Congress : विधानसभा चुनावों से ठीक पहले राज्यों में संगठन की कमान बदलना कांग्रेस के लिए एक पुराना और अक्सर जोखिम भरा दांव साबित हुआ है। पंजाब में एक बार फिर चुनाव से महज 5 महीने पहले प्रदेश अध्यक्ष (अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग) से इस्तीफा ले लिया गया है। यह फैसला ऐसे समय आया है जब पार्टी के इतिहास का ट्रैक रिकॉर्ड इस बात की गवाही देता है कि ‘अंतिम समय के बदलाव’ का यह फॉर्मूला ज्यादातर मौकों पर नाकाम रहा है।
इतिहास गवाह है: चुनाव से पहले बदलाव, और परिणाम नाकामी
साल 2019 से लेकर अब तक, कांग्रेस ने अलग-अलग राज्यों में विधानसभा चुनावों से ऐन पहले 12 बार प्रदेश अध्यक्षों के चेहरे बदले हैं। आंकड़ों पर गौर करें तो इन 12 में से 10 राज्यों में पार्टी को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा है…
* महाराष्ट्र (2019): चुनाव से 3 महीने पहले अशोक चव्हाण की जगह बालासाहेब थोरात को कमान मिली, और पार्टी चौथे नंबर पर खिसक गई।
* हरियाणा (2019): चुनाव के 47 दिन पहले अशोक तंवर को हटाकर कुमारी शैलजा को जिम्मेदारी दी गई, लेकिन पार्टी बुरी तरह हार गई।
* पश्चिम बंगाल (2021): चुनाव से 7 महीने पहले अधीर रंजन चौधरी को कमान सौंपी गई, और पार्टी शून्य (0) सीट पर सिमट गई।
* छत्तीसगढ़ (2023): सत्ता में रहते हुए चुनाव से 4 महीने पहले मोहन मरकाम की जगह दीपक बैज को अध्यक्ष बनाया गया, और पार्टी सत्ता गंवा बैठी।
* बिहार (2025): चुनाव से 8 महीने पहले अखिलेश प्रसाद सिंह की जगह राजेश राम को कमान मिली, लेकिन पार्टी फ्लॉप रही और अध्यक्ष खुद अपनी विधायकी नहीं बचा पाए।
* असम (2025): चुनाव से 11 महीने पहले भूपेन बोरा को हटाकर गौरव गोगोई को जिम्मेदारी दी गई, लेकिन वे करिश्मा नहीं कर सके और खुद चुनाव हार गए।
* दिल्ली (2025): चुनाव से ठीक पहले देवेंद्र यादव को कमान मिली, लेकिन पार्टी का खाता तक नहीं खुल पाया।
* (अपवाद: झारखंड (2019) और केरल (2026) जैसे इक्का-दुक्का राज्यों को छोड़ दिया जाए, तो शेष लगभग सभी जगहों पर यह प्रयोग पूरी तरह असफल रहा है।)
पंजाब की पुरानी कसैली यादें और इस बार की चुनौतियां
पंजाब में कांग्रेस के लिए यह फॉर्मूला नया नहीं है। साल 2022 के विधानसभा चुनाव से ठीक 7 महीने पहले भी सुनील जाखड़ को हटाकर नवजोत सिंह सिद्धू को कमान सौंपी गई थी और कैप्टन अमरिंदर सिंह की जगह चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बनाया गया था। इसके बावजूद, अंततः आंतरिक कलह के चलते पार्टी सत्ता में वापसी नहीं कर पाई और खुद सीएम चन्नी भी चुनाव हार गए थे।
इस बार पंजाब की राह और भी ज्यादा कांटे भरी है..
* भीतरघात और गुटबाजी: पार्टी के भीतर खींचतान और गुटबाजी अपने चरम पर है।
* मजबूत राजनीतिक विकल्प: राज्य में आम आदमी पार्टी (AAP) की मजबूत पकड़ है।
* दायरा: ‘वारिस पंजाब दे’ जैसे संगठनों का उभार और भारतीय जनता पार्टी (BJP) का आक्रामक रुख (स्वयं गृह मंत्री अमित शाह द्वारा मोर्चा संभालना) कांग्रेस के लिए बड़ी मुश्किलें पैदा कर रहा है।
आंकड़े साफ तौर पर बताते हैं कि चुनावों से चंद महीने पहले केवल चेहरा बदल देने से संगठन की मैदानी कमजोरी और आंतरिक कलह दूर नहीं होती। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या पंजाब में नया नेतृत्व इस पुरानी और नाकाम साबित हो चुकी पटकथा को बदल पाता है या कांग्रेस एक बार फिर उसी इतिहास को दोहराने पर मजबूर होगी?
