Democracy : पक्षी की उड़ान के पीछे एक निश्चित अभिप्राय होता है। यदि हम उस अभिप्राय को समझ सकें, तो यह अनुमान लगा सकते हैं कि वह किस दिशा में उड़ेगा और कहाँ जाकर उतरेगा, बशर्ते वह अपना अभिप्राय न बदले। जनतंत्र की अनेक परिभाषाओं में यह भी शामिल है कि आम जनता को शांतिपूर्ण धरना-प्रदर्शन करने का अधिकार है। ऐसे प्रदर्शन सरकार की नीतियों के विरोध और जनभावनाओं के प्रति सरकार की असहमति जताने का माध्यम होते हैं। यह परंपरा केवल भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि विश्व के अनेक देशों में देखने को मिलती रही है और आगे भी मिलती रहेगी। हाँ, जहाँ कहीं तानाशाही स्थापित हो जाती है, वहाँ यह लोकतांत्रिक सिद्धांत केवल कागजों तक सिमटकर रह जाता है।
आज यह विषय इसलिए चर्चा में है, क्योंकि भारत जैसे विशाल लोकतांत्रिक और प्रगतिशील देश में महीनों से सरकार के विरुद्ध धरना-प्रदर्शन जारी हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार ने इस ओर आँखें मूँद रखी हैं, जबकि लगातार जारी प्रदर्शनों ने आम जनजीवन को प्रभावित किया है। स्वाभाविक है कि जब जनता सरकार के विरुद्ध सड़कों पर उतरती है, तो सरकार की ओर से भी प्रतिक्रिया सामने आती है। कभी प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग किया जाता है, तो कभी उनके आंदोलनों को तरह-तरह के आरोपों से घेरा जाता है। समाज को यह समझाने का प्रयास किया जाता है कि प्रदर्शन असंवैधानिक हैं, इनके पीछे ‘रिजीम चेंज’ की मंशा है अथवा विदेशी फंडिंग के माध्यम से देश के विकास को बाधित करने की कोशिश की जा रही है।
यह संयोग है या सत्तापक्ष द्वारा विपक्षी दलों के आंदोलनों का जवाब देने की रणनीति, इसका आकलन समय के साथ ही हो सकेगा। हालाँकि, सत्तापक्ष अपने पक्ष में तर्क प्रस्तुत कर रहा है और यह स्वाभाविक भी है। विपक्षी नेताओं और सीजेपी द्वारा केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की माँग से शुरू हुआ आंदोलन अब लगातार विस्तार लेता दिखाई दे रहा है। इसी राजनीतिक विरोध के जवाब में और जनता के बीच अपनी बात पहुँचाने के उद्देश्य से भारतीय जनता पार्टी ने भी पदयात्राओं और जनसंपर्क अभियानों का सहारा लिया है।इसी क्रम में पिछले सप्ताह सत्तापक्ष ने दिल्ली के दिल कहे जाने वाले चाँदनी चौक में प्रदर्शन किया। चाँदनी चौक विश्वप्रसिद्ध व्यापारिक केंद्र है, जहाँ त्योहारों के दौरान विशेष रूप से भारी चहल-पहल रहती है। ध्यान देने योग्य है कि त्योहारों के समय भाजपा ने लालकिले से टाउन हॉल तक ‘लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ’ के नारे के साथ पदयात्रा निकाली। पार्टी नेताओं ने कहा कि दिल्ली के लोगों की मुश्किलें बढ़ाने वाले प्रदर्शनकारियों और अराजकता फैलाने वालों के लिए देश में कोई स्थान नहीं है। इस दौरान लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी पर भी निशाना साधा गया। आरोप लगाया गया कि उन्हें संविधान और संवैधानिक व्यवस्थाओं की परवाह नहीं है तथा कांग्रेस उनके नेतृत्व में लगातार कमजोर हो रही है। इस पदयात्रा का चाँदनी चौक के व्यापारियों के कारोबार पर क्या प्रभाव पड़ा होगा, इसकी कल्पना सहज ही की जा सकती है।
एक नवंबर 2026 को इंडिया गठबंधन की ‘वोट बचाओ, देश बचाओ’ रैली और चुनाव आयोग के विरुद्ध विरोध-प्रदर्शन के जवाब में भारतीय जनता पार्टी ने भी अपनी रणनीति तैयार की। भाजपा ने इसी दिन से देशभर में एक महीने तक चलने वाली पदयात्राएँ शुरू करने की घोषणा की। ‘लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ’ के नारे के साथ शुरू किए गए इस अभियान में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह सहित पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के शामिल होने की बात कही गई। भाजपा एसआईआर और चुनाव आयोग के विरुद्ध विपक्ष द्वारा लगाए गए आरोपों का जवाब टेलीविजन बहसों और डिजिटल मंचों के माध्यम से भी दे रही है। भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी और अन्य वरिष्ठ नेताओं, जिनमें रविशंकर प्रसाद भी शामिल हैं, ने विपक्ष द्वारा एक नवंबर की तारीख चुने जाने पर सवाल उठाए। उनका तर्क था कि यह दिन 1984 के सिख-विरोधी दंगों की बरसी से जुड़ा है। भाजपा ने कांग्रेस और उसके सहयोगियों पर दिल्ली में अराजकता फैलाने का आरोप भी लगाया। इसके अतिरिक्त, दिवाली, धनतेरस और छठ जैसे महत्वपूर्ण त्योहारों के दौरान रैलियों से व्यापारियों और आम जनता को होने वाली परेशानियों को लेकर भी विपक्ष की आलोचना की गई। इन मुख्य त्योहारों से पहले, 28 अक्टूबर 2026 को भाजपा ने चाँदनी चौक क्षेत्र में लालकिले से टाउन हॉल तक ‘लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ’ के बैनर तले पदयात्रा निकाली थी।
रामलीला मैदान में विपक्ष की प्रस्तावित रैली से पहले कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के आवास पर राहुल गांधी ने पत्रकारों को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि विपक्षी दलों की माँग और रामलीला मैदान की रैली का उद्देश्य केवल मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के विरुद्ध नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और उनकी टीम द्वारा लोकतंत्र को कमजोर करने के कथित प्रयासों के विरुद्ध भी आवाज उठाना है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि कांग्रेस कार्यकर्ताओं के साथ-साथ आम नागरिकों को भी रैली में शामिल होने से रोका जा रहा है। उनके अनुसार, उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और तेलंगाना जैसे राज्यों से लोगों को दिल्ली आने से रोकने के लिए ट्रेनें रद्द की जा रही हैं और बसों को भी रोका जा रहा है। हालाँकि, इन दावों को भाजपा के प्रवक्ताओं ने खारिज किया। दूसरी ओर, विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, तमाम बाधाओं के बावजूद देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग रैली में शामिल होने के लिए दिल्ली पहुँचे। विपक्षी दलों और सीजेपी की एक नवंबर की रैली के जवाब में भाजपा ने भी विरोध मार्च आयोजित करने की घोषणा की। पंजाब में आगामी चुनावों को ध्यान में रखते हुए भाजपा ने 1984 के सिख-विरोधी दंगों के पीड़ितों को साथ लेकर कांग्रेस के विरुद्ध आवाज उठाने और उससे जवाब माँगने की रणनीति अपनाई। इसी क्रम में दिल्ली भाजपा ने एक नवंबर को सिख-बहुल हरिनगर क्षेत्र में सिख समुदाय के लोगों के साथ विरोध यात्रा निकाली।
दिल्ली के रामलीला मैदान में इंडिया गठबंधन द्वारा एक बड़ी महारैली और ‘चलो दिल्ली’ मार्च का आयोजन किया गया। यह रैली मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की माँग तथा मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) में कथित अनियमितताओं के विरोध में आयोजित की गई थी। विपक्ष का आरोप था कि एसआईआर के माध्यम से 13.2 करोड़ मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं और चुनाव प्रक्रिया में अनियमितताएँ बरती गई हैं। इस महारैली में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, सोनिया गांधी, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, अखिलेश यादव, फारूक अब्दुल्ला, तेजस्वी यादव और अभिषेक बनर्जी सहित इंडिया गठबंधन के कई वरिष्ठ नेता शामिल हुए। ये नेता एक खुली बस में सवार होकर मल्लिकार्जुन खड़गे के आवास से रामलीला मैदान पहुँचे।
इस रैली से एक दिन पहले, 31 अक्टूबर 2026 को विपक्ष ने मुख्य चुनाव आयुक्त के विरुद्ध एक प्रतीकात्मक ‘जन महाभियोग’ भी आयोजित किया था, जिसमें उनके खिलाफ छह आरोप लगाए गए। रैली का नारा ‘वोट बचाओ, देश बचाओ’ था। दूसरी ओर, केंद्रीय मंत्री जे.पी. नड्डा ने इस रैली को ‘राजनीतिक नाटक’ करार देते हुए आरोप लगाया कि इसका उद्देश्य देश में अराजकता फैलाना और चुनी हुई सरकार को अस्थिर करना है। चुनाव आयोग ने भी विपक्ष के आरोपों और दावों को खारिज करते हुए कहा कि एसआईआर से संबंधित सभी निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए हैं।
पूरे घटनाक्रम को देखने के बाद एक बार फिर वही बात सामने आती है कि पक्षी की उड़ान के पीछे भी एक मानसिक संकल्प और निश्चित अभिप्राय कार्य करता है, जो उसे एक विशेष दिशा में आगे बढ़ने की ऊर्जा देता है। यदि उसके भीतर कार्यरत इस संकल्प में कोई परिवर्तन न हो, तो उसकी उड़ान की दिशा का अनुमान क्रिकेट की गेंद की तरह लगाया जा सकता है। फिलहाल राजनीतिक मुकाबले की गेंद विपक्षी दलों के पाले में दिखाई देती है, लेकिन विकेट की दूरी अभी कुछ लंबी है। इसलिए यह उड़ान अपने अभिप्राय की दिशा में कितनी आगे बढ़ेगी और कहाँ जाकर ठहरेगी, इसका इंतजार करना ही होगा।
(लेखक वरिष्ट पत्रकार और स्तंभकार हैं)