मनोज कुमार मिश्रा
Madhyamgram Murder : पश्चिम बंगाल की एक बरसाती रात। कोलकाता एयरपोर्ट से घर लौटती सफेद SUV…
सुनसान गली में अचानक एक छोटी कार सामने आकर रास्ता रोक लेती—और कुछ ही सेकंड में गोलियों की बरसात।
स्कॉर्पियो की फ्रंट सीट पर बैठा आदमी कोई आम शख्स नहीं था—वह था बंगाल के सम्भावित मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी का सबसे भरोसेमंद सहयोगी, चंद्रनाथ रथ।
कुछ ही पलों में वह शख्स मध्यमग्राम की कीचड़ भरी सड़क पर इतिहास बन गया, और पूरे बंगाल की सियासत में खामोशी छा गई। इसके बाद शुरू होता है फूस के ढेर से सुई ढूंढने का काम।
जांच में सामने आता है कि हमला करने वाली कार का नंबर प्लेट असली नहीं था, बाइकें भी चोरी की थीं, और हमलावर ऐसे रास्तों से आए‑गए जिन्हें चुनने के लिए सिर्फ़ किस्मत नहीं, ठंडी दिमाग से की गई रेकी चाहिए थी।
कई दिन तक पुलिस के हाथ सिर्फ़ खाली खोल, मिटाए गए चेसिस नंबर और बिखरी हुई CCTV फुटेज ही लगती रही—मानो कोई अदृश्य टीम सब कुछ “क्लीन” करके गई हो।
फिर अचानक, एक छोटा‑सा सुराग मिलता है—इतना मामूली कि आम आदमी की नज़र से निकल जाए, लेकिन अगर सही जगह से देखा जाए तो पूरी साजिश का चेहरा दिखा दे।
यहीं से कहानी झारखंड की ओर मुड़ती है, फिर उत्तर प्रदेश‑बिहार की तरफ भागती है, और बीच में कहीं, एक जेल की दीवारों के पीछे बैठा कोई पुराना नाम भी जांच के दायरे में आ जाता है।
किसने चुना चंद्रनाथ को टारगेट? किसने तय किया कि वारदात ठीक उसी रात हो, जब चुनावी नतीजे ताज़ा हों?
किसने बाहर बैठे शूटरों को अंदर की सटीक “टिप” दी कि गाड़ी कहाँ स्लो होगी, और कौन‑सी सीट पर कौन बैठेगा?
इन सवालों के जवाब, और इस मर्डर मिस्ट्री की एक‑एक कड़ी, हम आज शाम ही तीन पार्ट की सीरीज़ में खोलेंगे।
अभी इतना समझ लीजिए—यह कहानी सिर्फ़ गोलियों तक सीमित नहीं, असली रहस्य उन नज़र न आने वाले हाथों में छुपा है जो ट्रिगर से बहुत दूर खड़े थे…