Dussehra : घोर आपत्ति

Bindash Bol

डॉ प्रशान्त करण
(आईपीएस) रांची

Dussehra : सार्वजनिक रूप से सूचित करता हूँ कि मुझे घोर आपत्ति है कि आज के विजया दशमी के दिवस पर लोग मुझे अधर्म पर धर्म की विजय के साथ विजयादशमी की शुभकामनाएं भेज रहे हैं l ऐसे व्यक्ति कदापि मेरे शुभचिंतक नहीं हो सकते l वस्तुतः वे चाहते ही नहीं कि मेरा शुभ हो l भला अधर्म पर धर्म की विजय होते आजकल हम देखते भी हैं क्या ? हमें तो धर्म पर ही अधर्म की विजय का उत्सव मनाना चाहिए l इसके लिए आज से उत्तम दिवस और क्या होगा ! अधर्म के पथ पर चलकर रावण ने सोने की लंका बना डाली l उसने जीवन पर्यन्त धरा पर ही स्वर्ग के नाना प्रकार के सुखों को प्राप्त करते हुए अंततः हरि कृपा से उनके हाथों मृत्यु को वरण करते हुए स्वर्ग को गया l धर्म पर अधर्म की विजय ने अनेक प्रकार के कर्मकांड प्रचलित हैं l ऐसी परिस्थिति में कोई मेरे अधर्म पर धर्म की विजय की असम्भव कामना करे तो स्वाभाविक रूप से वह मुझे भ्रम में डालकर मुझे उलझाने वाले और कभी लक्ष्य पर न पँहुचने वाले पथ पर दबाव देकर धकेलने पर उतारू लगता है l इससे मैं सतर्क हो गया हूँ l
          सतर्क होकर अब इस चिंतन में लगा हूँ कि किस विधि से , किस विधि – विधान से , किन कर्मकांडों से मैं धर्म पर अधर्म की विजय सुनिश्चित कर ही लूँ l क्योंकि मेरे देखते – देखते कितने इन्हीं गुप्त कर्मकांडों से धर्म पर अधर्म की विजय कराकर सफल और सम्पन्न होते चले गए l उनसे पूरा समाज प्रेरणा लेने के फेरे में है l लेकिन वे हैं कि उन कर्मकांडों की गुप्त विधि और विधान किसी को बताते ही नहीं हैं l अपने रवि बाबू इसी क्रम में गुरु की खोज में लगे थे l प्रातः से रात्रि शयन तक जी तोड़ अथक परिश्रम कर गुरु को प्रसन्न करने में लगे थे l उधर गुरु थे कि अधर्म पर धर्म की विजय के लिए अपने प्रतिद्वन्द्वी की जासूसी रवि बाबू से कराते रहे l रवि बाबू पूरी श्रद्धा से गुरु की सेवा में गुरु के प्रतिद्वंदी की गोपनीय जानकारी गुरु को पँहुचाते रहे l लेकिन जब फल प्राप्त करने का अवसर आया तो गुरु ने मोटे माल लेकर किसी और को फल देकर उपकृत कर दिया l रवि बाबू बिफर गए l तब गुरु ने पुनः गुरु मंत्र दिया – धर्म पर अधर्म की ही विजय कलियुग के इस कालखंड में होती है l
       आजकल देखता हूँ कि अचानक ही मुहल्ले के द्विवेदी जी का रहन – सहन और सोच बदल गयी है l पहले उनका धंधा -पानी कहने को कोर्ट से चलता था , लेकिन जानकार बताते थे कि वह सब दिखावा ही था l कुछ दिन उनकी निष्ठा एक सफल और सम्पन्न के साथ थी l लेकिन उस निष्ठां के बदले उन्हें विपरीत फल मिला l तब उन्हें गुप्त ज्ञान मिला कि धर्म पर अधर्म की विजय होती है l तब उन्होंने इसे साधने – सधवाने का निश्चय किया l उनकी भार्या सरकारी अफसर थी l अब धन – सम्पत्ति से उनका घर लबालब भर गया l अहंकार सिर चढ़कर बोलने लगा l सभी दबी जिह्वा से कहते हैं कि राज की बात है l खबरीलाल बता गए कि उनकी भार्या ने धर्म पर अधर्म की विजय प्राप्त कर ली है l धर्म पर अधर्म की विजय चाल और भाग्य दोनों बदल देते हैं l
      इसलिए इस लेख की मुनादी से सावधान करता हूँ कि मुझे घनघोर आपत्ति होगी कि किसी नए मुझे अधर्म पर धर्म की विजय की शुभकामना भी भेजी।

TAGGED:
Share This Article
Leave a Comment