Sharad Purnima : शरद पूर्णिमा… सौंदर्य, आस्था और अमृतवर्षा

Niranjan Srivastava

Sharad Purnima : वर्षा को विदा हुए एक महीना हो रहा है। बाहर बागीचे में उसकी पालकी पड़ी है। ओहार बदरंग होने लगे हैं। वर्षा के विदा होते ही शरद आ धमका है, मानसरोवर में जलक्रीड़ा करने वाले हंसों के जोड़े की तरह क्वार-कार्तिक के महीनों के रूप में। नीचे धरती पर नदियों के तटों पर लहलहा उठे हैं काँस के फूल, नदी के रजत पृष्ठ के हाशिये पर लिखी मह-मह करती टटके कविता की तरह! ऊपर नील निर्मल आसमान में उड़ती हुई रंग-विरंगे पक्षियों की पातें देखकर मन में यह भाव उठने लगता है- ये पक्षी आकाश में नहीं, शुचि में विचरण कर रहे हैं, ये परम पवित्र में विचरण कर रहे हैं। शारदीय गुलाबी धूप में यह व्योम नीले प्रशांत सागर-सा दिखता है और लगता है विहग उसमें विचरण कर रहे हैं। शुचि मास है क्वार मास। इस मास में सूर्य कन्या राशि में स्थित होता है। कन्या को संयम, कौमार्य और पवित्रता का प्रतीक माना गया है। इसी कारण छांदस भाषा में इस मास को शुचि मास कहते हैं और ज्योतिष-भाषा में कन्या मास। इसी मास में शरद नवरात्र संपन्न हो चुका है। नौ दिनों तक दुर्गा सप्तशती के मंत्र हवाओं में गूँजते रहे। कन्या मास में कुँआरी कन्याओं का पूजन हुआ। अश्रुपूरित नेत्रों से हमने माँ को विदा किया अगले वर्ष पुनः आने का वचन लेकर।
कहते हैं आश्विन मास में शिकारी-बाज के पुराने पंख झड़ जाते हैं और नए अभी दृढ़ नहीं होते। इसलिए क्वार-कार्तिक का आकाश अहिंसक होता है, उसमें कहीं कोई हिंसक और आक्रमक झपट्टा नहीं होता। सबकुछ नील-नील, परम शांत, परम उदार, परम सुंदर और परम भारतीय रस में पगा होता है। इसी परम नील, परम उदार, परम सुंदर शरद के आकाश में हंसों और अंतरिक्ष में विचरते मरुद् गणों, दरवाजे पर आए अतिथि और ब्राह्मण तथा देवालय के प्रांगण में निर्मित वेदी पर जलती अग्नि-शिखा को देखकर सभ्यता के उषाकाल में किसी मन्त्रद्रष्टा ऋषि ने ऋग्वेद के इस ऋचा का उच्चारण किया होगा-
हंस: शुचिषद् वसु अन्तरिक्षसद् होता
वेदिषदअतिथि:दुरोणसद्
नृषद् वरसद् ऋतुसद् व्योम सद् अबजा गोजा
ऋतजा अदृजा ऋतं महत् ।

हंस यानी सूर्य या पक्षी, शुचि (आकाश या जल) में स्थित होते हैं, वसु (मरुत्) अंतरिक्ष में, होता (होतृ रूप) अग्नि वेदी पर तथा अतिथि घर के दरवाजे पर स्थित होते हैं। ऐसी पावन और शुचि है शरद ऋतु जो ऋषि के मन में मन्त्रबोध जागृत कर देती है।

 इस परम उदार और परम सुंदर नील व्योम में पूर्णिमा का अवतरण भी परम सुंदर होता है। अगर चैत्र पूर्णिमा महाश्वेता है तो शरद पूर्णिमा महा शुक्ला। कहा जाता है कि शरद पूर्णिमा के दिन ही समुद्र मंथन से लक्ष्मी निकली थीं। शरदाकाश में अवतरित पूर्णिमा शुक्लवर्णा और परम उदार तो है ही। इस पूर्णिमा का रूप-लावण्य सरस्वती जैसा, हृदय लक्ष्मी और मन पार्वती जैसा है। शरद पूर्णिमा की ज्योत्स्ना में स्नान कर वनस्पतियाँ पुलकित हो उठती हैं, शान्त भाव से बहती नदी के प्रसन्न जल में जलचर सुखी रहते हैं, झिरझिर बहती हवा कानों में आकाश के हृदय का समाचार सुना जाती है। 

  कहते हैं शरद पूर्णिमा की रात्रि में चन्द्रमा अपनी सोलहों कलाओं के साथ विराजमान होता है और उसकी किरणें धरती पर अमृत वर्षा करती हैं और इस अमृत का थोड़ा अंश पाने के लिए खुले में खीर बनाकर रखा जाता है। नवविवाहित जोड़ों के लिए यह कोजगरा की रात्रि होती है। उन्हें नए वस्त्र दिए जाते हैं। दही, धान, पान, सुपारी, मखान, चांदी से बने कछुए, मछली और चांदी से बनी कौड़ी से वर का पूजन होता है। नव विवाहितों के समृद्ध और सुखमय जीवन के लिए प्रार्थनाएँ की जाती हैं कि उनका जीवन शरद पूनो की तरह परम सुंदर और धवल हो।

 शरद पूर्णिमा की रात्रि अखण्ड आनन्द प्रवाह की रात्रि है, सृष्टि के लीला नृत्य की रात्रि है। शरद पूर्णिमा की रात महारास की रात है, प्रकृति और पुरुष की मधु यामिनी है, जीवात्मा और परमात्मा के मिलन की रात है, कृष्ण और उनकी आह्लादिनी प्रेयसी राधा के असीम अभिसार की रात है और उनके इस अभिसार की साक्षी बनी वृंदावन की गोपियों के म्हानृत्य की रात है, वृंदावन की कुंज-वीथियों, यमुना तट पर खड़े कदम्ब-वृक्षों की हरित-श्यामल पतियों से से छन कर आती धवल स्निग्ध चाँदनी की रात है और माधव की मुरली की टेर पर थिरकती ज्योत्स्ना की रात है।

 'मैं' के कारागार से मुक्त होकर 'हम'  बनना आसान नहीं है। यह सृष्टि उस परम चेतना की उत्कट कामना एकोsहम् बहुस्याम: का प्रतिफल है। तो आइए, 'मैं'  को 'हम'  बनाकर शरद पूनो की रात्रि को सार्थक करें। आधी रात में हरसिंगार या शेफाली के फूलों की तरह झड़-झड़ कर निःशब्द हो जाएँ। 

  आप सभी को शरद पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएँ। मैं यह कामना करता हूँ कि आप सौ शरद ऋतुओं तक जीयें, सौ शरद ऋतुओं तक स्वस्थ रहें और सौ शरद ऋतुओं तक आपकी नेत्र दृष्टि कायम रहे!

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