ध्रुव गुप्त
(आईपीएस) पटना
Muharram 2026 : माहे मुहर्रम का आज दसवां दिन है जिसे यौमें आशूरा भी कहा जाता है। आज के दिन का का इस्लाम के ही नहीं, मानवता के इतिहास में भी महत्वपूर्ण स्थान है। यह वह दिन है जब सत्य और न्याय के लिए संघर्षरत हज़रत मोहम्मद के नवासे हुसैन इब्न अली की कर्बला के युद्ध में उनके बहत्तर स्वजनों और दोस्तों के साथ शहादत हुई थी। हुसैन विश्व इतिहास की ऐसी कुछ उन विभूतियों में हैं जिन्होंने बेहद सीमित सैन्य क्षमता के बावज़ूद आततायी यजीद की विशाल और बर्बर सेना के आगे आत्मसमर्पण कर देने के बजाय लड़ते हुए अपनी और अपने समूचे कुनबे की क़ुर्बानीदे देना स्वीकार किया था। कर्बला में इंसानियत के दुश्मन यजीद की अथाह सैन्य शक्ति के विरुद्ध हुसैन और उनके थोड़े-से स्वजनों के प्रतीकात्मक प्रतिरोध और आख़िर में उन सबको भूखा-प्यासा रखकर यजीद की सेना द्वारा उनकी बर्बर हत्या के किस्से और मर्सिया पढ़ और सुनकर मुस्लिमों की ही नहीं, हर संवेदनशील व्यक्ति की आंखें नम हो जाती हैं – कब था पसंद रसूल को रोना हुसैन का/आग़ोश-ए-फ़ातिमा थी बिछौना हुसैन का / बेगौर ओ बेकफ़न है क़यामत से कम नहीं / सहरा की गर्म रेत पे सोना हुसैन का ! मनुष्यता और न्याय के हित में अपना सबकुछ लुटाकर कर्बला में हुसैन ने जिस अदम्य साहस की रोशनी फैलाई, वह सदियों सदियों से न्याय और उच्च जीवन-मूल्यों की रक्षा के लिए लड़ रहे लोगों की राह रौशन करती आ रही है।कहा भी जाता है कि ‘क़त्ले हुसैन असल में मरगे यज़ीद हैं / इस्लाम ज़िन्दा होता है हर कर्बला के बाद।’ इमाम हुसैन का बलिदान संपूर्ण मानवता के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं।
लोग सही कहते हैं कि न्याय के पक्ष में संघर्ष करने वाले लोगों की अंतरात्मा में इमाम हुसैन आज भी ज़िन्दा हैं, मगर यजीद भी अभी कहां मरा है ? यजीद व्यक्ति का नहीं,एक अन्यायपूर्ण और बर्बर सोच का नाम है। दुनिया में जहां कहीं भी आतंक, अन्याय, बर्बरता, अपराध और हिंसा है, यजीद वहां मौज़ूद है। यही वज़ह है कि हुसैन हर दौर में प्रासंगिक हैं। आज का दिन उनके बलिदान से प्रेरणा लेते हुए मनुष्यता, समानता, अमन, न्याय और अधिकार के लिए उठ खड़े होने का अवसर भी है और चुनौती भी।