Satluj : ‘सतलज’ पर क्यों मचा विवाद? शहीद जसवंत सिंह खालरा की कहानी फिर चर्चा में

Bindash Bol

रेहान
Satluj : सतलज फिल्म तीन साल से अटकी हुई थी, क्युकी जिस आदमी की ये कहानी और उस आदमी की जिस चीज के खिलाफ लड़ाई थी, कोई भी सत्ता हो, वो कभी नहीं चाहेगी कि ऐसे नरसंहार या उसके खिलाफ आवाज उठाने ऐसे बहादुर इंसान के बारे में ज्यादा से ज्यादा लोग जाने।

शहीद जसवंत सिंह खालरा,एक आम आदमी थे,घर परिवार वाले,एक दिन अपने खोए हुए कलीग को ढूंढते हुए अमृतसर के एक श्मशान में पहुंचते हैं।

और वहां पहुंचकर उन्हें पता चलता है कि उस वक्त की न्याय व्यवस्था ने बिना किसी ट्रायल,हजारों लोगों को पहले जान से मारा और फिर उनकी लाश को लावारिस घोषित कर दिया।

ये उन लोगों की लाशे थी,जिन्हें न्याय व्यवस्था उनके घर से उठाकर ले गई थी,और मारने के बाद उन्हीं को याद नहीं था कि हमारी बिछाई इन लावारिस लाशों का वारिस कौन है, कहा है।

जसवंत पहले नहीं थे,जिनका सामना इस हकीकत से हुआ था,बस उनसे पहले वाले शायद इतने बहादुर नहीं थे,पर जसवंत डरने वालों में से नहीं थे,ख़ून में शहादत थी,इसलिए लड़ गए,उस समय की सबसे क्रूरतम न्याय व्यवस्था से।

और हर तरह की सत्ता हर तरह की हुकूमत, हमेशा जसवंत सिंह जैसे बहादुर लोगों से डरती है, क्योंकि ऐसे बहादुर लोग व्यवस्था की सिर्फ असलियत सामने नहीं लाते,बल्कि सत्ता की फितरत को दुनिया के सामने जाहिर कर देते है।

और इनकी फितरत में जानते क्या है? आपको आपके परिवार को आपके बच्चों को,शांति और व्यवस्था के बहाने,अपनी जूती के नीचे रखना,अलग दौर होगा,अलग बहाने होंगे,पर आम आदमी जूती के नीचे ही रहेगा।

हा ये भी है कि ये आपको कुचलेंगे नहीं,बस इतना कमजोर बनाकर रखेंगे कि आप चू न करे,और गलती से आपने कभी चूं तक कर दिया,तो ये पहले तो आपको अपनी जूती के नीचे मसलेंगे,और फिर आपकी हत्या को जस्टिफाई भी कर देंगे।

ऐसा न हो,इसलिए इतिहास में अनगिनत क्रांतियां अनगिनत आंदोलन हुए है,जिनका मकसद सिर्फ ये था,की हर इंसान की मानवीय हितों की रक्षा सुनिश्चित की जाए। इसी के लिए एक व्यवस्था खड़ी की जाती है और उस व्यवस्था की जवाबदेही तय की जाती है।

सतलज उस हालात की कहानी है, जो हालात तब पैदा होते है, जब न्याय व्यवस्था को, जवाबदेही से आजाद कर दिया जाता है, जब सत्ता रक्षक और भक्षक के बीच का फर्क भूल जाती है।

सतलज फिल्म किसी भी व्यक्ति विभाग संस्था से नफ़रत करना नहीं सिखाती,बल्कि हर व्यक्ति विभाग और संस्था से उनकी जिम्मेदारी पर सवाल पूछती है।

सवाल और जिम्मेदारी यही दो कारण है, जिसकी वजह से सतलज का ओरिजिनल नाम बदला गया। ये दो बाते आम आदमी समझ ना जाए इसीलिए सतलज को तीन साल लटकाए रखा गया। और आज ओटीटी से हटा दिया गया।

पर सलाम है हनी त्रेहान को, जो अपनी फिल्म ,उस के सक्जेक्ट उसके मैसेज के साथ चट्टान की तरह खड़े रहे, अगर बीते तीन सालों में, हनी या दिलजीत में से कोई भी डर जाता,झुक जाता,तो ये एक शहीद के बलिदान का अपमान होता कि कैसे डरपोक लोग उनकी कहानी कह रहे है।

पर विडंबना देखिए कि, जसवंत सिंह पर बनी फिल्म को भी, उसी तरह सिस्टम से उलझना पड़ा जिस तरह से उलझते उलझते वो शहीद हो गए थे,पर न जसवंत सिंह को कोई सत्ता रोक पाई, न उनकी कहानी को रोक पाएंगी।

ये फिल्म,इसके बनने की कहानी,और जिसकी कहानी पर ये फिल्म बेस्ड है, तीनों चीजें इस फिल्म को इतिहास में वो जगह देती है, जहा हर दौर में इस फिल्म को इंसान के मानवीय हितों और अधिकारों के लिए लड़ी गई एक लड़ाई के तौर पर याद किया जाएगा।

ये फिल्म हर उस इंसान को देखनी चाहिए,जिन्हें ये गलतफहमी है कि पुलिस वालों से गोली का हिसाब मांगकर हमने उन्हें अपराधियों के सामने निहत्था छोड़ दिया है..

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