Samrat Chaudhary : ​बिहार में ‘सम्राट’ का राजतिलक : एक ‘मुरेठा’ जिसने बदल दिया सत्ता का व्याकरण

Siddarth Saurabh

​Samrat Chaudhary : 15 अप्रैल 2026 की तारीख बिहार के राजनीतिक इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज होने जा रही है। यह वह दिन है जब नीतीश कुमार के इस्तीफे के बाद बिहार में पहली बार विशुद्ध रूप से भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार की कमान सम्राट चौधरी के हाथों में होगी। यह केवल एक मुख्यमंत्री की शपथ नहीं है, बल्कि उस संकल्प की सिद्धि है जिसे सम्राट चौधरी ने अपने सिर पर ‘मुरेठा’ (पगड़ी) बांधकर लिया था।

​1. शून्य से शिखर तक: राजद के सिपाही से भाजपा के ‘कमांडर’

​सम्राट चौधरी का राजनीतिक सफर किसी थ्रिलर फिल्म से कम नहीं है। राबड़ी देवी की सरकार में सबसे कम उम्र के मंत्री बनने से लेकर बिहार के मुख्यमंत्री पद तक पहुँचने के बीच उन्होंने कई घाटों का पानी पिया है।

* ​विरासत: पूर्व सैनिक और कद्दावर नेता शकुनी चौधरी के पुत्र होने के नाते राजनीति उन्हें विरासत में मिली, लेकिन अपनी पहचान उन्होंने खुद गढ़ी।

* ​सफर: राजद से शुरुआत, फिर जदयू, लोजपा और हम के गलियारों से होते हुए 2017 में भाजपा का दामन थामना उनके जीवन का ‘टर्निंग पॉइंट’ साबित हुआ।

* ​पहचान: एक प्रखर वक्ता और कोइरी (लव-कुश समीकरण) समुदाय के मजबूत चेहरे के रूप में उन्होंने दिल्ली से लेकर पटना तक अपनी धाक जमाई।

2. ‘कास्ट इंजीनियरिंग’ का मास्टरस्ट्रोक

​सम्राट चौधरी का चयन भाजपा की उस सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है, जिसने बिहार के ‘मैंडेट’ को पूरी तरह री-डिफाइन कर दिया है।

* ​कोइरी कार्ड: 1968 में सतीश प्रसाद सिंह के बाद सम्राट इस समुदाय से आने वाले दूसरे मुख्यमंत्री हैं। भाजपा ने उन्हें आगे कर यह संदेश दिया है कि वह अब केवल सवर्णों की पार्टी नहीं, बल्कि पिछड़ों और अति-पिछड़ों की असली पैरोकार है।

* ​दिग्गजों को पछाड़ा: मुख्यमंत्री की इस रेस में सम्राट ने अपनी आक्रामकता और सांगठनिक कौशल से नित्यानंद राय, मंगल पांडेय, विजय सिन्हा और राजीव प्रताप रूडी जैसे कद्दावर नामों को पीछे छोड़ दिया।

​3. बंद कमरे की कहानी और अंतर्विरोधों का तूफान

​सम्राट के नाम पर मुहर लगना इतना आसान नहीं था। विधायक दल की बैठक में वरिष्ठ नेता विजय कुमार सिन्हा ने उनके नाम का प्रस्ताव रखा, जिसे मंगल पांडेय और दिलीप जायसवाल ने अनुमोदित किया।

* ​”हम भाजपा के सिपाही हैं… वर्षों तक जमीन पर पसीना और लहू बहाया है। आज कमल खिलाने का अवसर आया है और मैंने अपने कमांडर के आदेश का पालन किया।” – विजय कुमार सिन्हा

​हालांकि, इस चयन के पीछे भारी सस्पेंस भी रहा। बताया जा रहा है कि नीतीश कुमार के इस्तीफे के बाद गठबंधन की मजबूरियों और पार्टी के भीतर के अंतर्विरोधों के कारण केंद्रीय नेतृत्व (शिवराज सिंह चौहान और नितिन नवीन) को काफी मशक्कत करनी पड़ी, ताकि सत्ता हस्तांतरण निर्बाध रूप से हो सके।

​4. भाजपा का ‘अछूता’ किला फतह

​बिहार में मुख्यमंत्री की कुर्सी हासिल करना भाजपा के लिए एक मनोवैज्ञानिक जीत भी है। देश के नक्शे पर बिहार अब उन राज्यों की सूची से बाहर हो गया है जहाँ भाजपा का प्रभाव तो था, लेकिन उसका अपना मुख्यमंत्री कभी नहीं रहा।

* ​अभी भी दूर: केरल, तमिलनाडु, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल और पंजाब जैसे राज्य अब भी भाजपा के लिए उस चुनौती की तरह हैं, जिसे उसने बिहार में सम्राट चौधरी के जरिए पार कर लिया है।

* ​चुनौतियां: कांटों भरा है ‘ताज’

मुख्यमंत्री बनने के बाद सम्राट के सामने सबसे बड़ी चुनौती पार्टी के भीतर के ‘अंतर्विरोधों’ को शांत करना और जनता के बीच अपनी ‘साख’ स्थापित करना है। उन्हें केवल एक जाति या दल का नेता नहीं, बल्कि बिहार के विकास का ‘सगा’ बनना होगा।

15 अप्रैल को जब सम्राट चौधरी शपथ लेंगे, तो वह न केवल एक मुख्यमंत्री होंगे, बल्कि बिहार में भाजपा के एक नए ‘युग’ के प्रणेता भी होंगे। अब देखना यह है कि ‘सुशासन’ की विरासत को वह ‘सम्राट के शासन’ में कितनी ऊंचाई तक ले जाते हैं।

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