Hormuz Strait : “जिसे ट्रंप हटाना चाहते थे, वही आज मध्य पूर्व की नई ताकत बनकर उभरा! होर्मुज से परमाणु कार्यक्रम तक, क्या हर मोर्चे पर अमेरिका को झुकना पड़ा?”
Hormuz Strait : जिस मुज्तबा खामेनेई को युद्ध की शुरुआत में डोनाल्ड ट्रंप और अमेरिकी खेमे ने “अस्वीकार्य” करार दिया था, आज हालात ऐसे बन गए हैं कि अमेरिका को उसी ईरानी सत्ता ढांचे के सामने झुकना पड़ रहा है। न तो ईरान में सत्ता परिवर्तन हुआ, न ही तेहरान ने घुटने टेके। उल्टा, युद्ध के बाद ईरान पहले से ज्यादा मजबूत स्थिति में दिखाई दे रहा है।
सबसे बड़ा झटका अमेरिका को होर्मुज स्ट्रेट के मोर्चे पर लगा है। युद्ध से पहले दुनिया के लिए लगभग मुक्त और निर्बाध रहने वाला यह समुद्री मार्ग अब ईरान-ओमान की नई रणनीति के केंद्र में है। दोनों देश ऐसी व्यवस्था तैयार कर रहे हैं, जिसके तहत भविष्य में जहाजों की सुरक्षित आवाजाही के बदले शुल्क वसूला जा सकता है।
यही वजह है कि अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो को खाड़ी देशों के दौरे पर निकलना पड़ा। ओमान और ईरान के साझा बयान के बाद रुबियो ने साफ कहा कि अमेरिका होर्मुज पर किसी भी प्रकार का ईरानी टोल या शुल्क स्वीकार नहीं करेगा। लेकिन सवाल यह है कि अगर सब कुछ अमेरिका की योजना के मुताबिक हुआ है, तो फिर इतनी बेचैनी क्यों?
परमाणु कार्यक्रम पर भी ट्रंप के दावे सवालों के घेरे में
ट्रंप लगातार दावा कर रहे हैं कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह निष्प्रभावी कर दिया गया है। लेकिन जमीन पर तस्वीर अलग दिखाई दे रही है। ईरान ने साफ कर दिया है कि उसके परमाणु कार्यक्रम पर कोई अंतिम समझौता नहीं हुआ है और IAEA निरीक्षण को लेकर भी अमेरिकी दावों को तेहरान ने खारिज कर दिया है।
ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने स्पष्ट कहा कि परमाणु ठिकानों के निरीक्षण को लेकर जो बातें कही जा रही हैं, उनका वास्तविकता से कोई संबंध नहीं है।
मिसाइल कार्यक्रम पर भी नहीं झुका ईरान
ट्रंप ने अपनी रैलियों में दावा किया था कि ईरान के मिसाइल कार्यक्रम को भी सीमित किया जाएगा। लेकिन ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने दो टूक कहा कि मिसाइल क्षमता ईरान की राष्ट्रीय सुरक्षा का विषय है और यह किसी भी समझौते का हिस्सा नहीं है।
उनका कहना था कि यदि ईरान के पास मजबूत मिसाइल शक्ति नहीं होती तो अमेरिका और इजराइल देश को भारी नुकसान पहुंचा सकते थे।
क्या अमेरिका को माननी पड़ीं ईरान की शर्तें?
आलोचकों का दावा है कि युद्ध रोकने और तनाव कम करने के लिए वाशिंगटन को कई मोर्चों पर नरमी दिखानी पड़ी। प्रतिबंधों में राहत, जब्त संपत्तियों के मुद्दे और पुनर्निर्माण सहायता जैसे विषयों पर अमेरिका को पीछे हटना पड़ा। जबकि होर्मुज स्ट्रेट पर ईरान का प्रभाव अब भी बरकरार है।
यही कारण है कि ट्रंप प्रशासन जीत का नैरेटिव पेश कर रहा है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कई विश्लेषक इसे अमेरिका की रणनीतिक कमजोरी के रूप में देख रहे हैं। सवाल अब भी कायम है—क्या यह वास्तव में ट्रंप की जीत है या फिर ईरान की कूटनीतिक बढ़त?