* ईरान-अमेरिका डील और पाकिस्तान का ‘डिप्लोमैटिक शो’—मसीहा या महज मोहरा?
Iran America Ceasefire : अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के मंच पर खुद को ‘शांतिदूत’ के रूप में पेश करने की पाकिस्तान की कोशिशों पर अब गंभीर सवालिया निशान लग गए हैं। अमेरिका और ईरान के बीच हुए हालिया संघर्ष विराम (Ceasefire) में पाकिस्तान की भूमिका को लेकर जो तथ्य सामने आए हैं, वे प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ के दावों और कूटनीतिक हकीकत के बीच एक बड़ी खाई को दर्शाते हैं।
सोशल मीडिया का ‘दिखावा’ बनाम पर्दे के पीछे की हकीकत
रिपोर्ट्स के मुताबिक, जब वॉशिंगटन और तेहरान के बीच समझौते की पटकथा लगभग लिखी जा चुकी थी, तब प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर एक नाटकीय अपील की। उन्होंने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से ईरान की डेडलाइन बढ़ाने का अनुरोध किया।
बड़ा खुलासा: व्हाइट हाउस के सूत्रों का दावा है कि शरीफ के पोस्ट करने से पहले ही अमेरिका ईरान के प्रस्ताव पर हस्ताक्षर कर चुका था। यानी, जिस समय पाकिस्तान दुनिया को यह दिखा रहा था कि वह मध्यस्थता कर रहा है, फैसला पहले ही लिया जा चुका था।
झूठे दावे और कूटनीतिक किरकिरी
पाकिस्तान की विश्वसनीयता तब और दांव पर लग गई जब पीएम शरीफ ने दावा किया कि इस संघर्ष विराम में लेबनान भी शामिल है। हालांकि, अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने इस दावे को सिरे से खारिज कर दिया। इस विरोधाभास ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान की कूटनीतिक अपरिपक्वता को उजागर कर दिया है।
स्वतंत्र मध्यस्थ या सिर्फ एक ‘कूरियर बॉय’?
दस्तावेज इशारा करते हैं कि पाकिस्तान इस खेल में कोई स्वतंत्र खिलाड़ी नहीं था।
* व्हाइट हाउस का दबाव: अमेरिका ने पाकिस्तान का इस्तेमाल केवल अपना प्रस्ताव ईरान तक पहुँचाने के एक ‘माध्यम’ के रूप में किया।
* सैन्य हस्तक्षेप: इस पूरी प्रक्रिया में पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर की सक्रियता ने साफ कर दिया कि इस्लामाबाद में कूटनीति की कमान राजनीतिक नेतृत्व के बजाय रावलपिंडी (सेना) के हाथों में थी।
अगला पड़ाव: इस्लामाबाद में हाई-प्रोफाइल बैठक
इन तमाम विवादों के बीच, पाकिस्तान शुक्रवार को अमेरिका और ईरान के उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडलों की मेजबानी करने जा रहा है।
* लक्ष्य: दो सप्ताह के अस्थायी युद्धविराम को स्थायी शांति में बदलना।
* चुनौती: क्या अपनी साख खो चुका पाकिस्तान इस बैठक के जरिए अपनी खोई हुई कूटनीतिक गरिमा वापस पा सकेगा?
ईरान-अमेरिका डील ने यह साबित कर दिया है कि ग्लोबल डिप्लोमेसी में ‘क्रेडिट’ लेने की जल्दबाजी भारी पड़ सकती है। पाकिस्तान ने ‘X’ पर जो ड्रामा किया, उसने उसे एक भरोसेमंद मध्यस्थ के बजाय एक अवसरवादी देश के रूप में चित्रित कर दिया है। अब दुनिया की नजरें इस्लामाबाद की बैठक पर हैं—क्या यह केवल एक फोटो-अप होगा या वाकई कोई ठोस समाधान निकलेगा?