Diwali 2026 : दीपावली … रोशनी की प्रजाओं का उत्सव।

Niranjan Srivastava

Diwali 2026 : धनतेरस के एक-दो दिन पूर्व से ही सारा शहर रंग-बिरंगी रोशनी से जगर-मगर करने लगता है। चारों ओर प्रकाश ही प्रकाश होता है। आँखें चौंधिया जाती हैं और मन बेचैन हो उठता है। इस कृत्रिम प्रकाश में आँखों और मन को वह सुख नहीं मिलता जो घर की देहरी या मुंडेर पर अमावस्या के सघन अंधेरे से लड़ते मिट्टी के उन जलते हुए दीपकों देखकर मिला करता था। ऐसा क्यों? आखिर बिजली के रंग-बिरंगे लट्टू भी तो प्रकाश का ही तो विकिरण कर रहे हैं।
प्रकाश सुखदायक है और अंधकार अभिशाप। अंधकार में जीना एक संत्रास है। अंधकार संशय, हताशा और भय का व्यूह रचता है, जिसमें फंसकर मनुष्य यंत्रणा पाता है और उसकी आत्मा धुँआती रहती है। इसलिए, अनादि काल से ही मनुष्य अंधकार से मुक्ति की कामना करता रहा है। वृहदारण्यक उपनिषद् के इस श्लोक में वह ईश्वर से प्रार्थना करता है:-
‘असतो मा सद्गमय
तमसो मा ज्योतिर्गमय
मृत्योर्मामृतं गमय।’
हे ईश्वर! तू हमें असत्य से सत्य की ओर ले चलो, अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो और मृत्यु से अमरता की ओर ले चलो। असत्य से सत्य की ओर और मृत्य से अमरता की ओर अग्रसर होने की कामना प्रकारांतर से अंधकार से प्रकाश की ओर अग्रसर होने की ही कामना है। इस धरती पर प्रकाश और अंधकार की आँख-मिचौनी चलती रही है, आगे भी चलती रहेगी।
दीपावली का त्योहार मनुष्य की अंतरात्मा इसी कामना से जुड़ा हुआ है। दीपावली धरती के दान मिट्टी से बने नन्हें-नन्हें दीपकों का उत्सव है, रोशनी की संतानों या प्रजाओं का उत्सव है। जब सूर्य और चन्द्र अस्त हो जाते हैं तब अंधकार में मनुष्य अग्नि के सहारे जीता है। जब अग्नि भी नहीं रहती तब मिट्टी के ये नन्हें दीपक सूर्य, चन्द्र और अग्नि के प्रतिनिधि बनकर हमारे घर-आँगन को आलोकित कर देवोपम भूमिका निभाते हैं। उनकी देह पार्थिव है लेकिन वे प्रकाश-सन्तति हैं, रोशनी की प्रजाएँ हैं।
मुझे यह लगता है कि अंधकार से जूझते हुए मनुष्यकृत मिट्टी के दीपक मेरे सगोत्र हैं, उनसे मेरा भाईचारा है। ऐसा इसलिए कि जिन पंचमहाभूतों-पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश-से हमारे शरीर का निर्माण हुआ है उन्हीं पंचमहाभूतों से मिट्टी के दीये का भी। ये दीपक मनुष्य के श्रम और पुरुषार्थ द्वारा रचे गए हैं। मनुष्य द्वारा गढ़े गए दीपक, उसके द्वारा उपजाए गए कपास की बाती और तिल के तेल इसके साधन-द्रव्य हैं। सृष्टिकर्त्ता ब्रह्मा का एक नाम प्रजापति है। मिट्टी के दीये गढ़नेवाले भी प्रजापति के नाम से पुकारे जाते हैं।
धन्य हैं ये हुतप्राण मिट्टी के नन्हें दीपक! अंधकार के विरुद्ध उनका शाश्वत संघर्ष धन्य है, उनकी अंतश्चेतना नम्य है। दीपक के लिए दो शब्द प्रयोग किये जाते हैं, दीया और बत्ती। बत्ती शब्द वर्तिका से व्युत्पन्न है। वर्तिका जब तिलतिल करके जलती है, अपनी आत्महुती देती है, तब कहीं जाकर ज्योतिशिखा का जन्म होता है। प्रकाश बनना कठिन साधना है, जो आत्माहुति या आत्मदान के बिना संभव नहीं। जो चैतन्य नहीं है, वह आत्मदान नहीं कर सकता। दीपावली तेज, द्युति, दीप्ति, ज्योति, कान्ति, चैतन्य और प्रभा-भास्वर मनोभावों का पर्व है। बिजली के लट्टुओं के प्रकाश को देखकर ये मनोभाव उत्पन्न नहीं होते। अब दीपावली जिस रूप में मनायी जा रही है, उसे मनुष्य के गौरव बोध का पर्व कहने में मुझे हिचक हो रही है।
