Bengal Election 2026 : अपनी अपनी डफली, अपना अपना राग

Nishikant Thakur

Bengal Election 2026 : अप्रैल-मई 2026 तक देश के चार राज्यों सहित एक केंद्र शासित प्रदेश में विधानसभा के चुनाव संपन्न हो जाएंगे। चुनाव जीतने के लिए सभी पार्टियां इन राज्यों के मतदाताओं को मोहने का अभियान चला रही हैं। मतदाताओं को मोहने का यह अभियान चाहे भक्ति के नाम पर हो या हिंदू-मुसलमान के नाम पर या फिर स्वहित के लिए चाहे जिस तरह जनता आकर्षित हो, उसके लिए हरसंभव कोशिश में जी—जान से जुटे हैं। सबका उद्देश्य यही है कि किस प्रकार सत्ता हासिल किया जाए। इन राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेश में आज सबसे ज्यादा चर्चा जिस राज्य की है, वह पश्चिम बंगाल है, जहां तृणमूल कांग्रेस की सरकार है और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पिछले पंद्रह वर्षों से सत्ता में जमी हुई हैं। इस सरकार को गिराने के लिए भारतीय जनता पार्टी पूरा दमखम लगाकर प्रचार में जुटी है। धीरे—धीरे सभी चुनावी विश्लेषक अपने अपने हिसाब से इसका विश्लेषण करेंगे, क्योंकि आज देश में जो सबसे चर्चित चुनावी राज्य पश्चिम बंगाल ही है।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस विधानसभा चुनाव को लेकर कहा है कि यह कौरवों के साथ पांडवों की लड़ाई है। अपना आक्रोश व्यक्त करते हुए मुख्यमंत्री कहती हैं कि उनके हाथ के सभी पावर छीन लिए गए हैं और इसलिए भाजपा की जो इच्छा होती है, वह कर रही है। वह कहती हैं कि भाजपा वाले खुद लूट करते हैं, झूठ बोलते हैं। मुख्यमंत्री अपने बारे में कहती हैं कि मैं मुख्यमंत्री के रूप में वेतन भी नहीं लेती, किसी के पैसे की एक कप चाय आज तक नहीं पी, फिर भी मुझे भाजपा वाले ‘चोर’ कहते हैं। चुनाव आयोग पर आरोप लगाते हुए वह कहती है कि हमारी लड़ाई सड़क से सुप्रीम कोर्ट तक चली, तब जाकर 40 प्रतिशत नाम विचाराधीन सूची में जुड़ सके। एसआईआर के नाम पर मतदाताओं के नाम की मतदाता सूची से हटवाए जा रहे थे और पहले वे 1.20 करोड़ लोगों के नाम काटने की बात कर रहे थे। आरोपों का पिटारा खोलते हुए मुख्यमंत्री कहती हैं कि केंद्र सरकार उनकी सरकार को बदलने के लिए तरह—तरह आरोप लगा रही हैं, लेकिन पश्चिम बंगाल की जनता हमारे पक्ष में है और इस राज्य में भाजपा को इस चुनाव में भी मुंह की खानी पड़ेगी।

वहीं, केंद्रीय गृहमंत्री ने पश्चिम बंगाल चुनाव से पहले ममता सरकार की विफलताओं के खिलाफ एक चार्जशीट जारी करते हुए कहा है कि बंगाल में भय और भरोसे के बीच का यह चुनाव है। अमित शाह कहते हैं कि पंद्रह वर्षों के शासन में घुसपैठ व महिला अपराधों से लेकर भ्रष्टाचार के साथ सिंडिकेट घोटाले बढ़े हैं। उन्होंने बांग्लादेशी घुसपैठियों के बारे में भी कहा कि ये ममता बनर्जी के पाले और पोसे हुए हैं। गृहमंत्री ने कहा कि तृणमूल कांग्रेस में बंगाल भ्रष्टाचार का प्रयोगशाला बन चुका है। इससे ऊपर से नीचे तक आपराधिक सिंडिकेट आम जनता को परेशान कर रहे हैं। बंगाल विकास के अभाव में कब्रिस्तान बन चुका है। ममता बनर्जी के लिए तंज कसते हुए कहते हैं कि वह हमेशा विक्टिम कार्ड की राजनीति खेली हैं। चुनाव से पहले कभी उनका पैर टूट जाता है, कभी उनके सिर पर पट्टी बंध जाती है, कभी वह बीमार पड़ जाती हैं और कभी चुनाव आयोग के सामने खड़ी होकर बेबसी का नाटक करती हैं, गालियां देती हैं। लेकिन, अब बंगाल  के लोग विक्टिम कार्ड की राजनीति को अच्छी तरह समझ चुके हैं और वह इस बार परिवर्तन का मन बना चुकी है। इसलिए प्रचण्ड बहुमत के साथ बंगाल में भाजपा की सरकार बननी तय है।

राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो वह कहते हैं कि 2021 में चुनाव अभियान के दौरान ध्रुवीकरण अपने चरम पर था। अब हम जो देख रहे हैं, वह एक ज्यादा स्थायी और जमीनी स्तर की लामबंदी है तथा एसआईआर ने इस बदलाव को और तेज कर दिया है। कुल मिलाकर एसआईआर और पहचान आधारित लामबंदी में आई तेजी ने बंगाल में राजनीतिक व्याकरण को पूरी तरह बदल दिया है। जानकारों की मानें तो बीते चार—पांच सालों में सामने आए विभिन्न मामलों में सत्तारूढ़ दल तृणमूल कांग्रेस के कई नेताओं की गिरफ्तारी ने इस मुद्दे को और धार दी है। शिक्षक भर्ती और पालिका भर्ती घटालों में रिश्वत लेकर अयोग्य उम्मीदवारों की नियुक्ति के आरोप लगे, जबकि राशन घोटालों में गरीबों के हिस्से का अनाज बाजार में बेचने की बात सामने आई है। वहीं, कोयला और मवेशी तस्करी जैसे मामले को भी भाजपा संगठित भ्रष्टाचार को मिसाल के तौर पर उछाल रही है। भाजपा राज्य की जनता को इन सभी मामलों पर एक व्यापक संदेश देने का प्रयास कर रही है कि यह चुनाव भ्रष्टाचार के खिलाफ निर्णायक लड़ाई है, जिसमें व्यवस्था परिवर्तन की आवश्यकता है। भाजपा डबल इंजन सरकार के अपने पुराने फॉर्मूले को नए तरीके से सामने रखने की कोशिश कर रही है। भाजपा यह भी संदेश देना चाहती है कि वर्तमान तृणमूल कांग्रेस की सरकार न केवल भ्रष्ट है, बल्कि राज्य के विकास में बाधक भी है।

यह सब उन सभी राज्यों में हो रहा है, जहां कुछ ही दिनों में चुनाव होने जा रहे हैं, लेकिन उसमें भी एक बात है जिन राज्यों में डबल इंजन की सरकार, अर्थात जहां भाजपा की सरकार हैं वहां सबकी बोली, सभी नेताओं के विचार बदल जाते हैं। हो भी क्यों नहीं, यह राज्य में चुनाव हार—जीत और सत्ता हासिल करने की बात है, जीवन-मरण विकास और आम लोगों के हित के लिए चाशनी लगाकर राजनीतिज्ञों द्वारा बात की जाती है, जबकि एक सामान्य व्यक्ति भी अपनी अच्छाई छोड़कर बुराई की ओर नहीं देखता। अच्छाई और बुराई दूरगामी सोच के लिए तो वह हमेशा अपने राज्य और देश के भविष्य की ओर देखता हैं। वहीं, जब पश्चिम बंगाल के चुनाव की बात करते हैं, तो वह बंगाल है, शिक्षितों का राज्य है, बहुआयामी व्यक्तित्व के मतदाता हैं, चुनाव में वहीं फैसला लेंगे कि कौन हमारा, हमारे राज्य और देश  का भला करने के उद्देश्य से वोट मांग रहा है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कहतीं हैं कि भाजपा चुनाव जीतने के लिए कुछ भी कर सकती है। इसलिए उन्होंने सभा में मतदाताओं से निवेदन किया है कि मतदान करते समय वह ईवीएम की पहरेदारी भी करें और वोट देते समय यदि केंद्रीय एजेंसियां परेशान करे, बूथ कब्जाने की कोशिश करे, तो उसे विरोध करना चाहिए। चुनाव प्रचार के बाद एवं मतदान के बाद ईवीएम की रक्षा भी करनी है। निश्चित रूप से हर कोई अपने पक्ष में अपने हित की बात सोचता है। ऐसे में अभी से मतदाताओं की आत्मा के साथ उनके विचारों को परख लेना दूर की कौड़ी है। इसलिए यदि अभी से कोई दल या व्यक्ति अपनी जीत के लिए सायास या अनायास आश्वस्त करता है, तो उसपर जनता को गंभीरता से आत्ममंथन करना होगा। जीत हार तो लोकतंत्र में लगी ही रहती है। पूर्व प्रधानमंत्री स्व. अटल बिहारी बाजपेयी कहा करते थे कि लोकतंत्र में सरकारें आती—जाती रहती हैं, लेकिन हजारों वर्षों से भारत भारत ही रहा है, और आगे भी रहेगा।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं)

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