Delhi : रविवार दोपहर का ठीक 1:30 बजे का वक्त। दिल्ली के सत्य निकेतन की संकरी गलियों में कुछ ही सेकंड के भीतर धूल का ऐसा गुबार उठा जिसने सपनों को कफन में लपेट दिया। ‘हॉस्टल डेज’ नाम के पांच मंजिला पीजी का ताश के पत्तों की तरह ढह जाना कोई अप्रत्याशित दैवीय आपदा नहीं, बल्कि सिस्टम और मुनाफे के गठजोड़ से तैयार की गई एक सीधी लापरवाही है।
अब तक 6 मौतों और 11 रेस्क्यू के बीच मलबे के नीचे दबी जिंदगियों से ज्यादा भारी वे सवाल हैं, जिनका बोझ न तो नगर निगम उठा पा रहा है और न ही प्रशासन।
बेसमेंट में छेड़छाड़ और ऊपर जिंदगियों का दांव
* नींव पर वार: शुरुआती जांच के मुताबिक, इमारत के बेसमेंट में अवैध रूप से स्ट्रक्चरल बदलाव और निर्माण कार्य चल रहा था। जब नींव की दीवारों और बीम के साथ खिलवाड़ किया जा रहा था, तब ऊपर की मंजिलों पर 40 से अधिक छात्र सो रहे थे या पढ़ाई कर रहे थे।
* सुरक्षा प्रमाणपत्र नदारद: इमारत में न तो कोई ‘स्ट्रक्चरल सेफ्टी सर्टिफिकेट’ था और न ही कंस्ट्रक्शन के दौरान रहने वालों को सुरक्षित बाहर निकालने की कोई प्रोटोकॉल प्रक्रिया अपनाई गई।
* कमरों की अंधी गिनती: रिहायशी नक्शे पर पास मकानों को काट-छांटकर कबूतरखानों (4-4 कमरे प्रति फ्लोर) में बदला गया, ताकि हर महीने लाखों का किराया वसूला जा सके।
दिल्ली के छात्र हब: मौत के मुहाने पर खड़े ‘अवैध लॉज’
सत्य निकेतन अकेला नहीं है। मुखर्जी नगर, करोल बाग, लक्ष्मी नगर और विजय नगर जैसे इलाके इसी टाइम-बम पर बैठे हैं…
* अति-भार (Overloading): 50-60 गज के छोटे प्लॉटों पर बेसमेंट समेत पांच-छह मंजिलें खड़ी कर दी जाती हैं, जबकि बुनियादी ढांचा सिर्फ दो मंजिलों का भार सहने लायक होता है।
* बेसमेंट का व्यावसायिक दुरुपयोग: पार्किंग या स्टोरेज के लिए निर्धारित बेसमेंट में या तो अवैध लाइब्रेरी, डाइनिंग हॉल या फिर गैर-कानूनी कमरे बना दिए जाते हैं।
* निगरानी तंत्र की मिलीभगत: स्थानीय प्रशासन और नगर निगम के संबंधित प्रवर्तन विंग की नाक के नीचे भारी मशीनरी से बेसमेंट खोदे जाते हैं, लेकिन कोई चालान या सीलिंग की कार्रवाई समय पर नहीं होती।
व्यवस्था की वही घिसी-पिटी स्क्रिप्ट
हादसे के बाद वीआईपी मूवमेंट शुरू हुआ, मुआवजे के ऐलान हुए और “दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा” जैसे रटे-रटाए बयान जारी कर दिए गए। मगर कड़वी हकीकत यह है कि राहत कार्य खत्म होते ही फाइलें ठंडी पड़ जाएंगी।
सत्य निकेतन में केवल कंक्रीट और सरिये का एक ढांचा नहीं गिरा, बल्कि वह विश्वास ढह गया है जो दूर-दराज से आने वाले मां-बाप इस शहर की व्यवस्था पर करते हैं। जब तक अनियंत्रित पीजी संचालन, अवैध बेसमेंट निर्माण और भ्रष्ट निगरानी तंत्र पर आपराधिक मुकदमे दर्ज नहीं होंगे, तब तक देश की राजधानी में छात्रों की डिग्रियों से पहले उनकी मौत का हिसाब लिखा जाता रहेगा।
