Chandra Nath Rath : चंद्रनाथ की हत्या में इस्तेमाल सिल्वर निसान माइक्रा की कहानी खुद में एक क्राइम थ्रिलर जैसी है। जांच में सामने आया कि यह कार झारखंड रूट से लाई गई और OLX‑टाइप प्लेटफॉर्म के ज़रिए फर्जी डील के सहारे हासिल की गई थी।
6 मई की दोपहर यह कार पहली बार “बेलघरिया एक्सप्रेसवे” के पास मध्यमग्राम क्रॉसिंग के आसपास CCTV में दिखती है, जहाँ से चंद्रनाथ के रोज़ाना रूट की आख़िरी बार रेकी की गई ।
इसके बाद करीब 6–7 घंटे तक कार और संदिग्धों की मूवमेंट CCTV से गायब हो जाती है—SIT इस गैप को ‘ब्लैक होल’ कह रही है।
इसी दौरान कार की फर्जी नंबर प्लेट बदली गई, लोकल लॉजिस्टिक सपोर्ट फाइनल हुआ, हथियार और भागने का रूट सेट किया गया और “कॉन्ट्रैक्ट हिट” की टाइमिंग पर मुहर लगी।
हत्या के बाद शुरुआती 24–48 घंटे तक पुलिस लगभग अंधेरे में टटोलती रही। क्राइम सीन से मिली 9mm के खाली कारतूस, गोली लगी सीटें, खून से सनी स्कॉर्पियो—ये सब तो दिख रहा था, लेकिन हमलावरों का कोई सीधा सुराग नहीं था।
तोड़ वहीं से शुरू हुआ जहाँ हत्यारों को लगा होगा कि वे सबसे “सुरक्षित” हैं—टोल प्लाज़ा।
SIT ने बेलघरिया एक्सप्रेसवे से लेकर हावड़ा तक के सारे टोल प्लाज़ा का डेटा खंगालना शुरू किया ताकि सिल्वर निसान माइक्रा की मूवमेंट पकड़ी जा सके।
जल्द ही हावड़ा के बैली (Bally) टोल प्लाज़ा पर उन्हें वह पल मिलता है जिसने पूरा केस मोड़ दिया।
यहीं से कहानी डिजिटल मोड़ लेती है और हत्यारों की सबसे बड़ी गलती सामने आती है। हत्या से ठीक पहले सिल्वर माइक्रा कोलकाता के पास हावड़ा स्थित बैली (Bally) टोल प्लाज़ा से गुज़रती है।
फास्टैग या नकद देने के बजाय कार सवार आरोपियों में से एक ने टोल UPI से पेमेंट कर दिया—शायद उन्हें लगा कि यह सबसे आसान और “क्लीन” तरीका है, लेकिन यही एक छोटी डिजिटल चूक पुलिस के लिए गोल्डन क्लू बन जाती है।
टोल प्लाज़ा के CCTV फुटेज में कार और उसके सवारों का क्लियर विज़ुअल रिकॉर्ड हो जाता है। साथ ही, उस UPI ट्रांजेक्शन से जुड़े बैंक खाते और मोबाइल नंबर को ट्रेस करते‑करते जांचकर्ता सीधे एक संदिग्ध नेटवर्क तक पहुँच जाते हैं, जहाँ से बिहार–UP कनेक्शन की डोर खुलनी शुरू होती है।
बाद में इसी डिजिटल ट्रेल और आसपास के 70–80 CCTV फुटेज खंगालकर पुलिस ने चोरी की दो बाइक और माइक्रा की मूवमेंट मैप की, जो अलग‑अलग इलाकों से बरामद हुईं
पुलिस सूत्रों के हवाले से यह बात सामने आ चुकी है कि चंद्रनाथ रथ की हत्या किसी निजी मनमुटाव की नहीं, बल्कि प्रोफेशनल कॉन्ट्रैक्ट किलिंग थी।
जांच में यह एंगल मजबूत हुआ कि इस काम के लिए बिहार से कम से कम दो शार्पशूटर्स खास तौर पर बुलाए गए, जिनकी रहने, आने–जाने और गाड़ियों की व्यवस्था बंगाल के एक स्थानीय अपराधी नेटवर्क ने संभाली।
रिपोर्ट्स के मुताबिक यह “डील” करीब 50 लाख रुपये की भारी भरकम सुपारी पर कराई गई, जो अलग‑अलग लेयर—मिडल‑मैन, लोकल गैंग और शूटर—में बँटी होगी।
जांच आगे बढ़ने पर एक और खतरनाक परत सामने आती है। SIT का शक पुख्ता हो गया कि चंद्रनाथ राठ की हत्या के पीछे कोई छिटपुट गिरोह नहीं, बल्कि एक संगठित सुपारी किलर नेटवर्क काम कर रहा था, जिसकी कड़ियाँ बंगाल की एक जेल के अंदर बैठे अपराधियों से लेकर उत्तर प्रदेश तक फैली हो सकती हैं।
