SC-ST Act : आग से खेलने का जोखिम वही उठाता है, जिसे किसी का उपयोग करना होता है। लेकिन जब कोई व्यक्ति सरकारी सेवा और वर्दी के अनुशासन में रहकर लगातार अपमान और प्रताड़ना को सहन करता है, तो एक सीमा के बाद उसका संयम टूटना स्वाभाविक है। ऐसा ही कुछ देखने को मिला एसीपी विवेक भगत के मामले में, जिन्होंने पेशेवर गरिमा की रक्षा के लिए अंततः कानून का दरवाजा खटखटाया है।
क्या है पूरा मामला?
बीती 3 अक्टूबर को बुटा सिंह गोलचक्कर पर निर्वाचन आयोग के खिलाफ एक विरोध प्रदर्शन आयोजित किया गया था। ड्यूटी पर तैनात एसीपी विवेक भगत के अनुसार, इस दौरान कानून व्यवस्था बनाए रखने की उनकी जिम्मेदारी में बाधा डालने और सार्वजनिक रूप से उकसाने के उद्देश्य से उनपर जातिसूचक टिप्पणियां की गईं।
घटना के वक्त उनके साथ तैनात ऑपरेटर कांस्टेबल रवि दहिया ने भी एक पत्रकार को उनकी नेमप्लेट, जातिगत पहचान और एसीपी पद पर उनकी नियुक्ति को लेकर अपमानजनक भाषा का प्रयोग करते हुए स्पष्ट सुना। इस मामले में पुलिस ने रोजी, गजेंद्र और एक अन्य व्यक्ति को आरोपी बनाते हुए बीएनएस की धाराओं (धारा 221, 356(2), 3(5)) तथा अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धाराओं (3(1)p, 3(1)q, 3(1)r और 3(1)s) के तहत एफआईआर दर्ज की है।
संयम और कानूनी प्रक्रिया की मिसाल
एक उच्च पद पर आसीन होने और अनुसूचित जाति समुदाय से ताल्लुक रखने के बावजूद, एसीपी विवेक भगत ने उस वक्त मौके पर संयम का परिचय दिया। उन्होंने कानून को अपने हाथ में लेने के बजाय सीसीटीवी फुटेज और साथी पुलिसकर्मियों के बयानों के आधार पर कानूनी और तथ्यात्मक रूप से एफआईआर दर्ज कराई।
दूसरी ओर, इस मामले में आरोपी महिला पत्रकार रोजी के रुख ने इसे एक नया मोड़ दे दिया है। उन्होंने अपने ऊपर लगे आरोपों को यह कहते हुए खारिज किया कि पहले पुलिस एफआईआर वापस ले या मामले की दोबारा जांच हो, तभी वे सबूत देंगी। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यदि उनके पास कोई साक्ष्य था, तो उन्हें उचित कानूनी रास्ते (कोर्ट) का रुख करना चाहिए था, जहाँ वे अपने पक्ष में सबूत पेश कर सकती थीं। इस विवाद के चलते मामला क्राइम ब्रांच की जांच तक पहुंच गया है और एसीपी विवेक भगत का प्रमोशन भी फिलहाल होल्ड पर चला गया है।
निष्कर्ष और सवाल
यह घटना समाज के उस कड़वे सच को उजागर करती है जहाँ शिक्षा, ऊंचे ओहदे और तरक्की के बाद भी व्यक्ति को उसकी जाति के आधार पर निशाना बनाया जाता है। बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर द्वारा रचे गए संविधान ने हर नागरिक को बराबरी और आत्मसम्मान का अधिकार दिया है, जिसे बचाने का दावा आज हर वैचारिक धड़ा—चाहे वह पत्रकार हों, राजनीतिक दल हों या विभिन्न संगठन—कर रहा है।
फिलहाल, इस प्रकरण ने प्रशासनिक हलकों में हलचल मचा दी है। यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले दिनों में इस मामले की जांच किस दिशा में जाती है और न्याय की तराजू पर कौन कितना खरा उतरता है।
इस घटना और कानूनी प्रक्रिया को लेकर आपकी क्या राय है?