Protest : धरने-प्रदर्शन नहीं… यह आर्थिक युद्ध है!

Bindash Bol
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Protest : भारत की आर्थिक उन्नति और अमेरिकी वर्चस्व की चुनौती: धरनों-प्रदर्शनों का असली चेहरा

Protest : भारत में विरोध के पीछे का छिपा खेल.. राजनीति नहीं, वैश्विक आर्थिक वर्चस्व की जंग

कुमार पद्मनाभ

Protest : आज देश के भीतर हो रहे धरनों, प्रदर्शनों और राजनीतिक उठापटक को सतह से देखना एक भूल होगी। यदि आप इन घटनाओं की परतें उधेड़ेंगे, तो पाएंगे कि इसके मूल में कोई पारंपरिक राजनीतिक संघर्ष नहीं, बल्कि विशुद्ध रूप से आर्थिक कारण हैं। ठीक वैसे ही, जैसे अमेरिका ने इराक में पेट्रोलियम संसाधनों पर नियंत्रण के लिए सद्दाम हुसैन को निशाना बनाया था, आज भारत की बढ़ती आर्थिक महाशक्ति की स्थिति के खिलाफ वैश्विक स्तर पर पर्दे के पीछे कूटनीतिक और आर्थिक व्यूह रचना रची जा रही है।

​इस गहरी पटकथा को समझने के लिए वैश्विक आर्थिक महाशक्ति के समीकरण और भारत की बढ़ती आत्मनिर्भरता के ताने-बाने को डिकोड करना होगा।

अमेरिका का आर्थिक साम्राज्य: तीन प्रमुख स्तंभ

​अमेरिका दुनिया का निर्विवाद आर्थिक महाशक्ति है और वह किसी भी कीमत पर अपने इस वैश्विक प्रभुत्व को आंच नहीं आने देना चाहता। उसकी आर्थिक धमक मूल रूप से तीन स्तंभों पर टिकी है…

तकनीक और मास प्रोडक्शन का मॉडल

अमेरिका की प्रयोगशालाओं में अत्याधुनिक तकनीक का जन्म होता है, जिसका वृहद स्तर पर उत्पादन (मास प्रोडक्शन) सस्ते श्रम वाले देशों में कराया जाता है—जैसे हार्डवेयर के लिए चीन और सॉफ्टवेयर के लिए भारत। उदाहरण के लिए, एक आईफोन का आविष्कार भले ही अमेरिका में होता है, लेकिन उसका हार्डवेयर चीन में बनता है और सॉफ्टवेयर भारत में तैयार होता है। औसतन एक आईफोन के निर्माण पर अमेरिका का खर्च महज दस हजार रुपये आता है, जबकि वैश्विक बाजार में एक लाख रुपये तक की कीमत पर बिकने वाले इस फोन से अमेरिका अकेले 80,000 से 90,000 रुपये तक का शुद्ध मुनाफा कमाता है। इसी तरह करोड़ों यूनिट बेचकर वह अरबों डॉलर की कमाई करता है।

अत्याधुनिक हथियारों का व्यापार

उन्नत और मारक हथियारों का निर्माण कर उन्हें विभिन्न देशों को निर्यात करना अमेरिकी अर्थव्यवस्था की एक मजबूत रीढ़ है।

पेट्रो-डॉलर का निर्बाध वर्चस्व

वैश्विक स्तर पर पेट्रोलियम उत्पादों की खरीद-फरोख्त केवल अमेरिकी डॉलर में होती है। इसी व्यवस्था ने अमेरिकी मुद्रा को अजेय बनाए रखा है और वैश्विक ऊर्जा बाजार पर उसका अप्रत्यक्ष नियंत्रण सुनिश्चित किया है।

​समय के पहिए ने करवट ली है और चीन ने इन समीकरणों को चुनौती दी। चीन अब केवल पारंपरिक हार्डवेयर मैन्युफैक्चरिंग तक सीमित नहीं रहा, बल्कि हुआवेई जैसे ब्रांड्स और इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) के जरिए उसने अमेरिकी वर्चस्व को सीधी टक्कर दी है। हालांकि, कड़े आर्थिक प्रतिबंधों के बाद अब अमेरिका को यह अहसास हो चुका है कि ड्रैगन से टकराने के बजाय उसके साथ समन्वय बिठाने में ही भलाई है।