संकेत यह मिले कि जेल से बैठे कुछ अपराधियों ने बाहर के कॉन्ट्रैक्ट किलर्स तथा लोकल क्रिमिनल्स के साथ मिलकर यह डील फाइनल कराई होगी, यानी “ऑर्डर” अंदर से और “एक्सीक्यूशन” बाहर के नेटवर्क ने संभाला।
इन्हीं रिपोर्ट्स में यह भी सामने आता है कि पूरी साजिश और मूवमेंट के लिए एक WhatsApp ग्रुप बनाया गया था, जिसमें गाड़ियों की लोकेशन, फर्जी नंबर प्लेट बदलने, रेकी और अटैक के समय जैसी डिटेल शेयर की गईं।
अब SIT का फोकस सिर्फ़ सुपारी की रकम किसने दी, इस सवाल तक सीमित नहीं रह गया था, बल्कि उस “जेल नेटवर्क” तक पहुँचने पर भी आ गया, जहाँ बैठा कोई बड़ा अपराधी बाहर के शार्पशूटर्स को किस बड़े राजनेता के कहने पर एक्टिवेट कर रहा था।
सबसे पहले UPI ट्रांजेक्शन से मिले ट्रेल की महीन लकीर पकड़ वेस्ट बंगाल पुलिस की SIT ने बिहार के बक्सर ज़िले के पांडेपट्टी गांव के मुफस्सिल थाना एरिया में आधी रात को छापेमारी कर संदिग्ध शार्पशूटर्स विशाल श्रीवास्तव को धर दबोचा, जिसके नाम पर बलिया सदर कोतवाली में पहले से ही हत्या का केस दर्ज है।
श्रीवास्तव पर सिर्फ बक्सर में ही 20 से अधिक हत्या, लूट, अपहरण के मामले दर्ज हैं—यानी ये लोग पहले से एक्टिव कॉन्ट्रैक्ट/गैंग नेटवर्क का हिस्सा हैं।
फिर उसकी ही निशानदेही पर बक्सर के अलग‑अलग थाना इलाकों से 2 और अपराधियों मयंक मिश्रा और विक्की मौर्य को उठाया गया।
उन्हें रातोंरात कोलकाता लाकर,जब भवानी भवन (स्टेट पुलिस HQ) में इंटेंसिव इंटरोगेशन शुरू हुआ तो धमाका हो गया।
दूसरों की हत्या करने में जिनका दिल नहीं पसीजता, जब उन्हें खुद की मौत का डर लगा तो सच उगलते देर नहीं लगी।
और इसके पहले की खबर जंगल की आग की तरह फैलती कोलकाता पुलिस ने अयोध्या पुलिस के सहयोग से सोमवार सुबह अयोध्या के नगर कोतवाली इलाके में लखनऊ–गोरखपुर हाईवे पर घेराबंदी कर ठाकुर राज सिंह को पकड़ लिया।
जो लखनऊ में एक हाईप्रोफ़ाइल शादी से लौट रहा था, कोलकाता पुलिस का दावा है कि यही वह शूटर था जिसने चंद्रनाथ पर गोली चलाई।
राज सिंह मूल रूप से यूपी के बलिया जिले के आनंद नगर, वार्ड 15 का निवासी है और अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा का प्रदेश महासचिव रहा है। उसके ऊपर बलिया सदर कोतवाली में पहले से ही हत्या का केस भी दर्ज है।
केस दर्ज होने के बाद से वो बक्सर (बिहार) में लंबे समय से रह कर आपराधिक गतिविधियों को अंजाम देता था। गिरफ्तारी के तुरंत बाद पूरी कहानी में एक और सनसनीखेज खुलासा होता है, जब राज सिंह की तस्वीरें सामने आती हैं। जिसमें उसके कंधे पर हाथ रखकर यूपी सरकार के परिवहन मंत्री और बलिया सदर से विधायक दया शंकर सिंह मुस्कुरा रहे हैं।
क्या यह महज़ संयोग है, या जांच का एक और एंगल?
जो भी हो पर किन्तु अपराध और अपराधी मुक्त शासन के लिये MYogiAdityanath और Amit Shah का अब यह नैतिक दायित्व बनता है कि वो तुरंत दया शंकर सिंह को मंत्रिमंडल से बर्खास्त कर एक और मिसाल कायम करें।
दया शंकर भले ही किसी साजिश का हिस्सा नहीं हो सकते पर एक हिस्ट्रीशीटर को शरण देने का राजफाश तो हो ही चुका है।लेकिन अभी भी सबसे बड़ा सवाल यह है —इन शूटरों पीछे कौन था? अगले भाग में।