क्या शानदार स्क्रीन प्रेजेंस काफी है, या बेहतरीन एक्टिंग के लिए एक्सेंट और इम्प्रोवाइजेशन भी ज़रूरी है?
रेहान
Alpha : अल्फा के विलेन के रोल में बॉबी देओल से जो गलती हुई है, वो ये साबित करती है,कि बॉबी देओल,क्यों कभी मनोज वाजपेई और पंकज त्रिपाठी जितने बेहतर एक्टर नहीं बन पाएंगे।
क्योंकि बॉबी देओल सज्जन आदमी है,पर एक्टिंग के प्रोफेशन में सज्जन होना काफी नहीं ,यहां चालाक होना पड़ता है, जैसे आज हरियाणवी एक्सेंट में बॉबी रंगे हाथों पकड़े गए है, सेम यही हालत मनोज वाजपेई और पंकज त्रिपाठी की भी हो सकती थी।
पंकज त्रिपाठी जब बहुत पॉपुलर नहीं थे तब उन्होंने एक कमाल की फिल्म की थी, गुड़गांव नाम था शायद, जिसमें पंकज को एक हरियाणवी रियल एस्टेट माफिया का रोल किया था,पर पंकज ठहरे बिहार के,तो उन्होंने हरियाणवी एक्सेंट की अपनी कमी छुपाने के लिए, पूरी फिल्म में डायलॉग बहुत धीमे बोले है, और ज्यादातर सीन में बस सर हिलाकर या आंखों से काम चला लिया।
यही चीज मनोज वाजपेई ने की थी जब उन्हें भोंसले फिल्म में एक मराठी रिटायर्ड कांस्टेबल का रोल करना था, मनोज भी किसी कारण से एक्सेंट पर पकड़ बना नहीं पाए थे,और इसे छुपाने के लिए उन्होंने डायलॉग धीमे बोले, इतना कि कई जगह मंबल करते लगते है,जिसें बाद में शायद डायरेक्टर ने एडिटिंग टेबल पर ठीक किया होगा।
यही चीज बॉबी देओल नहीं समझ पाएं, और होवे धोवे और सोवे में भाई ने अपने लोए लगा लिए। एक्टिंग में आपको अपनी औकात का पता होना बहुत जरूरी होता है जिसे रेंज कहते है। रेंज बड़ी होना जितना जरूरी है, उससे कही ज्यादा जरूरी है अपनी रेंज का पता होना।
तरीके से देखा जाए तो मनोज और पंकज दोनों को अपने अपने एक्सेंट पर मेहनत करनी चाहिए थी,उन्होंने नहीं किया जिसके लिए ये दोनों आलोचना के हकदार थे।
पर उनकी ये दगाबाजी कभी एक्सपोज़ ही नहीं हो पाई, वही बॉबी देओल एक्पोज हो गए,वो भी ऐसे समय में जब पूरी दुनिया उनकी एक्टिंग की दुनिया के कमाल की वापसी के कसीदे पढ़ रही थी।
मनोज और पंकज ने जो किया,वो बेशक विश्वासघात था,आलस था,अपने काम के प्रति, पर इसलिए आपको दुनिया की रगड़ में घिसना जरूरी होता है, इससे प्रेसेंस ऑफ माइंड आता है, वरना सोचिए,मनोज ,पंकज और बॉबी,तीनों ने अपने अपने काम के साथ बेईमानी की,लेकिन मनोज को नेशनल अवार्ड मिला भोंसले के लिए, पंकज को तारीफ और बॉबी को मिली गाली।
यही वो हिस्सा है एक्टिंग की लड़ाई का, जहां नेपोटिज्म हमेशा थियेटर के एक्टर्स से हारता रहेगा,हमेशा मतलब हमेशा,क्योंकि बॉबी ने वो सिचुएशन झेली ही नहीं है, जहा आपको ऑन स्टेज अचानक से इंप्रोवाइज करना होता है, अपनी गलती या अपने साथी की गलती को छिपाना या ढकना होता है,वो भी बिना ऑडियंस को भनक लगे।
आप किसी भी फील्ड में हो, लम्बा खेलना है तो इम्प्रोविजेशन सीखना होगा, स्थिति और अपनी औकात को समझना आना चाहिए,मानना आना चाहिए कि हम क्या नहीं का पाएंगे, तो उसे किस तरह से करे कि हमारी कमियां एक्सपोज न हो,और इसके लिए बहुत रगड़ खानी पड़ती है, जो अच्छे लड़के खाते है,अच्छे घर के लड़के नहीं।