* ‘हम भारत से अच्छे रिश्ते चाहते हैं, हमारे बीच में पाकिस्तान को नहीं आना चाहिए ‘: तुर्की के विदेश मंत्री हकान फिदान
Turkey India Relations : कहते हैं कि बिजनेस और दोस्ती में जब आप गलत पार्टनर चुन लेते हैं, तो घाटा होना पक्का होता है। ऐसा ही कुछ इस समय हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान के सबसे जिगरी यार यानी तुर्की (Turkey) के साथ हो रहा है। कभी कश्मीर के मुद्दे पर पाकिस्तान की हां में हां मिलाने वाला और भारत के खिलाफ कूटनीतिक चालें चलने वाला तुर्की आज अचानक घुटनों पर आ गया है। तुर्की के विदेश मंत्री हकान फिदान का एक ताजा बयान आया है, जिसमें वे साफ-साफ कह रहे हैं, ‘हम भारत से अच्छे रिश्ते चाहते हैं, हमारे बीच में पाकिस्तान को नहीं आना चाहिए।’ आखिर एक ही साल में ऐसा क्या बदल गया कि तुर्की के तेवर ठंडे पड़ गए? इसकी सबसे बड़ी और असली वजह है, भारतीय टूरिस्टों की ताकत और 40 करोड़ डॉलर का भारी-भरकम फटका! आइए जानते हैं कि भारत की नाराजगी ने तुर्की की टूरिज्म इंडस्ट्री (Tourism Industry) को कैसे हिलाकर रख दिया?तुर्की की रेसेप तैयप एर्दोगन सरकार के इस हृदय परिवर्तन की कई वजहें हैं; और उसे महसूस हो चुका है कि अब उसकी गर्दन भारत के हाथों में है।
भारत की मदद के बदले तुर्की की मक्कारी
बात ज्यादा पुरानी नहीं है। साल 2023 में जब तुर्की में भयंकर भूकंप आया था, तब संकट की उस घड़ी में भारत ने इंसानियत का फर्ज निभाते हुए सबसे पहले मदद का हाथ बढ़ाया था। ‘ऑपरेशन दोस्त’ के तहत भारत ने वहां फील्ड अस्पताल खोले, दवाइयां और राहत सामग्री भेजी। तब तुर्की की जनता की आंखें नम थीं और वे भारतीयों को दुआएं दे रहे थे। लेकिन वहां की एर्दोगन सरकार ने इस अहसान को बहुत जल्दी भुला दिया। जब भारत ने अपनी सुरक्षा के लिए कड़े कदम उठाए, तो तुर्की ने भारत का साथ देने के बजाय पाकिस्तान को ड्रोन और हथियारों की सप्लाई शुरू कर दी। इंटरनेशनल मंचों पर भी उसने हमेशा पाकिस्तान का ही राग अलापा। भारत को समझ आ गया था कि इस ‘एहसान फरामोशी’ का जवाब बंदूक से नहीं, बल्कि एक साइलेंट कूटनीति से देना होगा।
भारतीयों ने मोड़ा मुंह, तो सूने पड़ गए तुर्की के आलीशान रिसॉर्ट्स
मजहब और पाकिस्तान के चश्मे में डूबी तुर्की सरकार को इस बात का अंदाजा ही नहीं था कि उनकी अर्थव्यवस्था (Economy) की चाबी काफी हद तक भारतीय जेबों में है। भारत का मिडिल क्लास और रईस तबका हर साल छुट्टियां मनाने और शादियों के लिए भारी तादाद में तुर्की जाता था। जैसे ही तुर्की की मक्कारी बेनकाब हुई, भारतीय पर्यटकों ने खुद ही तुर्की से दूरी बनानी शुरू कर दी। जो भारतीय रईस अपनी शादियों में करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाकर तुर्की के होटलों को अमीर बनाते थे, उन्होंने अपनी बुकिंग्स कैंसिल कर दीं।
भारतीयों के न जाने से तुर्की को कितना नुकसान?
