Sakib Hussain : ​गोपालगंज का ‘लाल’ और मां के गहनों की वो चमक: साकिब हुसैन, जिसने किस्मत को अपनी रफ्तार से मात दी!

Bindash Bol

Sakib Hussain : बिहार के गोपालगंज की धूल भरी गलियों से निकलकर आईपीएल के चकाचौंध भरे स्टेडियम तक का सफर… यह सुनने में जितना रोमांचक लगता है, इसकी नींव उतनी ही आंसुओं और संघर्षों से गीली है। यह कहानी है साकिब हुसैन की, जिसने साबित कर दिया कि अगर इरादे फौलादी हों, तो गरीबी केवल एक ‘हालात’ है, कोई ‘रुकावट’ नहीं।

ममता की वो कुर्बानी: जब बिके मां के गहने

​कहते हैं कि एक मां अपने बच्चे के सपनों के लिए पूरी दुनिया से लड़ सकती है, लेकिन साकिब की मां ने तो अपनी पूरी जमापूंजी ही दांव पर लगा दी। एक वक्त ऐसा था जब साकिब के पास मैदान पर उतरने के लिए क्रिकेट के जूते तक नहीं थे। घर की माली हालत ऐसी कि पिता की मजदूरी से सिर्फ पेट की आग बुझती थी, शौक के लिए जगह कहाँ थी?
​लेकिन मां की ममता ने हार नहीं मानी। अपनी आंखों के तारे को नंगे पैर दौड़ते देख उस मां का कलेजा फट गया। उन्होंने अपने तन के गहने—जो एक महिला की जीवन भर की थाती होते हैं—हंसते-हंसते बेच दिए। साकिब के पैरों में पड़े वो जूते सिर्फ चमड़े के नहीं थे, उनमें एक मां के त्याग और विश्वास की रूह बसी थी।

पिता की फटी कमीज और साकिब की रफ्तार

​जिस उम्र में बच्चे खिलौनों से खेलते हैं, साकिब उस उम्र में गरीबी से पंजा लड़ा रहे थे। पिता दिन भर हाड़-तोड़ मजदूरी करते ताकि घर का चूल्हा जल सके, और बेटा तपती धूप में इस उम्मीद में गेंद फेंकता कि एक दिन वक्त बदलेगा। कई रातें ऐसी गुजरीं जब भूख पेट में मरोड़ उठाती रही, लेकिन साकिब के भीतर लगी ‘क्रिकेट की आग’ ने उन्हें रुकने नहीं दिया।

आईपीएल डेब्यू: सिर्फ एक मैच नहीं, करोड़ों उम्मीदों की जीत

​जब साकिब हुसैन आईपीएल की जर्सी पहनकर मैदान पर उतरे और अपनी पहली गेंद फेंकी, तो वह सिर्फ एक खिलाड़ी का डेब्यू नहीं था। वह जीत थी:

* ​उस मां की, जिसने अपने गहने कुर्बान किए।

* ​उस पिता की, जिसने अपनी फटी कमीज की परवाह किए बिना बेटे को पसीना बहाने की आजादी दी।

* उन करोड़ों युवाओं की, जो आज भी अभावों के बीच बड़े सपने देखने की हिम्मत जुटाते हैं।

अभाव से प्रभाव तक का सफर

​आज जब साकिब की गेंदें बल्लेबाजों के स्टंप्स उखाड़ती हैं, तो उसमें गोपालगंज की मिट्टी की सोंधी खुशबू और संघर्ष की कड़वाहट, दोनों का मिश्रण होता है। साकिब की यह कहानी चीख-चीख कर कह रही है कि “मंजिलें उन्हीं को मिलती हैं, जिनके सपनों में जान होती है, पंखों से कुछ नहीं होता, हौसलों से उड़ान होती है।”
​साकिब भाई, आपकी यह सफलता आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मिशाल है। आपने दिखा दिया कि बिहार की मिट्टी में वो तासीर है, जो मुश्किलों को भी अपना मुरीद बना लेती है।
​पूरे देश को आप पर गर्व है!

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