Sadanandan Master : विकलांग नहीं, विचारों के वीर

Bindash Bol

अरविंद शर्मा
Sadanandan Master : राष्ट्रपति ने जिन चार हस्तियों को राज्यसभा के लिए मनोनीत किया है, उनमें एक हैं सदानंदन मास्टर। निडर, संघर्ष, तप और राष्ट्रनिष्ठा के मास्टर हैं सदानंदन। राज्यसभा में मनोनयन का मतलब उस रक्त का सम्मान है जो मातृभूमि के प्रेम में प्रवाहित हुआ है। देश-समाज को जब-जब आवश्यकता होती है तब तब कोई सदानंदन जैसा तपस्वी प्रकट होता है। अदम्य साहस के धनी सदानंदन मास्टर का जीवन उस विचारधारा के प्रति समर्पण है, जिसे उन्होंने अपने अनुभवों से अपनाया है।

स्कूली जीवन में वामपंथ से प्रभावित थे। माकपा के साथ आगे बढ़ रहे थे। मगर सच सामने आने लगा तो मन उचाट होता गया। फिर उन्होंने आरएसएस की राह पकड़ ली। आगे बढ़े-एक अपरिचित स्वयंसेवक से प्रचारक तक की यात्रा तय की, जो उनके लिए आसान नहीं था। गांवों में निडर होकर उन्होंने सेवा कार्य शुरू किया तो उनके साहस से घबरा कर विरोधियों ने षड्यंत्र रचा। एक रात शाखा से लौटते समय अंधेरे में गुंडों ने जानलेवा हमला किया। कुल्हाड़ी से दोनों पैर काट दिए और जंगल में फेंक दिया। किसी तरह प्राण तो बच गए, लेकिन मास्टर पूरी तरह अपंग हो गए।

मार्मिक प्रकरण आना अभी बाकी था। पैर कटने से पहले उनकी शादी तय हो चुकी थी, मगर बाद में ससुराल वाले मुकरने लगे। ऐसे में सामने आईं उनकी होने वाली पत्नी। वह तपस्विनी युवती डटकर खड़ी हो गई। अड़ गई कि विवाह करूंगी तो सदानंदन मास्टर से अन्यथा नहीं। यह अत्यंत साहस भरा निर्णय था–संकल्प था और जीवनभर का यज्ञ था, जिसमें उन्होंने स्वयं को होम कर दिया। वही युवती साधना की प्रतिमूर्ति बनकर सदानंदन मास्टर की जिंदगी में आई और दोनों ने एक-दूसरे में आत्मसात कर लिया। यह सिर्फ विवाह नहीं था, बल्कि देश-समाज के लिए दो तपस्वियों का संगम था। सदानंदन मास्टर का राज्यसभा के लिए मनोनीत होना, उस नारी का सम्मान है, जिसने प्रेम नहीं, संकल्प से विवाह किया और खुद को जनकल्याण के प्रति समर्पित कर दिया।

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