मिट्टी के इन्हीं दीपकों को देखकर संस्कृत में ‘दीप-देहली’ न्याय बना होगा। इसका तात्पर्य उस दीप से है को घर की देहरी पर जलते हुए अंदर और बाहर दोनों ओर उजियारा करता है। इन्हीं दीपकों को देखकर गोस्वामी तुलसीदास ने अपने इष्ट श्रीराम को ‘मणिदीप’ कहा जिसके जपने से शरीर रूपी देहरी के भीतर और बाहर दोनों ओर उजियारा होता है-
‘राम नाम मनि दीप धरु जीह देहरी द्वार।
तुलसी भीतर बाहरेहुं जौं चाहसि उजियार।।’
जिस समय से हम गुजर रहे हैं उस समय में दीपावली के अवसर पर महाप्राण निराला की कविता ‘गहन है अंधकार’ की ये पंक्तियाँ याद आ रही हैं:-
‘गहन है अंधकार
स्वार्थ के अवगुंठनों से
हुआ है लुंठन हमारा
खड़ी है दीवार जड़ की’
निराला ने न केवल अपने समय बल्कि आने वाले समय की पहचान कर ली थी। बाजारवाद की कारीगरी और उपभोक्तावादी संस्कृति हमारे रीति-रिवाजों को विरूप कर रही है। अब दीपावली पर सागर-सम्भवा, विष्णुप्रिया, सर्वमंगला माधवी लक्ष्मी की पूजा-आराधना नहीं होती बल्कि तिजोरियों में कैद नकदी और सोने-चांदी तथा जवाहिरात को लक्ष्मी मानकर उसकी पूजा होती है। बाजारवाद के महाकांतार में हमारी उत्सवधर्मिता कहीं खो गई है। आज दीवाली सोने और चांदी, महंगी कारों, महंगे भूखंडों की खरीदारी, महंगे उपहार बाँटने और पटाखे के त्योहार में बदल गयी है। इस जगर-मगर के पीछे फैले गहन अंधकार को पहचानने की जरूरत है। आभासी दुनिया में दिनोंदिन आत्मकेन्द्रित होते मनुष्य के भीतर फैलता हुआ अंधकार अधिक यन्त्रणामय है।
कहते हैं कि भगवान श्रीराम जब चौदह वर्षों का वनवास पूरा कर अयोध्या लौटे थे, तब अयोध्यावासियों ने घी के दीये जलाकर मंगलगान गाये थे और बड़ी संख्या में राजपथ पर उतर कर उनका स्वागत किया था। अयोध्या नगरी दीपों से जगमगा उठी थी। भगवान राम के समय पटाखे नहीं हुआ करते थे। कहा जाता है कि मध्यकाल में मुगल आक्रांता बाबर अपने साथ बारूद लेकर आया था। इसी बारूद के बल पर भारत में उसने मुगल साम्राज्य की नींव रखी। पटाखे उसी के बाद बनने शुरू हुए और दीवाली में पटाखे फोड़ने और आतिशबाजी का प्रचलन हुआ। एक अनुमान के मुताबिक दीपावली में देश भर में एक लाख करोड़ से अधिक के पटाखे फोड़े जाते हैं। हमारा पर्यावरण तेजी से बदल रहा है। स्थिति हाथ से निकलने वाली है। पटाखे जानलेवा प्रदूषण फैलाते हैं। मौजूदा संकट से जूझने के लिए इस प्रेरणादायक त्योहार से प्रेरणा लें और मंगलकारी परम्पराओं की शुरुआत करें।
आइए, मिट्टी के उन दीपकों नमन करते हुए, हम अपना दीप स्वयं बनने का, ‘अप्प दीपो भव!’ का संकल्प लें। अंतर्मन में दीप जलाकर परस्पर को देवता बनाएँ, परस्पर को सार्थक करें और बाहर तथा भीतर के अंधकार को दूर भगाएँ।
मिट्टी के इन नन्हें दीपकों को गुम होते देख निदा फ़ाज़ली की ग़ज़ल का ये शेर याद आ रहा है:-
“जिन चिरागों को हवाओं का ख़ौफ़ नहीं
उन चिरागों को हवाओं से बचाया जाये।”

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