Pakistan India Tensions : जब कोई देश कमरतोड़ महंगाई, बदहाल अर्थव्यवस्था और आंतरिक असंतोष से पस्त हो रहा हो, तब वहां के हुक्मरानों का सबसे पुराना और आजमाया हुआ तरीका होता है—’बाहरी दुश्मन’ का खौफ दिखाकर जनता का ध्यान भटकाना। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ का हालिया भाषण इसी रणनीति का एक सटीक उदाहरण माना जा रहा है।
पाकिस्तान के स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर इस्लामाबाद में आयोजित ‘यादगार-ए-फतह’ कार्यक्रम में शहबाज शरीफ ने देश की जलती हुई समस्याओं (महंगाई, बेरोजगारी, कंगाली) पर बात करने के बजाय भारत के खिलाफ कड़े और आक्रामक शब्दों का इस्तेमाल किया।
1. ‘पानी की हर बूंद रेड लाइन’: सिंधु जल संधि पर गीदड़ भभकी
भारत द्वारा अप्रैल 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) को स्थगित किए जाने से पाकिस्तान बेहद दबाव और तिलमिलाहट में है।
* शहबाज का बयान: उन्होंने भारत को चेतावनी देते हुए कहा कि पाकिस्तान के पानी की एक-एक बूंद उसके लिए “रेड लाइन” है। अगर भारत अपना रुख नहीं बदलता, तो पाकिस्तान इसका कड़ा जवाब देगा।
* सैन्य टकराव की धमकी: मई 2025 में भारत द्वारा चलाए गए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ (जिसमें पाक-प्रशासित क्षेत्रों में आतंकी ठिकानों को तबाह किया गया था) का जिक्र करते हुए शरीफ ने कहा कि “हमारी शांति की चाहत को कमजोरी न समझा जाए। यदि संप्रभुता को चुनौती मिली, तो इस बार जवाब मई 2025 से भी ज्यादा भयानक होगा।”
भारत का सख्त रुख
कूटनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि शरीफ चाहे जो भी बयानबाजी करें, भारत ने अपनी नीति साफ कर दी है—यदि पाकिस्तान ने कोई दुस्साहस किया, तो भारत की जवाबी कार्रवाई ऐसी होगी कि दुनिया के नक्शे पर पाकिस्तान का भूगोल बदल सकता है।
2. अमेरिका और ट्रंप की ‘मक्खनबाज़ी’
अपने भाषण में शहबाज शरीफ ने पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को खुश करने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी।
* सीजफायर का श्रेय: शरीफ ने दावा किया कि मई 2025 के सैन्य तनाव के बाद भारत-पाक के बीच हुए युद्धविराम (Ceasefire) में ट्रंप ने “ऐतिहासिक और निर्णायक” मध्यस्थता की, जिससे कई जानें बचीं।
* भारत का खंडन: भारत इस तरह के किसी भी अमेरिकी मध्यस्थता के दावे को हमेशा खारिज करता आया है और इसे पूरी तरह द्विपक्षीय मामला मानता है।
3. जलते घरेलू मुद्दों पर ‘साजिशी चुप्पी’
शहबाज शरीफ का पूरा भाषण भारत-विरोधी बयानों और कश्मीर के पुराने राग तक ही सीमित रहा। लेकिन उन्होंने देश के उन जख्मों पर एक शब्द भी नहीं कहा, जो आज पाकिस्तान को अंदर से खोखला कर रहे हैं…
* PoJK में जनविद्रोह: पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में सरकार और सेना के खिलाफ हो रहे लगातार विरोध प्रदर्शनों पर पूरी तरह चुप्पी साधी गई।
* बलूचिस्तान का संकट: बलूचिस्तान में जारी सैन्य कार्रवाइयों और एयरफोर्स हमलों से उपजे मानवीय संकट पर कोई बात नहीं हुई।
* आर्थिक बदहाली: पाकिस्तान की आम जनता जिस महंगाई और बेरोजगारी से पिस रही है, उस पर प्रधानमंत्री के पास कोई ठोस खाका नहीं था।
भटकाव का पुराना खेल
विशेषज्ञों के अनुसार, शहबाज शरीफ का यह भाषण इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि पाकिस्तान का नेतृत्व अपनी आंतरिक नाकामियों को छिपाने के लिए आज भी भारत के नाम पर राष्ट्रवाद भड़काने की रणनीति अपना रहा है।
अब सवाल यह उठता है कि क्या खोखली बयानबाजी और आक्रामक भाषणों से पाकिस्तान की भूखी-प्यासी जनता का पेट भरेगा, या फिर हुक्मरानों को देर-सबेर इन वास्तविक आंतरिक चुनौतियों का सामना करना ही पड़ेगा?