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, साल 2024 में जहां 3.3 लाख से ज्यादा भारतीय तुर्की घूमने गए थे, वहीं अगले ही साल यानी 2025 में यह संख्या घटकर सिर्फ 2.5 लाख के आसपास रह गई। यानी सीधे-सीधे 24.24% की बड़ी गिरावट दर्ज की गई। भारतीय टूरिस्टों और शादियों के इस तगड़े बॉयकाट की वजह से तुर्की और उसके साथी देशों को करीब 40 करोड़ अमेरिकी डॉलर का सीधा नुकसान उठाना पड़ा। 2025 की शुरुआत यानी मार्च महीने तक तुर्की जाने वाले भारतीयों की संख्या में बढ़ोतरी हो रही थी। लेकिन जैसे ही तुर्की ने भारत के खिलाफ पाकिस्तान का खुलकर साथ दिया, भारतीयों ने अपनी टिकटें कैंसिल करना शुरू कर दिया और यह ग्राफ धड़ाम से नीचे गिर गया।
फ्लाइट्स की सीटें कम हुईं, तो और बढ़ेगी आफत
तुर्की के लिए आफत यहीं खत्म नहीं हो रही है। भारत की दिग्गज एयरलाइन कंपनी इंडीगो (IndiGo) ने तुर्की एयरलाइंस से जो बड़े बोइंग (B777) विमान लीज पर ले रखे थे, वे भी वापस लौटने वाले हैं। उनकी जगह छोटे विमान (XLR) उड़ान भरेंगे। इसका सीधा मतलब यह है कि भारत से तुर्की जाने वाली फ्लाइट्स में सीटों की संख्या बहुत कम हो जाएगी। जब सीटें कम होंगी, तो टूरिस्टों का जाना और मुश्किल हो जाएगा, जिससे तुर्की के बचे-कुचे पर्यटन बाजार को और भी तगड़ा झटका लगने वाला है।
क्या सच में कंगाल हो जाएगी एर्दोगन सरकार?
अब सवाल आता है कि क्या भारत के बिना तुर्की पूरी तरह बर्बाद हो जाएगा? अगर आंकड़ों को देखें, तो तुर्की में रूस, जर्मनी और ब्रिटेन से बहुत बड़ी संख्या में इंटरनेशनल टूरिस्ट आते हैं। कुल विदेशी सैलानियों में भारतीयों की हिस्सेदारी 1% के आसपास है। भारतीय टूरिस्टों का स्पेंडिंग पावर (पैसा खर्च करने की क्षमता) बहुत ज्यादा होता है। भारतीय वहां सिर्फ घूमने नहीं जाते, बल्कि आलीशान होटलों में महंगी शादियां करते हैं, शॉपिंग करते हैं और जमकर फॉरेन करेंसी लुटाते हैं। जब यह प्रीमियम बिजनेस ठप होता है, तो होटल्स, ग्राउंड हैंडलिंग एजेंसियों और लोकल मार्केट की कमर टूट जाती है। 40 करोड़ डॉलर का यह फटका तुर्की जैसी पहले से ही कमजोर इकोनॉमी के लिए एक बड़ा नासूर बन चुका है। यही वजह है कि अब उनके विदेश मंत्री भारत से पैच-अप करने के लिए बयानबाजी कर रहे हैं।
आर्मेनिया के नाम से कांपने लगे तुर्की और अजरबैजान
* सिर्फ भारतीय पर्यटकों ने ही तुर्की को सबक नहीं सिखाया।
* भारत सरकार ने भी तुर्की और अजरबैजान को उनके कुकर्मों की सजा देने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
* आर्मेनिया, जो कि अजरबैजान का दुश्मन है और पाकिस्तान-तुर्की-अजरबैजान की तीकड़ी का सामना करता है, उसे भर-भर कर हथियारों की सप्लाई शुरू हुई।
* आर्मेनिया के गणतंत्र दिवस समारोह में भारत के पिनाका मल्टी-बैरल रॉकेट लॉन्चर, स्वाति वेपन लोकेटिंग रडार, आकाश एयर डिफेंस सिस्टम और मल्टीपल 155एमएम तोप देखकर तुर्की और अजरबैजान के हलक सूखने लगे।
* इस समय ये हथियार दुनिया के बेहतरीन और घातक हथियारों में गिने जा रहे हैं।
* अजरबैजान ने भारत को ऐसा न करने का त्राहिमाम संदेश भी भेजा, लेकिन उसे नजरअंदाज कर दिया गया।
भारत की वजह से तुर्की को साइप्रस भी दे रहा टेंशन
* भारत ने अब तुर्की के पड़ोस में ही एक और बड़ा दांव खेल दिया है।
* तुर्की का ग्रीस और साइप्रस के साथ बहुत पुराना और गहरा सीमा विवाद रहा है।
* साइप्रस के राष्ट्रपति निकोस क्रिस्टोडौलाइड्स के हालिया भारत दौरे में दोनों देशों ने अपनी सामरिक साझेदारी को और मजबूत करने का संकल्प लिया है।
* इसके तहत साइप्रस के लिए भी भारत से घातक हथियार खरीदने का रास्ता खुल गया है। यही स्थिति ग्रीस के साथ भी बन रही है।
* साइप्रस का उत्साह तो देखते ही बन रहा है। उसने भारत के ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल की दुनिया भर में बढ़ती डिमांड को देखते हुए इसकी खरीद की भी इच्छा जता दी है।
* साइप्रस भारत से मिलिट्री ड्रोन भी खरीदना चाह रहा है।
* बस इन्हीं बातों ने तुर्की और उसके राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन को कहीं न कहीं कूटनीतिक तौर पर भारत के सामने घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया है।