World Sight Day : आँखें सृष्टि की संवाहिका है। आँखें न हों तो सृष्टि जड़ हो जाय, सृजन ठप्प पड़ जाय। आँख काम-प्रिया है, रति है। इस काम-प्रिया के बिना जगत का पुरुषार्थ किसी काम का नहीं। शास्त्रकारों ने अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष को पुरुषार्थ कहा है। इस पुरुषार्थ का मूल बिंदु है काम। काम अद्वैत को द्वैत करता है और द्वैत का भरण अर्थ के बिना संभव नहीं। अर्थ संक्रमण देता है। यह संक्रमण मानवोचित हो, इसके लिए धर्मबुद्धि अपेक्षित है। भौतिक विकास सार्थक हो, इसके लिए आध्यात्मिक संचरण जरूरी है। भौतिक उलब्धियों के साथ-साथ आध्यत्मिक संचरण ही उर्ध्वगामी विकास है, जिसकी परिणति मोक्ष में होती है। और, उस काम-बिंदु का व्यक्त कारण है दर्शन। दर्शन आँख की मूल और नैसर्गिक गति है। बिना दर्शन के परिचय नहीं, बिना परिचय के प्रेम नहीं और बिना प्रेम के सृजन नहीं।
सृष्टि का सारा सौंदर्य आँखों की व्यक्त अभिलाषा है। पुरुष सौंदर्य नारी की आँखों का नूर पाकर विकसित हुआ। सौंदर्य, उद्विकास के प्रेम-सिद्धांत (love theory of evolution) का प्रतिफलन है। उद्विकासवादियों का मानना है कि उद्विकास के क्रम में प्राणियों में जो रूप-परिवर्तन हुए वे सौंदर्य-ग्रहण के लिए हुए। सौंदर्य-प्रतियोगिताओं के आयोजन के पीछे मूल प्रेरणा आँखों की है।
साहित्य, विशेषकर काव्य, के प्राण रस में बसते हैं। आदि काव्यशास्त्री-नाट्यशास्त्री की वाणी- ‘विभावनुभावव्यभिचारी संयोगाद्रसनिष्पति:’ आज भी गूँज रही है। आलम्बन विभाव के अंतर में छिपे स्थायी भावों से साक्षात्कार आँखें ही कराती हैं। उद्दीपन भावों की अनुभूति में आँखों का योग प्रमुख है। अनुभावों की पहचान आंखें ही करती हैं। चंचल गति से संचरण करने वाले व्यभिचारी भावों को आँखें ही पकड़ पाती हैं। आँखें न हों तो सारी रस-लीलाएँ व्यर्थ हैं। मनुष्य की जिह्वा झूठ बोल सकती है लेकिन आँखें कभी झूठ नहीं बोलतीं। आँखे अंतर के अतल में छिपे सत्य को ही प्रकट करती हैं। आँखों की भाषा सभी नहीं पढ़ पाते। महावीर, बुद्ध और सुकरात जैसे कुछ ही लोग आँखों की भाषा पढ़ पाये हैं। आँखों की भाषा का सिद्ध पाठक परमात्मा है।
सृष्टिकर्ता भी बड़ा विचित्र है। मनुष्य उसकी श्रेष्ठ कृति है। लेकिन सुंदर आँखें दी मानवेतर प्राणियों को। आचार्यों ने मानव-नयनों के सौंदर्य अनेक उपमान जुटाए मृग, मीन, मधुप, खंजन आदि और रसिकों ने पाया-मृगनयनी, मीनाक्षी, मधुपाक्षी, खंजनसाक्षी आदि। तुलसी ने अपने आराध्य राम की आँखों के लिए उपमान जुटाए कमल एवं उसके पर्यावाची से। रसिकों ने कमल, जवा-कुसुम, मदिरा, शर्बत, प्रातः और संध्या की लालिमा को आँखों में देखा है। आँख के रूप-वैभव को जिस समग्रता में देखा है, शायद दुनिया के किसी भी रचनाकार को यह दृष्टि नहीं मिल सकी। वह मात्र आँख-संबंधी एक दोहे के कारण अमर हैं..
“अमिय हलाहल रसभरे,
श्वेत श्याम रतनार।
जियत मरत झुक-झुक परत, जेहि चितवत एक बार।।”