BRICS Summit 2026 :दुनिया के सबसे ताकतवर और धुर विरोधी देश एक मंच पर, और महफ़िल की कमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथ में! 12 से 13 सितंबर 2026 तक नई दिल्ली में हुए 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन ने ग्लोबल पॉलिटिक्स के सारे समीकरण बदलकर रख दिए हैं। जब अमेरिका और पश्चिमी देश दुनिया को अपनी शर्तों पर हांकने की कोशिश कर रहे थे, तब दिल्ली में “Building for Resilience, Innovation, Cooperation and Sustainability” के मंत्र के साथ वो ताकतें एकजुट हुईं, जिन्हें अब तक पश्चिम की छाया माना जाता था।
इस महाकुंभ पर दुनिया भर के दिग्गजों की निगाहें टिकी थीं। आइए जानते हैं कि पश्चिमी और पाकिस्तानी मीडिया इस भू-राजनीतिक भूचाल को किस नज़रिए से देख रहा है…
1. द न्यूयॉर्क टाइम्स (अमेरिका): “जिस टेबल पर अमेरिका नहीं, वहां ड्रैगन और रूस के साथ बैठे ईरान के सुल्तान!”
न्यूयार्क टाइम्स ने इस समिट को सीधे तौर पर “पश्चिम के कमरे से बाहर विश्व नेतृत्व” की एंट्री बताया है।
* ईरान कार्ड: अखबार ने सबसे बड़ा फोकस ईरान की मौजूदगी पर किया है। पश्चिम एशिया में सुलगती आग और आसमान छूती तेल की कीमतों के बीच, जिस मेज पर अमेरिका को जगह नहीं मिली, वहां चीन, रूस और भारत के साथ ईरान खुलकर बातचीत कर रहा था।
* मोदी बनाम शी जिनपिंग: NYT ने ग्लोबल साउथ के असली ‘सुपरस्टार’ बनने की होड़ को रेखांकित किया। सात साल बाद भारत की धरती पर कदम रखने वाले शी जिनपिंग और भारत की संतुलनकारी कूटनीति के बीच विकासशील दुनिया किसे अपना नेता मानेगी—यह बड़ा सवाल उठाया गया है।
2. द वाशिंगटन पोस्ट (अमेरिका): बहुध्रुवीय दुनिया का बिगुल या वाशिंगटन के लिए सीधी चुनौती?
वाशिंगटन पोस्ट ने इस पूरे घटनाक्रम को ग्लोबल पावर शिफ्ट का सबसे बड़ा सबूत माना है।
* भारत का मास्टरक्लास ‘बैलेंसिंग एक्ट‘: अखबार का मानना है कि भारत एक तरफ रूस और ईरान से अपने पुराने और गहरे रिश्ते निभा रहा है, तो दूसरी तरफ अमेरिका, यूरोप, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ मिलकर अपनी ग्लोबल पार्टनरशिप मजबूत कर रहा है।
* ट्रंप की धमकियां बेअसर: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड की टैरिफ की धमकियों और दबाव के बावजूद 11 देशों (ईरान, यूएई, इंडोनेशिया, मिस्र, इथियोपिया और सऊदी अरब सहित) का यह कारवां रुकने का नाम नहीं ले रहा है। हालांकि, अखबार ने यह भी तंज कसा कि अंदरूनी मतभेद इस समूह की रफ्तार धीमी कर सकते हैं।
3. डान (पाकिस्तान): भारत की कूटनीतिक जीत और दिल्ली घोषणापत्र की चौंकाने वाली ताकत
पाकिस्तान के सबसे प्रतिष्ठित अखबार ‘डान’ ने काफी संतुलित और नपी-तुली कवरेज दी है।
* यूक्रेन से मिडिल ईस्ट तक एकजुटता: डान ने माना कि मई में जिन देशों (ईरान, सऊदी अरब और यूएई) के बीच भयंकर मतभेद थे, उन्हें भारत ने अपनी शानदार कूटनीति के दम पर एक ही मंच पर ला खड़ा किया। ‘न्यू दिल्ली घोषणापत्र’ में मध्य पूर्व के तनाव पर “अधिकतम संयम” बरतने की साझा अपील इसका सबसे बड़ा सुबूत है।
* आतंकवाद और कड़े तेवर: अखबार ने घोषणापत्र में आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस और पहलगाम हमले की निंदा का भी जिक्र किया, जिससे साफ है कि भारत ने इस मंच से अपनी सुरक्षा प्राथमिकताओं पर भी पूरी दुनिया की मुहर लगवा ली है।
दुनिया के अखबारों के मुताबिक इस समिट के 3 सबसे बड़े निष्कर्ष….
* अमेरिका का अल्टरनेटिव: पश्चिमी मीडिया ने मान लिया है कि ब्रिक्स अब सिर्फ कागजी संगठन नहीं रहा, बल्कि अमेरिकी डॉलर और पश्चिमी संस्थानों की दादागिरी को सीधी चुनौती देने वाला ग्लोबल ब्लॉक बन चुका है।
* असली परीक्षा आपसी मनमुटाव: ईरान-यूएई की तनातनी और भारत-चीन के बीच ग्लोबल साउथ के नेतृत्व की खींचतान इस संगठन के सामने सबसे बड़ा स्पीड ब्रेकर है।
* भारत की कूटनीतिक जीत: चाहे एकतरफा टैरिफ के खिलाफ हुंकार हो, क्रॉस-बॉर्डर पेमेंट सिस्टम का मुद्दा हो या यूएनएससी (UNSC) में सुधार की मांग—भारत ने अपनी मेजबानी में पूरी दुनिया को यह दिखा दिया कि आने वाला कल सिर्फ पश्चिमी देशों का नहीं, बल्कि ग्लोबल साउथ का है।
अब सवाल यह उठता है कि क्या पश्चिमी वर्चस्व का यह किला ढहने की शुरुआत हो चुकी है, या फिर यह मंच सिर्फ कूटनीतिक मुलाकातों तक सीमित रह जाएगा? आपकी इस पर क्या राय है, कमेंट सेक्शन में जरूर बताइए!
