ध्रुव गुप्त
(आईपीएस) पटना
आज लोकमहापर्व छठ के चार दिवसीय आयोजन का आरंभ हो रहा है। छठ के गीत गली मुहल्ले में गूंजने लगे हैं। लोक की सादगी, निश्छलता और भोलेपन से भरे ये गीत अंतर्मन को छूते हैं। हमने अपने शास्त्रों में बताए असंख्य देवियों, देवताओं को नहीं देखा। जीवन में उनकी उपस्थिति कभी महसूस नहीं की। उनकी कथाएं भर सुनी हैं। उनमें एक सूर्य ही हैं जो हमेशा हमारे सामने हैं। उनका देवत्व स्वीकार करने के लिए तर्क या प्रमाण की आवश्यकता नहीं। हमारी यह पृथ्वी उन्हीं से जन्मी है। यहां जो भी नमी है, उर्वरता है, हरीतिमा है,सौंदर्य है, जीवन है, वह सूर्य की ही देन हैं। सूर्य न होते तो न तो यह पृथ्वी संभव थी, न इसका सौन्दर्य और न यहां जीवन के पनपने, विकसित होने की असीम संभावनाएं। हमारे प्यारे चांद का सौंदर्य और शीतलता भी उन्हीं की अग्नि से है। हमारे ऋग्वेद ने कहा भी है – ‘सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च दृ’ अर्थात आप सूर्य ही सृष्टि की आत्मा है। सूर्य से ही हमारी यह सृष्टि है और इसके विनाश के कारण भी वे ही बनेंगे।
हे सूर्य, आपके अनंत उपकारों के बदले हम क्या दे सकते हैं आपको ? आपके उदीयमान और अस्ताचलगामी दोनों रूपों को अपनी श्रद्धा के अर्घ्य समर्पित करते हैं! आपके ही दिए हुए नए अन्न, फल, दूध और नदियों के जल के साथ। हमारा अर्घ्य, हमारी प्रार्थना स्वीकार करें ! हमें प्रकाश दें, ऊर्जा दें, बल दें, उर्वरता दें, जीवन दें, आरोग्य दें, हरियाली दें, वृक्ष दें, जंगल दें, अन्न-फल-फूल दें, बादल दें, वर्षा दें, नदियां दें ! यह विवेक दें कि हम आपके अंश से बनी इस पृथ्वी और उसकी प्रकृति का सम्मान और संरक्षण करें और अपनी संतानों के लिए इसे कुछ बेहतर बनाकर जाएं !