रेहान
Diljit Dosanjh : दिलजीत दोसांझ को कुछ दिन पहले कोकरोच जनता पार्टी ने अप्रोच किया, दिलजीत ने ये कहते हुए इंकार कर दिया कि मै राजनेता नहीं हू।
इस बात से बहुत लोगों को लगा कि,दिलजीत डरपोक है,पर दिलजीत जिस कौम से आते है,दिलजीत जिस मिट्टी की उपज है,वो बंजर हो जाएगी लेकिन डरपोक पैदा नहीं करती।
पंजाब के बदन पर इतने घाव है, पंजाब की पीठ पर इतने खंजर है, कि तरीके से देखा जाए तो पंजाब या पंजाबियों का अस्तित्व बहुत पहले खत्म हो जाना चाहिए,आखिर किस वक्त की कौनसी ताकत में इन्हें गिराने या मिटाने,या तोड़ने की कोशिश नहीं की है।
पर न पंजाब मिटा न पंजाबियत,आखिर क्यू? क्योंकि पंजाब की हर पीढ़ी में कोई न कोई,जसवंत सिंह खालरा,कोई दिलजीत पैदा होता है, जिसके लिए दुनिया की हर कामयाबी से ज्यादा जरूरी उसका पंजाब है,वहा के लोग वहां की मिट्टी है।
पंजाब की मिट्टी से निकला हर कामयाब और मशहूर शख्स खुद को उम्र भर अपनी मिट्टी का कर्जदार मानता है, पंजाबी दुनिया के किसी भी कोने में चले जाए,कामयाबी और शोहरत की कितनी भी ऊंचाई पर क्यू न पहुंच जाए,उन्हें हमेशा अपनी मिट्टी,उसके घाव और उसका कर्ज याद रहता है।
आप दिलजीत की फिल्मोग्राफी देखिए, आपको ऐसा लगेगा जैसे दिलजीत किसी मिशन में निकले है। मानो वो अपने सर से अपनी मिट्टी के कर्ज चुकाने के लिए बहुत बेचैन है।
सोचिए चमकीला बनाते वक्त, और जसवंत सिंह खालरा पर बनी फिल्म के दौरान,दोनों ही बार इसे बनाने वाले जब दिलजीत के पास पहुंचे, तो उन्हें पता चला कि दिलजीत तो पहले से ही इन दोनों के बारे में जानते है,और खुद भी फिल्म बनाने की कोशिश कर रहे है।
सोचिए कितने स्टार आज ऐसे है? जो अपनी कौम या अपनी मिट्टी पर हुए जुल्म ओ सितम को न सिर्फ याद रखते हो, बल्कि अपनी आर्ट के जरिए से उस जख्म को दुनिया के सामने भी रखने की हिम्मत रखते हो,वो भी एक बार नहीं, बार बार।
दिलजीत शायद कभी सड़क पर लाठी नहीं खाएंगे, शायद कभी धरने पर नहीं बैठेंगे,उन्हें ये सब करना भी नहीं चाहिए क्योंकि वो राजनेता नहीं है। वो कलाकार है, उन्हें जो कहना होगा वो गाकर कह देंगे,या फिर पर्दे पर निभाकर कह जाएंगे।
चाहे वो जोगी की कहानी हो, चाहे वो पंजाब 85 हो,या फिर चमकीला की कहानी हो या फिर आज शहीद जसवंत सिंह खालरा पर बनी फिल्म हो।
दिलजीत ने पंजाब के गांव से जुड़ी कभी किसी फिल्म को काम की तरह लिया ही नहीं,ये उनके लिए फर्ज जैसा था,मानो वो सेवा कर रहे हो,और शुरू में मुझे भी लगा कि ये सब दिलजीत की पीआर के चोंचले होंगे।
पर जिस तरह के रिस्क दिलजीत ने अपने छोटे से करियर में,पंजाब की खातिर लिए है और लगातार लेते जा रहे है,वैसे रिस्क तो दुनिया की कोई भी पीआर एजेंसी अपने क्लाइंट को लेने नहीं देंगी।
सोचिए कौनसा एक्टर ऐसी कंट्रोवर्शियल फिल्म के साथ 5 साल खड़ा रहता है, जिस फिल्म के लिए उसने एक रुपया भी न लिया हो।
जब किसी और क्षेत्र में कोई स्टार बनता है तो वो अपने घर परिवार का नाम लेकर चलता है, और वही जब पंजाबी मशहूर होते है, तो वो अपने पिंड अपने गांव का नाम किसी तमगे की तरह अपने सीने से लगा लेते है।
दिलजीत अपने कंसर्ट में पंजाब और पंजाबियत को किसी प्रोप की तरह इस्तेमाल नहीं करते है, ये उनकी आइडेंटिटी है,ये उनके वजूद से ऐसे ही चिपका है जैसे उंगलियों से नाखून।
कहते है कि किसी कलाकार की कलाकारी कैसी है, ये इस बात से भी तय होती है कि वो कलाकार काबिल होने के साथ साथ, कितना बहादुर है, या कितना डरपोक,डरपोक कलाकार कितना भी काबिल या कामयाब क्यू न हो, कलाकार कहलाने लायक नहीं रहता।
दिलजीत ने बीते सालों में, जिस तरह के सब्जेक्ट पर जिस तरह की परफॉर्मेंस दी है, ये एक तरह की नाइंसाफी होगी अगर आप इस बात से इनकार करेंगे,कि इस वक्त, पूरी भारतीय इंडस्ट्री में,कोई भी एक्टर दिलजीत जितनी हिम्मत काबिलियत नहीं रखता है।
पर मुझे लगता है कि पंजाब की हर गली हर मुहल्ले में दिलजीत जैसे बहादुर बच्चे रहते होंगे, जो अपने अपने तरीके से अपनी अपनी लड़ाई लड़ रहे है, पंजाब का वजूद ही ऐसे बहादुर बच्चों की जद्दोजहद और जिद से टिका हुआ है।
और एक बार फिर, बड़ी बड़ी ताकते पंजाब के दोसांझ पिंड के एक लड़के की अपनी मिट्टी का का कर्ज चुकाने की जिद के आगे हार गई है। तारीख दिलजीत की परफॉर्मेंस को जितना याद रखेगी,उतना याद रखेगी दिलजीत की बहादुरी को,और बहादुरी ही पंजाब की पहचान है।
जुल्म लाखों की भीड़ भी करे तो एक अकेले का उस जुल्म के खिलाफ खड़े हो जाना पंजाबियत है, और दिलजीत इस पंजाबियत को,बहुत ऊंचाई पर ले जाने वाले है,इतना कि पंजाब की माए बच्चों को एक दिन दिलजीत की बहादुरी की कहानियां सुनाएंगी।
और शायद ऐस बहादुरों की कहानियां ही है, कि पंजाब बंजर हो जाएगा,पर कायर पैदा नहीं करेगा, क्युकी पंजाबियत का मायने ही बहादुरी है,रेजिस्टसेंस है, जिद और जज्बा है।