RSS Expansion : कोलकाता से कूचबिहार तक, बंगाल की खाड़ी से हिमालय की तलहटी तक, पश्चिम बंगाल के सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य में एक ऐसी लहर चल रही है जिसकी आहट शोर से नहीं, बल्कि जड़ों से सुनाई दे रही है।
1. बिमान बोस की वो चुनौती और बदलता कालचक्र
वर्ष 2010 का दौर था। वामपंथ का किला ढहने की कगार पर था, लेकिन अहंकार अभी बाकी था। तत्कालीन कद्दावर नेता बिमान बोस ने तब गर्व से कहा था— “कोलकाता की इस सड़क पर आरएसएस का एक झंडा तक नहीं दिखेगा, तुम पूरे बंगाल की बात करते हो?”
समय का चक्र घूमा और आंकड़े गवाह बने। 2006 तक बंगाल में संघ की मात्र 500 शाखाएं थीं। 2011 में ममता बनर्जी के सत्ता संभालने तक यह संख्या 830 हुई। लेकिन असली ‘विस्फोट’ पिछले एक दशक में हुआ। 2024 तक 4,540 शाखाओं का जाल बिछ चुका है और लक्ष्य 2026 के अंत तक 8,000 शाखाओं का है। 500 से 8,000 तक का यह सफर केवल नंबर नहीं, बल्कि बंगाल की आत्मा में हो रहे वैचारिक परिवर्तन का प्रमाण है।
2. संगठन का मंत्र: “चाय किसी और के घर, बात देश के हित में”
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अक्सर कहते हैं— “असली नेता वह नहीं जो सुबह की चाय अपने घर पिए, बल्कि वह है जो हर सुबह किसी दूसरे के घर की दहलीज लांघे।” संघ के स्वयंसेवकों ने इसी मंत्र को बंगाल की गलियों में उतार दिया। यह ‘कनेक्ट’ रातों-रात पैदा नहीं हुआ। पहली बार जाने पर तिरस्कार मिला, दूसरी बार बात हुई, तीसरी बार कुर्सी मिली और चौथी बार में मन मिल गए।
”करत करत अभ्यास के, जड़मति होत सुजान। रसरी आवत जात ते, सिल पर परत निसान॥”
यही वह सांगठनिक मेहनत है जिसने उन बूथों पर भी भाजपा के पोलिंग एजेंट खड़े कर दिए, जहाँ 2021 में पार्टी को नामलेवा नहीं मिलता था।
3. डॉ. हेडगेवार से मोहन भागवत तक: बंगाल का ऐतिहासिक नाता
बंगाल और संघ का रिश्ता नया नहीं है। 1937 से ही यहाँ संघ सक्रिय रहा है। गुरु गोलवलकर से लेकर वर्तमान सरसंघचालक मोहन भागवत तक, बंगाल हमेशा संघ की प्राथमिकता में रहा है। पिछले चार वर्षों में मोहन भागवत के 13 दौरे (लगभग हर तीसरे महीने एक दौरा) यह बताते हैं कि संघ के लिए बंगाल सिर्फ एक राज्य नहीं, बल्कि एक मिशन है।
4. ‘मॉडल स्टेट’ की संकल्पना और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद
संघ ने राजनीति के बजाय ‘सामाजिक गुडविल’ को अपना हथियार बनाया। बंगाल की माटी के महापुरुषों— डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, स्वामी विवेकानंद और रामकृष्ण परमहंस के विचारों को पुनर्जीवित किया गया। एक ऐसा नैरेटिव तैयार किया गया जिसने बंगाल के प्रबुद्ध वर्ग को, जो राजनीति से दूर रहता था, सामाजिक कार्यों के जरिए राष्ट्रवाद की मुख्यधारा से जोड़ दिया।
5. खामोश शक्ति का प्रहार: 2026 की बिसात
आज जब चुनावी रैलियों और भीड़ की चर्चा होती है, तब एक ‘खामोश शक्ति’ बंगाल के हर तीसरे हिंदू घर में दस्तक दे रही है। यह शक्ति केवल वोट नहीं मांग रही, बल्कि एक भाव जगा रही है…
* ”आमार सोनार बांग्ला” की पुनर्स्थापना।
* मेधा के पलायन पर लगाम।
* बंगाल की खोई हुई यश-कीर्ति की वापसी।
2021 में भाजपा का 4 सीटों से 77 सीटों पर पहुँचना कोई ‘चुनावी चमत्कार’ नहीं, बल्कि दशकों की उस सिंचाई का परिणाम है जो संघ के स्वयंसेवकों ने अपने पसीने से की है। राजनीति में भले ही चेहरे बदलते हों, लेकिन बंगाल की ज़मीन पर इस बार बदलाव की इबारत वह संगठन लिख रहा है जिसका मानना है— ‘संघ शक्ति कलियुगे’।
2026 का चुनाव केवल सत्ता का संघर्ष नहीं, बल्कि बंगाल की पहचान को फिर से परिभाषित करने का निर्णायक अध्याय साबित होने वाला है।