RSS : भारत का इतिहास बताता है कि आर्य, यवन, शक, गुर्जर, जट्ट, हूण, अरब, तुर्क आदि कितनी ही जातियां समय-समय पर यहां आईं। उन्होंने पहले अपना अलग शासक या उपनिवेशवादी समाज कायम कर यहां की राष्ट्रीयता लेनी चाही; लेकिन जब शासन हाथ से जाता रहा, तो एक अलग जाति बनकर साधारण निवासियों का अंग बन गई। मार्क्स के शब्दों में सारे गृहयुद्ध, विदेशी आक्रमण, क्रांतियां, विजय, अकाल- चाहे जितनी ही तेज रहे हों और प्रथम दृष्टया फलदायक सिद्ध हुए हों, लेकिन अंतत: नाशकारी ही रहे हैं। लेकिन, इसे भारत का संस्कार ही कहा जाएगा कि ऐसी सोच हमारे अंदर नहीं घुस सकी। जिस परिवर्तन से यूरोपीय दुनिया बहुत पहले गुजर चुकी थी, भारत को उसे अपनाने के लिए मजबूर करना अंग्रेजों का काम था। अंग्रेज उन विजेताओं की भांति भारत में नहीं आए थे, जो भारत में आकर बाद में भारतीय बनकर रह गए। युनानियों, शकों, तुर्कों, मुगलों की भांति वह हिंदू नहीं बन गए। इन्हीं बातों को यदि संक्षेप में कहें तो अंग्रेजों का मकसद अपने शासक वर्ग या यूं कहें कि पूंजीपति वर्ग की स्वार्थ सिद्धि के लिए भारत का दोहन करना था- पहले व्यापार से, फिर व्यापार और शासन से, फिर व्यापार-शासन-पूंजीवादी शोषण से और कच्चे-पक्के माल के क्रय-विक्रय से। इस भारी शोषण में ग्रामीण प्रजातंत्र को बचाया नहीं जा सकता था, चाहे उसका कवित्वमय तात्कालीन और आधुनिक रूप कितने ही भावुक व्यक्तियों को बहुत आकर्षक मालूम क्यों न होता रहा हो। और, कौन सा अतीत है, जो आकर्षक नहीं होता!
ऐसा इसलिए, क्योंकि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंघ चालक मोहन भागवत की अगस्त 2026 में हुई अमेरिका (न्यूयॉर्क) यात्रा के दौरान मुख्य रूप से वैचारिक विरोध, मानवाधिकार संगठनों के दबाव और अमेरिकी धार्मिक स्वतंत्रता आयोग की आपत्तियों के कारण बड़ा घमासान मचा था। अमरीकी संस्था ने अमेरिकी सरकार से मोहन भागवत का वीजा रद्द करने और संघ के सदस्यों पर प्रतिबंध लगाने की मांग की। न्यूयॉर्क सिटी के मेयर ज़ोहरान ममदानी ने मैडिसन स्क्वायर गार्डन में होने वाले ‘यूनिवर्सल वननेस सेलिब्रेशन’ कार्यक्रम का खुलकर विरोध किया और संघ की विचारधारा को बहिष्कारी बताया। अमेरिकी, हिंदूस फॉर ह्यूमन राइट्स जैसे कई अंतरधार्मिक और मानवाधिकार संगठनों ने भारत में अल्पसंख्यकों की स्थिति का हवाला देकर कार्यक्रम रद्द करने की मांग को लेकर प्रदर्शन किए। भारत में अखिलेश यादव और असदुद्दीन ओवैसी जैसे विपक्षी नेताओं ने भी इस विदेश दौरे और वहां के कार्यक्रमों को लेकर तीखे सवाल उठाए। आयोजकों और संघ समर्थकों ने इन आरोपों को खारिज करते हुए इस यात्रा को वैश्विक सौहार्द्र, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और भारतीय प्रवासियों के साथ संवाद का कार्यक्रम बताया।
अवसर था अमेरिका के न्यूयार्क शहर स्थित प्रतिष्ठित मैडिसन स्क्वायर गार्डन में आयोजित यूनिवर्सल वननेस (एक विश्व, एक मानवता) शिखर सम्मेलन, जिसमें दुनिया के 30 देशों से आए 200 से अधिक धार्मिक नेताओं और प्रतिनिधियों ने नफरत, हिंसा और अविश्वास के खिलाफ एक सुर में आवाज उठाई। इस ऐतिहासिक आयोजन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत भी शामिल हुए थे। भगवत ने कार्यक्रम में मानवता की एकता पर जोर देते हुए भारत के सदियों पुराने वसुधैव कुटुंबकम की सोच का हवाला दिया और परोक्ष रूप से कहा कि धर्म और पूजा पद्धतियां अलग हो सकती हैं, लेकिन इंसानियत एक है। भागवत ने कहा कि वे स्वयं धार्मिक विद्वान या धार्मिक अथॉरिटी नहीं हैं, पर जिस समाज में वह काम करते हैं, उसकी परंपरा यह मानती है कि धर्म अलग हो सकते हैं, जबकि मानवता एक है। सत्य एक है और मानवता उसी सत्य की उपज है। अतः इंसानियत भी एक है। उन्होंने कहा कि मानवता की एकता की हिंदू अवधारणा में इस तरह किसी को बाहर करने की कोई जगह नहीं है।
