India US Relations : भारतीय पेशेवर युवाओं के लिए अमेरिकी सरकार ने एक बार फिर लाखों मुश्किल बढ़ाने वाले प्रस्ताव पर विचार करने की योजना बनाकर आफत के पहाड़ को और ऊंचा कर दिया है। अभी तक नई नौकरी तलाशने के लिए 60 दिन का जो समय मिलता था, उस 60 दिन की मोहलत को खत्म करने के प्रस्ताव पर विचार चल रहा है। बता दें कि अमेरिका में भारतीय पेशेवर कामगारों की बड़ी संख्या है, इसलिए ट्रम्प प्रशासन के किसी भी ऐसे निर्णय का बहुत बड़ा असर भारतीय युवाओं पर पड़ने वाला है। उल्लेखनीय है कि अमेरिका में योग्य और ट्रेंड पेशेवरों को मिलने वाले एच-1बी वीजा का लाभ पाने वाले विदेशियों में सबसे बड़ी संख्या भारतीयों की है। इस प्रस्ताव का अर्थ यह होगा कि नौकरी का अनुबंध खत्म होने या अन्य कारणों से नौकरी जाने पर विदेशी कामगार और खासकर भारतीय पेशेवरों को तत्काल अमेरिका छोड़ना पड़ेगा। अगर ट्रंप प्रशासन ने विदेशी कामगारों से संबंधित प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया, तो इसका बहुत ही दूरगामी परिणाम भारतीय पेशेवरों को झेलना पड़ेगा और उन्हें तत्काल अमेरिका छोड़ना होगा। इस प्रस्ताव के बाद उन्हें अमेरिका छोड़ने के लिए कितने दिनों की मोहलत दी जाएगी, फिलहाल स्पष्ट नहीं है।
एक दूसरी आफत के रूप में भारत पर दबाव बनाने के लिए अमेरिकी सरकार ने भारत पर रूस से कच्चे तेल के आयात को कम करने, व्यापार नीतियों में ढील देने और अपनी रणनीतिक प्राथमिकताओं को बदलने के लिए कई आर्थिक और कूटनीतिक दबाव की परिस्थितियां पैदा कर दी हैं। अमेरिका ने रूस से तेल खरीद का हवाला देते हुए भारतीय उत्पादों पर आयात शुल्क बढ़ाकर 50 प्रतिशत तक कर दिया था। अमेरिकी सीनेट ने ‘सेंशनिंग रूस एंड ईरान एक्ट’ को भारी बहुमत से पारित किया है, जिसके तहत रूस से ऊर्जा आयात जारी रखने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने का प्रावधान है। कम शब्दों में समझने की इसे कोशिश करते हैं कि आखिर टैरिफ है क्या ? तो टैरिफ एक प्रकार का टैक्स या आयात शुल्क है जो किसी देश की सरकार द्वारा दूसरे देश से मंगाए जाने वाले आयातित सामानों पर लगाया जाता है।अमेरिका लगातार भारत पर दबाव बना रहा है कि वह अपने कृषि, डेयरी क्षेत्र, पोल्ट्री और जेनेटिकली मॉडिफाइड उत्पादों के बाजारों को अमेरिकी कंपनियों के लिए पूरी तरह से खोल दे। रूस के खिलाफ नए प्रतिबंधों और भुगतान-बीमा प्रणालियों में सख्ती लाकर वैश्विक स्तर पर रूसी तेल परिवहन को बाधित कर दिया गया है, जिससे भारतीय रिफाइनरियों के लिए रसद संबंधी मुश्किलें पैदा हुई हैं। और, अब भारतीय आईटी पेशेवरों और कंपनियों को प्रभावित करने वाले एच-1बी वीजा नियमों को कड़े करने के संकेत दिए गए हैं।
अमेरिका ने भारत पर कूटनीतिक और आर्थिक दबाव मुख्य रूप से शीत युद्ध के दौर से ही अलग-अलग रूपों में डालना शुरू कर दिया था, जब भारत ने गुटनिरपेक्ष नीति अपनाई थी। इसके बाद 1990 के दशक में परमाणु और आर्थिक सुधारों के समय तथा हाल के वर्षों में रूस से तेल आयात व व्यापारिक नीतियों को लेकर यह दबाव स्पष्ट रूप से देखा गया है। भारत के गुटनिरपेक्ष आंदोलन में शामिल होने और सोवियत संघ के साथ झुकाव के कारण अमेरिका ने असहजता जताई थी। भारत के 1974 के पहले परमाणु परीक्षण (स्माइलिंग बुद्धा) के बाद अमेरिका ने परमाणु तकनीक और सहायता पर कड़े प्रतिबंध व दबाव बनाए। वर्ष 1993-1997 के दौरान बिल क्लिंटन प्रशासन ने मानवाधिकार, परमाणु मुद्दों और आर्थिक उदारीकरण को लेकर भारत पर लगातार दबाव बनाने की कोशिश की। हाल के वर्षों में (विशेषकर 2025-2026 के दौरान) अमेरिकी प्रशासन ने रूस से सस्ते कच्चे तेल की खरीद बंद करने या घटाने के लिए भारत पर भारी टैरिफ और आर्थिक दबाव की नीतियां अपनाई हैं। अमेरिकी ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव द्वारा भारत की डिजिटल भुगतान प्रणालियों और कृषि बाजारों को अमेरिकी कंपनियों के लिए खोलने को लेकर समय-समय पर आपत्ति और व्यापारिक दबाव डाला जाता रहा है।
