* करोड़ों का खेल, राज्यसभा का चुनाव! झारखंड में फिर गरमाई राजनीतिक सौदेबाजी की आशंका
* भाजपा या निर्दलीय उम्मीदवार उतरते ही बदल सकता है पूरा गणित
* दो राज्यसभा सीटों के लिए चुनाव, क्रॉस वोटिंग और हॉर्स ट्रेडिंग पर टिकी सबकी नजर
Jharkhand Rajya Sabha Election : झारखंड में राज्यसभा की दो सीटों के लिए चुनावी प्रक्रिया शुरू होते ही राजनीतिक गलियारों में एक बार फिर क्रॉस वोटिंग, जोड़-तोड़ और संभावित सौदेबाजी की चर्चाएं तेज हो गई हैं। विधानसभा में झामुमो-कांग्रेस-राजद गठबंधन के पास स्पष्ट बहुमत है और संख्या बल के हिसाब से दोनों सीटों पर उसकी जीत लगभग तय मानी जा रही है। लेकिन भाजपा या किसी प्रभावशाली निर्दलीय उम्मीदवार के मैदान में उतरते ही चुनाव का पूरा समीकरण बदल सकता है।
81 सदस्यीय विधानसभा में राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए 28 वोटों की जरूरत है। गठबंधन के पास फिलहाल 56 विधायक हैं। 34 विधायकों वाली झामुमो अपने दम पर एक सीट आसानी से निकाल सकती है। इस सीट के लिए मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की बहन अंजली सोरेन और वरिष्ठ नेता विनोद पांडेय के नाम चर्चा में हैं।
दूसरी सीट पर कांग्रेस की दावेदारी सबसे मजबूत मानी जा रही है। पूर्व प्रदेश अध्यक्ष राजेश ठाकुर संभावित उम्मीदवारों में सबसे आगे बताए जा रहे थे, लेकिन देर रात कांग्रेस हाई कमान प्रणव प्रणव झा को मैदान में उतारा है। हालांकि कांग्रेस को जीत सुनिश्चित करने के लिए झामुमो के अतिरिक्त वोटों के साथ राजद और भाकपा माले के समर्थन की भी आवश्यकता होगी।
उधर भाजपा के नेतृत्व वाले राजग के पास 24 विधायक हैं। एक सीट जीतने के लिए उसे कम से कम चार अतिरिक्त वोटों की जरूरत होगी। असली राजनीतिक खेल यहीं से शुरू होता है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष आदित्य साहू और प्रदेश संगठन की ओर से संभावित उम्मीदवारों के नाम केंद्रीय नेतृत्व तक पहुंचाए जा चुके हैं। पार्टी ऐसे चेहरे की तलाश में है जो राजनीतिक और सामाजिक दोनों स्तरों पर व्यापक समर्थन जुटा सके।
पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा का नाम शुरुआती चर्चाओं में था, लेकिन उन्होंने खुद को इस दौड़ से अलग कर लिया। इसके बाद उद्योगपति और पूर्व राज्यसभा सांसद परिमल नाथवानी का नाम फिर से चर्चा के केंद्र में आ गया है। यदि भाजपा नाथवानी जैसे संसाधन-संपन्न और प्रभावशाली उम्मीदवार को मैदान में उतारती है तो चुनावी मुकाबला अचानक दिलचस्प और चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
झारखंड का इतिहास देता है आशंकाओं को हवा
झारखंड में राज्यसभा चुनावों का इतिहास हमेशा विवादों, क्रॉस वोटिंग और कथित खरीद-फरोख्त के आरोपों से जुड़ा रहा है। वर्ष 2012 का चुनाव तो भारतीय लोकतंत्र के सबसे चर्चित राजनीतिक घटनाक्रमों में गिना जाता है। मतदान से पहले एक वाहन से 2.15 करोड़ रुपये नकद बरामद हुए थे। आरोप लगा कि यह रकम विधायकों के वोट प्रभावित करने के लिए भेजी जा रही थी। विवाद इतना बढ़ा कि चुनाव आयोग को चुनाव ही रद्द करना पड़ा। यह देश के संसदीय इतिहास की बेहद दुर्लभ घटनाओं में से एक थी।
2010 में भी राज्यसभा चुनाव धनबल के आरोपों से घिरा रहा था। वहीं 2016 में संख्या बल होने के बावजूद झामुमो प्रत्याशी बसंत सोरेन को हार का सामना करना पड़ा था। इन घटनाओं ने साबित किया कि राज्यसभा चुनावों में केवल आंकड़ों का गणित ही निर्णायक नहीं होता, बल्कि राजनीतिक प्रबंधन और अंदरूनी समीकरण भी बड़ी भूमिका निभाते हैं।
संख्या गठबंधन के पास, लेकिन नजरें क्रॉस वोटिंग पर
फिलहाल सत्ता पक्ष पूरी तरह एकजुट होने का दावा कर रहा है। यदि गठबंधन के सभी विधायक निर्धारित रणनीति के अनुसार मतदान करते हैं तो दोनों सीटें उसके खाते में जा सकती हैं। लेकिन भाजपा या कोई मजबूत निर्दलीय उम्मीदवार मैदान में उतरता है तो राजनीतिक हलचल बढ़ना तय है। ऐसे में झारखंड की राजनीति एक बार फिर उन सवालों के घेरे में आ सकती है, जिनका संबंध क्रॉस वोटिंग, विधायकों की नाराजगी और कथित राजनीतिक सौदेबाजी से जुड़ा रहा है।
राज्यसभा चुनाव की घोषणा के साथ ही अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि क्या यह चुनाव सिर्फ संख्या बल का मुकाबला रहेगा या फिर झारखंड एक बार फिर करोड़ों के खेल और सियासी जोड़-तोड़ की चर्चाओं का केंद्र बनेगा।