उमानाथ लाल दास..
Prashant Bhushan : अपने विवादास्पद बयानों के कारण सुप्रीम कोर्ट से अवमानना का दोषी ठहराया जा चुका व्यक्ति! मुंबई बम धमाके के आरोपी याकूब मेमन की फांसी टलवाने के लिए जो सुप्रीम कोर्ट का दरबार आधी रात को खुलवा सकता है, वह संवैधानिक मर्यादाओं को तार-तार करने वालों का चहेता और पोटेंशियल पार्ट बना हुआ है, तो इसका मतलब समझा जा सकता है! ऐसे प्रशांत भूषण हारी हुई बाजी पलट सकते हैं, पर कोर्ट में; बाहर नहीं! बाहर में तो समय पाकर थुर्रा ही सकते हैं या दर-बदर किये जा सकते हैं पार्टी से। ऐसे लोग गणित का वह वेरिएबल हैं, जो इक्वेशन के हिसाब से अपना मान बदलता रहता है! इस बिना पर कहा जा सकता है कि वकीलों में थोड़ी भी संवेदना होती, तो कचहरी में खून की नदियां बहतीं।
यदि वह बोल सकते हैं कि आधे से ज्यादा मुख्य न्यायाधीश भ्रष्ट रहे हैं (2009 में तहलका पत्रिका के अंक छह में एक साक्षात्कार में), तो उन्हें क्यों नहीं कहा जा सकता है कि आधे से ज्यादा उनका जीवन भ्रष्टाचारियों को हरिश्चंद्र बनाने में गया!
ऐसी दिलचस्प हस्ती की पूरी बुनावट में एक तारतम्यता है, जो सुप्रीम कोर्ट के नामी और ताकतवर पिता की सोहबत में आधार पाती है! वह पिता इंदिरा गांधी की जीत को पलट ही नहीं देते, बल्कि यह किस्सा इमरजेंसी का हिस्सा बन जाता है! जनता सरकार में कानून मंत्री के रूप में इनाम भी पाते हैं! पिता के दुस्साहसिक कारनामे से मुग्ध युवा प्रशांत यदि इसे एक तरफ The Case That Shook India में दर्ज करते हैं, तो उसी इंदिरा के पुत्र राजीव गांधी वाले बोफोर्स मामले पर भी Bofors: The Selling of a Nation लिखने से बाज नहीं आते! विवादों के दस्तावेजीकरण का यही रुझान एक दिन दुस्साहसिक केस को हैंडल करने से सियासी संलग्नता में बदल जाता है! धुर कांग्रेस-विरोधी प्रशांत भूषण आज जब पप्पू के सिंहासनारोहण के लिए शहीद होने तक तैयार दिखते हैं, तो बड़ा विचित्र लगता है। इस विचित्रता में भी एक तारतम्यता है और यही उनकी ताकत है।
अहंकार से उपजे बगावती तेवर और मिजाज उनके विकासक्रम के सूत्र बनते हैं। अन्ना आंदोलन से केजरीवाल तक पहुंचने का रास्ता यही है! पिता शांति भूषण एक करोड़ देकर आप के संस्थापक बने! बाद में दिल्ली सरकार के गठन का सवाल और पार्टी की गतिविधियों की आलोचना करने से पिता-पुत्र के आप से संबंधों में खटास आती है। इससे आगे का किस्सा किसी से छिपा नहीं है! प्रशांत तो योगेंद्र यादव के साथ निकाल ही दिये गये!
इस बार फिर पूरे क्लाइमेक्स पर हैं प्रशांत, तो इसलिए नहीं कि 80 साल की उम्र में उन्हें कुछ पाना है! पप्पू की सारी नालायकी के बाद भी कांग्रेस की अखिल भारतीयता से उसके पक्ष को मजबूत होता देख वह इस बार याकूब मेमन वाली अपनी मेधा और ताकत झोंकने के मूड में हैं! कौन-सा हित है, जो एक पप्पू के पक्ष में बूढ़ी हड्डी में कुंवर सिंह का जोश उफान मार रहा है! इस बार भाजपा का कुछ हो न हो, केजरी को कहीं का नहीं छोड़ने का टार्गेट लेकर शहादत के मूड में हैं वे। इसीलिए वह अपने एक तरफ पप्पू को, तो दूसरी तरफ नेहा को रखते हैं, ताकि केजरी के सटने की गुंजाइश न रहे! इस केजरी ने यदि पप्पू को सत्ताच्युत किया है, तो प्रशांत भूषण को भी दर-बदर किया है।
इसीलिए मैं कहता हूं कि उनकी अस्थिरता में भी एक तारतम्यता है! यह अस्थिरता उनमें आज की नहीं है! आइआइटी मद्रास से बीटेक की पढ़ाई फर्स्ट ईयर में ही छोड़ दी, तो प्रिंसटन यूनिवर्सिटी से पढ़ाई पूरी नहीं की! हारकर इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से वकालत की डिग्री ली। यही आरंभिक अस्थिरता आगे जाकर बौद्धिक आवारगी में बदल गयी! इसीलिए वह न तो याकूब मेमन का केस हाथ में लेने से हिचकते हैं और न ही अरुंधती राय या अंजलि भारद्वाज के साथ खड़े होने में सकुचाते हैं।
(इसी 15 अक्तूबर को अस्सी के हुए)