अमेरिका द्वारा व्यापारिक प्रतिबंधों, टैरिफ और सैन्य हस्तक्षेप (जैसे वेनेजुएला व मध्य पूर्व में) के जरिये डाले जा रहे दबाव पर वैश्विक प्रतिक्रिया बंटी हुई है और तनावपूर्ण है। अधिकांश विकासशील और स्वतंत्र देश इसे एकतरफा दादागीरी बताते हैं, जबकि पश्चिमी देश और नाटो इस पर संभली हुई या समर्थक प्रतिक्रिया देते हैं। भारत ने रूस से तेल खरीद पर अमेरिकी प्रतिबंधों और टैरिफ के दबाव को सिरे से खारिज किया है। भारत ने इसे अपनी ऊर्जा सुरक्षा और 1.4 अरब लोगों की जरूरत बताया है, वहीं चीन ने अमेरिकी कार्रवाइयों को अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन और वर्चस्ववादी नीति करार दिया है। रूस ने अमेरिकी सैन्य और आर्थिक दबाव की कड़ी निंदा करते हुए इसे आधारहीन बताया है। क्यूबा और वेनेजुएला जैसे देशों ने अमेरिकी आक्रामकता को संयुक्त राष्ट्र चार्टर के खिलाफ और मानवता के लिए खतरनाक माना है। मध्य पूर्व के ऊर्जा संपन्न देश अमेरिकी दबाव और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव को अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा मानते हैं। ये देश किसी भी बड़े युद्ध को टालने के लिए कूटनीति और संयम बरतने की अपील कर रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र प्रमुख ने अमेरिकी एकतरफा सैन्य हस्तक्षेपों और दबाव की नीतियों पर गहरी चिंता जताई है और इसे वैश्विक शांति के लिए एक ‘खतरनाक मिसाल’ बताया है। दरअसल, संयुक्तराष्ट्र की नीति तथाकथित तटस्थ रहकर अधिक से अधिक युद्ध सामग्री बेचने तथा दुनियां के बाजारों में हाथ फेरने की रही है ।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दुनिया के तमाम देशों के खिलाफ टैरिफ को हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया है। ट्रंप ने कई मौकों पर साफ-साफ शब्दों में स्पष्ट किया है कि अमेरिका पूरी दुनिया का बॉस है।ट्रंप प्रशासन राष्ट्रीयता के नाम पर, विश्व बंधुत्व पर प्रहार करते युद्ध की महिमा गानी तथा पृथ्वी को फिर से बंटवारे के लिए अगले महायुद्ध के वास्ते लगभग भीषण तैयारी शुरू कर दी है । हालांकि, अमेरिकी दादागीरी के सामने भारत ने घुटने टेकने से इनकार कर दिया है। कई अन्य देश भी ट्रंप के टैरिफ वार और अड़ियल रवैये से बेहद नाराज हैं। हालांकि ऐसी स्थिति से निपटने के लिए भारत के शीर्ष पर विचार विमर्श तो कर ही रहे हैं, लेकिन जो सलाह दी जा रही है और उसके जो निहितार्थ छनकर सामने आ रहे हैं, वह यह कि अमेरिका के दबाव और व्यापारिक नीतियों से निपटने के लिए भारत को अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखनी चाहिए, आर्थिक और तकनीकी आत्मनिर्भरता को मजबूत करना चाहिए तथा रूस, यूरोपीय संघ और ग्लोबल साउथ के अन्य देशों के साथ अपने संबंधों को विविधतापूर्ण करना चाहिए।
भारत को अपनी विदेश और ऊर्जा नीतियों का संचालन राष्ट्रीय हितों के आधार पर करना चाहिए, न कि किसी बाहरी महाशक्ति के दबाव में। अमेरिका के साथ संवाद बनाए रखते हुए भी रूस, यूरोपीय संघ और पश्चिम एशिया के देशों के साथ स्वतंत्र संबंध जारी रखना चाहिए। ब्रिक्स और शंघाई सहयोग संगठन जैसे बहुपक्षीय मंचों का उपयोग करके वैश्विक व्यवस्था को बहुध्रुवीय बनाने पर जोर देना चाहिए। केवल एक देश या बाजार पर निर्भर रहने के बजाय व्यापारिक साझीदार बदलने और घरेलू उद्योगों को मजबूत करने का प्रयास होना चाहिए। सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और रक्षा विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता हासिल करना होगा, ताकि तकनीकी प्रतिबंधों का असर कम हो।साथ ही अंतरराष्ट्रीय व्यापार में अमेरिकी डॉलर के अलावा अन्य मुद्राओं या वैकल्पिक भुगतान तंत्रों को बढ़ावा देना होगा। यह तो यथास्थिति है, लेकिन फिर भी निर्णय तो शीर्ष पर बैठे कूटनीतिज्ञों और राजनीतिज्ञों को ही करना होगा।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं)