कबीर संजय
Tuvalu Island: आप लोगों में से किसी ने तुवालू देश का नाम सुना है। सच कहूं, तो मैंने भी आज से पहले यह नाम नहीं सुना था। मेरे जैसे बहुत सारे लोग होंगे, जिन्होंने कभी इसका नाम नहीं सुना होगा और सबकुछ सामान्य रहता तो सुनते भी नहीं। लेकिन, आज तुवालू देश पूरी दुनिया भर में ही पर्यावरण की चिंता करने वाले लोगों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। क्यों। इसका कारण क्या है।
तुवालू एक द्वीप राष्ट्र है। चारों तरफ समुद्र से घिरा हुआ। एक टापू। यह ओसेनिया के क्षेत्र में पड़ता है। ऑस्ट्रेलिया और हवाई से इसकी दूरी लगभग बराबर मानी जाती है। समुद्र में बसा हुआ यह देश डूबने वाला है। यह दुनिया का पहला ऐसा देश साबित होने वाला है, जो ग्लोबल वार्मिंग के चलते बढ़ी समुद्र की सतह की चपेट में आने वाला है। यहां के लोग अपना घर-गांव-गली-कूचा छोड़कर भाग रहे हैं। इस देश की आबादी के एक तिहाई हिस्से ने ऑस्ट्रेलिया में विशेष वीजा के लिए आवेदन किया है।
दरअसल, समुद्र के बीच में बसा यह टापू कहीं से भी ज्यादा ऊंचा नहीं है। टापू में किसी जगह पर समुद्र की सतह से अधिकतम ऊंचाई छह मीटर से ज्यादा नहीं है। इसलिए अगर समुद्र का पानी बढ़ता है, उसमें बाढ़ आती है, उसकी लहरें ऊंची होती हैं तो यहां के लोगों के डूबने का खतरा सबसे ज्यादा है। तुवालू के प्रधानमंत्री के मुताबिक वर्ष 2025 तक उनके देश का आधे से ज्यादा हिस्सा समुद्र के सैलाब में डूब जाएगा। जबकि, वर्ष 2100 तक तुवालू की 90 फीसदी जमीन हमेशा के लिए समुद्र में समा जाएगी। तो ऐसे में फिर यहां के लोग क्या करें। कहां जाएं। उनके खुद के देश के पास कोई ऊंची जमीन नहीं है, जहां पर जाकर वे समुद्र में आई इस बाढ़ से बच सकें।
वर्ष 2023 में तुवालू और ऑस्ट्रेलिया के बीच एक समझौता हुआ। इसमें ऑस्ट्रेलिया ने तुवालू के लोगों को विशेष वीजा देने, उन्हें सामरिक और समुद्र से सुरक्षा देने का वायदा किया। उन्हें अपने यहां के शिक्षा और स्वास्थ्य ढांचे के इस्तेमाल की इजाजत दी है। खबर यह है कि इस वीजा के लिए तुवालू के एक तिहाई से ज्यादा लोगों अब तक आवेदन कर चुके हैं। बाकियों के भी जल्द ही वीजा के लिए आवेदन करने के आसार हैं। वे अपना देश छोड़कर ऑस्ट्रेलिया में बस जाएंगे। अपनी जमीन और अपनी संस्कृति से बिछड़ने की जाने कितनी व्यथा-कथाएं जनम लेने वाली हैं।
आखिर यह नौबत आई ही क्यों।
हम जानते हैं कि औद्योगिक क्रांति के बाद से लेकर अब तक दुनिया के तापमान में एक डिग्री से ज्यादा की बढ़ोतरी हो चुकी है। जबकि, इस सदी के अंत तक धरती के तापमान में तीन डिग्री सेल्सियस तक की बढ़ोतरी होने का अनुमान है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर इस बढ़ोतरी को डेढ़ डिग्री सेल्सियस तक पर भी रोक लिया जाए तो नुकसान को कुछ हद तक कम किया जा सकता है। इसके लिए तमाम कवायदें चालू हैं। जुबानी जमा-खर्च किए जा रहे हैं। पेरिस एग्रीमेंट हुआ। हर साल इसकी बैठकें होती हैं। पर्यावरण पर छाए खतरे को उजागर किया जाता है। लेकिन, जाहिर है कि दुनिया भर के हुक्मरानों को अभी इसकी परवाह नहीं है। कारपोरेट को लगता है कि अभी इस धरती को अपने मुनाफे की हवस के लिए और भी निचोड़ा जा सकता है।
धरती के तापमान में होने वाली बढ़ोतरी के चलते पृथ्वी के ध्रुवों पर जमा बर्फ पिघल रही है। ऊंची चोटियों पर जमा हिमनद गायब हो रहे हैं। यह सारा पानी बहता हुआ समुद्र में जा रहा है। इससे समुद्र की सतह की ऊंचाई बढ़ती जा रही है। आसान भाषा में समझें, जो सबसे नीचे होता है, बाढ़ आने पर सबसे पहले वही डूबता है। तुवालू जैसे छोटे टापू के लोग सबसे नीचे हैं और सबसे पहले डूब रहे हैं। उनका भविष्य पानी में है। वे अपना घर छोड़ रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया उन्हें शरण दे रहा है।
लेकिन, यहां पर कहानी में एक ट्विस्ट है।
तुवालु देश की आबादी लगभग दस हजार है। यहां के एक तिहाई लोग ऑस्ट्रेलिया जाने का आवेदन कर चुके हैं। बाकी भी कर देंगे। ऑस्ट्रेलिया उन्हें अपने यहां बसा लेगा। लेकिन, इस तरह के निचले इलाकों में दुनिया भर के लाखों-करोड़ों लोग रहते हैं। जब डूबने की बारी उनकी आएगी तो उन्हें कौन अपने यहां जमीन देगा। कौन अपने यहां शरण देगा। वो भी एक ऐसी दुनिया में जहां पर संसाधनों के लिए पहले से ही मारकाट मची हुई है।
तो फिर क्या उन्हें डूबने के लिए छोड़ दिया जाएगा…