भारत का उदय: वैश्विक प्रभुत्व के लिए एक नई चुनौती

​चीन के बाद अब भारत उसी आत्मनिर्भर राह पर अग्रसर है, जो वैश्विक आर्थिक व्यवस्था के पारंपरिक केंद्रों को बेचैन कर रहा है। किसी भी राष्ट्र की आर्थिक प्रगति का सबसे बड़ा उत्प्रेरक उसकी राजनीतिक स्थिरता होती है। मजबूत नेतृत्व और निर्णायक राजनीतिक इच्छाशक्ति के दौर में—विशेषकर वर्तमान प्रशासनिक कालखंड में—डॉलर के संदर्भ में भारत की प्रति व्यक्ति आय लगभग तीन गुना तक बढ़ चुकी है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र होने के बावजूद आंतरिक विविधताओं और चुनौतियों के बीच भारत लगातार 6 से 8 प्रतिशत की तेज विकास दर बनाए हुए है।

​इस अभूतपूर्व छलांग के पीछे तीन मुख्य बिंदु हैं जो सीधे तौर पर वैश्विक हितों को प्रभावित कर रहे हैं…

1.घरेलू कंजम्पशन और स्वदेशी तकनीक का विस्फोट

आज भारत अपनी विशाल आबादी की मांग को पूरा करने के लिए तीव्र गति से टेक्नोलॉजी का विकास कर रहा है। पिछले कुछ वर्षों में भारत में करीब 200 स्टार्टअप्स यूनिकॉर्न की श्रेणी में शामिल हो चुके हैं—यानी प्रत्येक ने 1 बिलियन डॉलर (दस हजार करोड़ रुपये) से अधिक का कॉर्पोरेट मूल्यांकन हासिल किया है। वह दिन दूर नहीं जब भारत के अंतरिक्ष तकनीक स्टार्टअप्स एलोन मस्क के स्टारलिंक जैसी प्रणालियों को वैश्विक स्तर पर कड़ी टक्कर देंगे। यह स्वदेशी तकनीकी सृजन अमेरिका के एकाधिकार को सीधी चुनौती दे रहा है।

2.रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता और बढ़ता निर्यात

भारत अब रक्षा उपकरणों के आयातकों की सूची से बाहर निकलकर एक प्रमुख निर्यातक बनता जा रहा है। पूर्वी यूरोप, आर्मेनिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों को भारतीय हथियारों की आपूर्ति शुरू होना वैश्विक रक्षा बाजार के पुराने समीकरणों को बदल रहा है।

3.हरित ऊर्जा और पेट्रो-डॉलर को चुनौती

पिछले कुछ वर्षों में देश के भीतर इलेक्ट्रिक ट्रेनों और इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) के बुनियादी ढांचे में अभूतपूर्व विस्तार हुआ है। जीवाश्म ईंधन और पेट्रोलियम पर निर्भरता तेजी से कम हो रही है, जो सीधे तौर पर वैश्विक पेट्रो-डॉलर व्यवस्था के भविष्य पर एक बड़ा सवालिया निशान है।

विरोध के पीछे का असली सूत्रधार

​क्या अमेरिका भारत की इस आर्थिक प्रगति को सहजता से स्वीकार कर सकता है? सच्चाई यह है कि भारतीय घरेलू बाजार का आकार इतना विशाल है कि तमाम बाहरी टैरिफ और व्यापारिक दबावों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था 7.8% की तेज रफ्तार से आगे बढ़ रही है।
​ऐसी स्थिति में वैश्विक ताकतों के पास सबसे आसान और आजमाया हुआ हथियार यही बचता है कि देश के भीतर किसी तरह राजनीतिक और सामाजिक अस्थिरता पैदा की जाए, ताकि नीतिगत निर्णय बाधित हों और राष्ट्रहित के बड़े प्रोजेक्ट्स की गति धीमी पड़े। यहाँ यह भी स्पष्ट है कि यह कूटनीतिक दबाव किसी खास दल तक सीमित नहीं है, क्योंकि देश की आर्थिक उन्नति की राह पर चलने वाला कोई भी नेतृत्व इस वैश्विक प्रतिस्पर्धा के दायरे में आएगा।
​इसलिए, आज सतह पर दिखने वाले विरोध प्रदर्शनों के शोर के पीछे छिपे इस बृहद आर्थिक षड्यंत्र को पहचानना और देश की तकनीकी व आर्थिक स्वायत्तता को बनाए रखना ही हमारी सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए।

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