* 29 जून को नियुक्ति पत्र… 30 जून को रिटायरमेंट! क्या यही है वर्षों की मेहनत का इनाम? क्या यही है सरकारी व्यवस्था की संवेदनशीलता?
Jharkhand : झारखंड में सहायक आचार्य नियुक्ति के नाम पर ऐसा नज़ारा देखने को मिला है, जिसने पूरी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिन शिक्षकों ने 15-20 साल तक पारा शिक्षक के रूप में बच्चों का भविष्य संवारने में अपनी ज़िंदगी लगा दी, उन्हें नियमित नियुक्ति तब मिली जब उनकी सेवा करने की उम्र ही खत्म हो गई।
जामताड़ा के नंदलाल रवानी को 29 जून को नियुक्ति पत्र मिला और 30 जून को वे 60 वर्ष पूरे कर सेवानिवृत्त हो गए। यानी सरकारी नौकरी का सपना सिर्फ 24 घंटे का निकला।
वहीं पलामू के नियुम अंसारी तो नियुक्ति पत्र मिलने से पहले ही सेवानिवृत्ति की आयु पार कर चुके थे। नियुक्ति मिली, लेकिन सेवा करने का अवसर कभी नहीं मिला। सोचिए, वर्षों का संघर्ष… और अंत में हाथ में सिर्फ एक कागज़!
सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर अभ्यर्थी पात्र थे, परीक्षा पास कर चुके थे और चयनित भी थे, तो नियुक्ति प्रक्रिया पूरी करने में आखिर तीन साल क्यों लग गए? इस प्रशासनिक देरी की कीमत आखिर शिक्षकों ने ही क्यों चुकाई?
सरकारें अक्सर रोजगार देने के दावे करती हैं, लेकिन यदि नौकरी तब मिले जब कर्मचारी अगले ही दिन रिटायर हो जाए, तो इसे उपलब्धि नहीं बल्कि व्यवस्था की विफलता कहा जाएगा।
यह सिर्फ दो शिक्षकों की कहानी नहीं, बल्कि उस सिस्टम का आईना है जहाँ फाइलों की रफ्तार इंसान की उम्र से भी धीमी पड़ जाती है। सवाल उठना लाज़िमी है—क्या इतने वर्षों तक इंतजार कराने वालों की कोई जवाबदेही तय होगी, या फिर ऐसे ही लोगों के सपनों का सरकारी कागज़ों में अंतिम संस्कार होता रहेगा?