिया है कि इस युद्ध की समाप्ति की स्क्रिप्ट वॉशिंगटन में नहीं, बल्कि यरूशलेम में लिखी जाएगी।

​”इस युद्ध को कब और कैसे खत्म करना है, इसका निर्णय अमेरिका नहीं लेगा। युद्ध तब समाप्त होगा जब इजरायल इसकी घोषणा करेगा।” — बेंजामिन नेतन्याहू

​यह बयान अंतरराष्ट्रीय मंच पर ट्रंप की ‘धमक’ को सीधी चुनौती है और उन्हें शक्तिहीन साबित करने की एक कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।

3. तेल अवीव पर ‘कयामत’ की रात

24 मार्च को ईरान ने अपनी सैन्य क्षमता का ट्रेलर दिखाते हुए इजरायल की राजधानी Tel Aviv पर भीषण हमला किया।

* ​हथियार: 100-100 किलो के क्लस्टर बमों का इस्तेमाल।

* ​असर: रिहायशी इलाकों में तबाही, आसमान में धुआं और हर तरफ मलबे का ढेर।

* ​संदेश: ईरान ने साफ कर दिया है कि वह ट्रंप की ‘सॉफ्ट डिप्लोमेसी’ या इजरायल की सैन्य ताकत से डरकर पीछे हटने वाला नहीं है।

4. ट्रंप के सामने खड़ी ‘चार दीवारों’ की चुनौती

​डोनाल्ड ट्रंप इस समय एक ऐसे चौराहे पर हैं जहाँ हर रास्ता कांटों भरा है….

1.अकेला युद्धविराम: ट्रंप शांति की बात कर रहे हैं, लेकिन जमीन पर जंग और तेज हो रही है।

2.सीधा टकराव: ईरान से सीधा युद्ध अमेरिका के लिए ‘वियतनाम’ जैसा दलदल साबित हो सकता है।

3.विद्रोही सहयोगी: इजरायल और नाटो देश अब अमेरिका के हर आदेश को मानने को तैयार नहीं हैं।

4.घरेलू मोर्च: अमेरिका के भीतर युद्ध विरोधी प्रदर्शन और गिरती अर्थव्यवस्था ट्रंप की ‘डीलमेकर’ वाली छवि को धूमिल कर रही है।

5. खाड़ी देशों और तेल की कीमतों का ‘पावर प्ले’

​ट्रंप के अचानक नरम पड़ने के पीछे कतर, बहरीन और यूएई जैसे देशों की सख्त चेतावनी है। इन देशों ने अमेरिका को आगाह किया है कि अगर ईरान के सिविलियन ठिकानों पर हमला हुआ, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगी।

* ​तेल का गणित: जैसे ही ट्रंप ने 5 दिन के ‘हॉल्ट’ की घोषणा की, कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट आई। यह साबित करता है कि अमेरिकी राष्ट्रपति पर ‘आम आदमी की जेब’ और वैश्विक बाजार का भारी दबाव है।

6. मध्यस्थता की कोशिशें और थकी हुई अमेरिकी सेना

​पाकिस्तान, तुर्की, मिस्र और ओमान पर्दे के पीछे से 15 सूत्रीय शांति प्रस्ताव पर काम कर रहे हैं। लेकिन ईरान का रुख सख्त है—”जंग खत्म होगी, तो हमारी शर्तों पर।” दूसरी ओर, रिपोर्ट्स बताती हैं कि अमेरिकी नौसेना और हथियारों का भंडार अब थकान और कमी के दौर से गुजर रहा है। लंबे समय तक चलने वाली यह जंग अमेरिका के लिए सैन्य और आर्थिक, दोनों मोर्चों पर आत्मघाती हो सकती है।

क्या डोनाल्ड ट्रंप इस महासंकट से कोई ‘ग्रैंड डील’ निकाल पाएंगे, या फिर नेतन्याहू और ईरान की जिद उन्हें इतिहास के सबसे कमजोर अमेरिकी राष्ट्रपति की श्रेणी में खड़ा कर देगी? अगले 48 घंटे पूरी दुनिया की दिशा तय करेंगे।

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