न्यूयॉर्क में आयोजित अहेड फोरम की ओर से आयोजित फेथ लीडर्स कॉन्फ्रेंस में भागवत ने कहा कि सामाजिक और धार्मिक संगठन सार्वजनिक नीतियों और राजनीति को प्रभावित करना चाहते हैं, लेकिन उन्हें इसकी शुरुआत समाज से करनी होगी, क्योंकि ‘राजनीति अब स्वार्थ का खेल बन गई है।’ मोहन भागवत के इस बयान पर राजनीतिक और धार्मिक नेताओं की प्रतिक्रिया आई है। इन लोगों का कहना है कि भागवत जो कह रहे हैं, उस पर देश में भी अमल होना चाहिए। मोहन भागवत का यह कार्यक्रम शुरू होने से पहले ही विवादों में घिर गया था; क्योंकि न्यूयॉर्क सिटी के मेयर ज़ोहरान ममदानी ने सार्वजनिक तौर पर इस कार्यक्रम का विरोध किया था। उन्होंने आरएसएस की विचारधारा को बहिष्कारवादी और न्यूयॉर्क शहर के बहुलतावादी विचारों के उलट बताया था।
अब आलोचकों को सुनिए, जिनका कहना है कि संघ अमेरिका में ‘वसुधैव कुटुंबकम’ या वैश्विक एकता का संदेश देने का प्रयास कर रहा है, जो कि उसकी कट्टर दक्षिणपंथी और बहुसंख्यकवादी विचारधारा को ढंकने का एक मुखौटा मात्र है। अमेरिकी संस्था और कई नागरिक अधिकारों के समूहों ने भारत में धार्मिक अल्पसंख्यकों (मुसलमानों और ईसाइयों) तथा दलितों के खिलाफ कथित हमलों का हवाला देते हुए भागवत की यात्रा का विरोध किया। मानवाधिकार संगठनों और लगभग 40 से अधिक अमेरिकी समूहों ने अमेरिकी सरकार से मोहन भागवत का वीजा रद्द करने और उन्हें देश में मंच देने से रोकने की अपील की थी। आलोचकों का मानना है कि यह यात्रा केवल सांस्कृतिक संवाद नहीं है, बल्कि पश्चिमी देशों में अपनी वैचारिक पैठ बढ़ाने और राजनीतिक प्रभाव स्थापित करने का एक प्रयास है। दूसरी ओर, संघ के समर्थकों और भाजपा ने इस यात्रा को आरएसएस के शताब्दी वर्ष के वैश्विक जनसंपर्क और भारतीय संस्कृति के प्रसार का एक गौरवशाली अवसर बताया है।
आरएसएस प्रमुख की अमेरिका (न्यूयॉर्क) यात्रा के दौरान दिए गए बयानों पर वरिष्ठ अधिवक्ता और निर्दलीय राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल सहित विपक्षी नेताओं ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। कपिल सिब्बल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X और अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस के माध्यम से संघ प्रमुख पर सीधा तंज कसा। सिब्बल ने लिखा, ‘भागवत न्यूयॉर्क में कहते हैं कि विविधता हमारी स्वाभाविक एकता का आभूषण है, इसकी रक्षा की जानी चाहिए। यह ‘विदेश में समझदारी भरी बातें और घर में चुप्पी’ जैसा मामला है।’ उन्होंने जोर देकर कहा कि केवल अच्छे शब्दों से काम नहीं चलता, बल्कि हमारे काम (एक्शन) में यह नजर आना चाहिए। सिब्बल ने सवाल उठाया कि जब भारत में विविधता और समुदायों पर हमलों से जुड़े असल मुद्दे सामने आते हैं, तो भागवत की आवाज देश में क्यों नहीं सुनाई देती? चाहे अपने भारतवर्ष में कितना ही धर्म जाति के प्रति कट्टर हो, लेकिन जब वह विदेश की धरती पर जाता है, वह भारतीय होने का ही गौरव ही प्राप्त करता है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सदस्य या उसके सरसंघ चालक अपने देश में रहकर अपनी नीतियों से दूसरे समुदायों के प्रति कितना ही अलगाववादी बातें करते हों, लेकिन अमेरिका में उनकी पहचान भारतीय ही थी। कोई भी व्यक्ति अपने देश की बुराई करके कभी भी जन नायक नहीं बन सका है, कुछ अपवादों को छोड़कर जिन्होंने विदेशी जमीन पर जाकर वहां के चकाचौंध से प्रभावित होकर भारत जैसे देश में जन्म लेने पर अफसोस जताया हो। लेकिन, भारत उन्हें भी स्वीकार करता है। भारत में आकर वह भी अपने को भारतीय कहने पर गौरवान्वित महसूस करते हैं। यही हमारा भारत है जिसे हम सारे जहां से अच्छा कहते हैं। जिसका उल्लेख ऊपर किया जा चुका है कि अंग्रेजों को छोड़कर भारत मे जो भी आक्रांता आए, सभी भारत के अभिन्न अंग हो गए और इसी भारतीय जमीन में समाते रहे। इसी तरह सरसंघ चालक भी इसी को चरितार्थ करते हैं, लेकिन हां, इस बीच कोई गुप्त बैठक हो गई हो, इसका जिक्र अभी सामने नहीं आया है, इसलिए इस पर चर्चा बाद में ही होगी।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं)
