Chhath Puja 2025 : छठ केवल व्रत नहीं, लोकजीवन का उत्सव …

Bindash Bol
  • छठ के गीत केवल लोकगीत नहीं, लोकदर्शन हैं…

नीरज कृष्णा (पटना)

Chhath Puja 2025 : हर वर्ष जब सूर्य अस्त होता है और बिहार, पूर्वांचल, नेपाल के घाट दीपों से जगमगाते हैं, तब यह केवल एक धार्मिक दृश्य नहीं, बल्कि सभ्यता की स्मृति का पुनर्जागरण होता है। छठ के गीत हवा में तैरते हैं—धीमे, गहरे, जैसे कोई माँ लोरी सुना रही हो। इन गीतों में पूजा से अधिक जीवन का दर्शन है—नारी, प्रकृति और समाज का संगीत।

छठ व्रत नहीं, एक संस्कृति का उत्सव है, जहाँ स्त्रियाँ अपने स्वर से ब्रह्मांड रच देती हैं। “कांच ही बांस के बहंगिया…” जैसे गीत आस्था के शुद्धतम स्वर हैं, जिनमें न राग है, न तालीम—फिर भी वे जीवन की लय बन जाते हैं।

ये गीत उस बिहार की पहचान हैं, जो कठिनाइयों के बीच भी गुनगुनाना नहीं भूलता। “अरघ्य गीत” केवल प्रार्थना नहीं, संवाद हैं—जहाँ व्रती सूर्य से बात करती है और अपने जीवन की कथा सुनाती है।

इन गीतों में स्त्री का स्वर सबसे ऊँचा है—सहनशील, करुण, पर दृढ़। भूखी-प्यासी रहकर भी वह दूसरों के सुख की कामना करती है। उसके गीतों में नदी की लहरें, मिट्टी की गंध और प्रेम का त्याग झलकता है।

छठ के गीत हमें याद दिलाते हैं कि बिहार की लोक-संस्कृति केवल भक्ति नहीं, बल्कि जीवन के गहरे अर्थों की अनवरत खोज है।

समय के साथ छठ के गीत बदले, पर उनका मूल भाव—कृतज्ञता—शाश्वत रहा। यह पर्व याचना का नहीं, धन्यवाद का पर्व है—सूर्य, जल, प्रकृति और जीवन के प्रति। कठिन व्रत की कठोरता इन गीतों की मधुरता से हल्की हो जाती है; भूख और तपस्या भक्ति और संगीत में घुल जाती हैं।

छठ के गीत सिखाते हैं कि भक्ति और सौंदर्य का असली मिलन लोक में होता है, न कि महलों में। वे परिवार से आरंभ होकर समाज, प्रकृति और अंततः ईश्वर तक की यात्रा हैं—मनुष्य के उत्कर्ष का क्रम। “जल में जोती, जोती में जल” जैसी पंक्तियाँ बताती हैं कि इन लोकगीतों में आधुनिक पर्यावरण चेतना के बीज पहले से मौजूद हैं।

हर गीत केवल धार्मिक नहीं, सामाजिक भी है—उसमें खेतों की हरियाली, नदियों की पवित्रता और परिवार का स्नेह है। यही कारण है कि जब शहरों में जीवन कृत्रिम हो जाता है, तब भी छठ लौटता है—आस्था के रूप में, आशा के रूप में, हमें याद दिलाने कि सभ्यता की जड़ें लोकगीतों में हैं, नीतियों में नहीं।

छठ के गीतों ने बिहार को एक सूत्र में बाँधा है। भोजपुरी, मैथिली, मगही या अंगिका—भाषाएँ भले अलग हों, पर इन गीतों की लय एक ही है, जो जाति, वर्ग और क्षेत्र की सीमाएँ मिटा देती है। जब घाटों पर हज़ारों स्वर “उग हो सुरज देव” में एक होते हैं, तो वह संगीत नहीं, एक आध्यात्मिक एकता बन जाता है—बिहार एक देह, एक आत्मा बन उठता है।

इन गीतों से स्पष्ट है कि छठ केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि समाज की प्रगतिशील चेतना का उत्सव है—जहाँ स्त्री केवल आस्था की साधक नहीं, उसकी रचयिता भी है। वह माँ से संवाद करती है, माँगती है सबके लिए—अन्न, धन, शांति और बेटी।

छठ के लोकगीत समाज का सच्चा इतिहास हैं—कृषि की कठिनाइयाँ, प्रवास की पीड़ा, स्त्री की ज़िम्मेदारियाँ और फिर भी जीवन के प्रति अटूट विश्वास। यह वही समाज है जो आर्थिक रूप से भले संघर्षरत हो, पर सांस्कृतिक रूप से सबसे समृद्ध है—जहाँ गीत ही उसकी आध्यात्मिक ऊँचाई हैं।

छठ केवल व्रत नहीं, लोकजीवन का उत्सव है — जहाँ न पुरोहित है, न भेद। हर घाट, हर गली में एक ही भावना बहती है — साझापन। और उस साझेपन की आत्मा है स्त्री का गीत।

छठ के गीत केवल लोकगीत नहीं, लोकदर्शन हैं — जिनमें जीवन का विज्ञान, स्त्री की करुणा और समाज का अनुशासन एक साथ गूंजते हैं।

यही गीत याद दिलाते हैं कि धर्म गीतों से जीवित है, संस्कृति स्त्रियों की आवाज़ से चलती है, और संसार अपनी सुंदरता इन्हीं लोकधुनों से पाता है। सच यही है — छठ के गीतों में पूरा लोक-संसार बसता है।

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