Conspiracy : भारतीय संविधान के जानकार कहते हैं कि भारत किसी एक समुदाय का राष्ट्र नहीं है, बल्कि यहां सभी धर्मों को सामान्य अवसर दिया गया है। लेकिन, दुर्भाग्य की बात है कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी हम भारत को एक समुदाय विशेष का देश मनवाने का हरसंभव उपाय कर रहे हैं और लोगों को इसके लिए बाध्य भी कर रहे हैं । आज समाज के मस्तिष्क में यह विष इस कदर भर दिया गया है कि उससे वह अपने को बाहर ही नहीं कर पा रहा है। हमारे समाज के तथाकथित अगुआ ऐसा नारा देते है कि ‘हिन्दू बंटते रहेंगे तो कटते रहेंगे’। लेकिन, वह इसकी व्याख्या नहीं करते कि आखिर कैसे? ऐसा नारा देने वाले नेता डंके की चोट पर कहते हैं कि बांटने वालों को पनपने नहीं देंगे। लेकिन, यहां भी वह बांटने वालों का खुलकर नाम भी नहीं लेना चाहते। ऐसा क्यों? समाज के अगुआ और नेता जनता के पथप्रदर्शक होते हैं, तो क्या इसका मतलब उन्हें समाज को भ्रमित और मजबूर करने का अधिकार मिल गया है? आज के समय में ऐसे अनेक प्रश्न उठ खड़े हुए हैं जिससे समाज चिंतित है और उसका भाईचारा दरकिनार होता जा रहा है। आखिर क्यों? क्या हमारे समाज के अगुआ हमारे नेतागण हमें हिस्सों में बांटना चाहते हैं? इस देश का एक बार बंटवारा हो चुका है, तो क्या अब बार—बार देश को समुदाय विशेष या धर्म विशेष के आधार पर बांटा जाएगा? एक बंटवारे का दर्द और डर आजादी के 75 वर्ष बाद भी देश झेल रहा है। ऐसे में अब देश को फिर से यह कहकर क्यों डराया—घमकाया जा रहा है कि हमें एकजुट होना चाहिए? निश्चित रूप से हमें एकजुट होना चाहिए, लेकिन समुदाय और जाति विशेष के आधार पर नहीं, बल्कि देशहित में अपने समग्र और अटूट भारतवर्ष के लिए।
वैसे, बंटने की नीयत तो समाज में उसी दिन शुरू हो जाती है, जिस दिन किसी का जन्म होता है, लेकिन आगे चलकर वह भी समाज का एक सदस्य हो जाता है, अंग हो जाता है। लेकिन, देश में जिसके ऊपर समाज को एकजुट करने की जिम्मेदारी दी गई हो, वही अगर अपने निजी स्वार्थ के लिए जाति, धर्म या समुदाय विशेष के रूप में बरगलाने लगता है, तो फिर परिणाम आज जैसा ही हो जाता है। आश्चर्य की बात तो यह कि समाज के वही अगुआ और राजनीतिज्ञ कभी हमें जाति में बांधकर रखने की बात भी करने लगते हैं। आजादी के पहले देश को हिन्दू-मुसलमान के आधार पर बांटा गया। फिर बंटवारे के बाद जाति विशेष के रूप में बांटा जाने लगा है। उदाहरण तो कई हैं, लेकिन जो सबसे महत्वपूर्ण है वह यह कि जब हमारे समाज को अपने नेता चुनने का अवसर मिलता है, तो उसे जाति आधारित समाज में चुनने का अवसर दिया जाता है। फिर जब वह समाज की सर्वोच्च पंचायत में पहुंच जाता है, तो उसके मन में अपने लिए वह दुराग्रह क्यों नहीं रहेगा! संविधान निर्माताओं ने इस जातिगत व्यवस्था को इसलिए भी अपने यहां स्थान दिया था कि उस जाति विशेष का प्रतिनिधित्व अपने राज्य और देश में अपनी सबसे बड़ी पंचायत में करेगा। जबकि हो रहा है बिल्कुल उलट, यानी आज उसी संविधान को बदलने का षड्यंत्र रचा जा रहा है।
भारतीय समाज के अग्रिम पंक्तियों में बैठने वाले आरएसएस के सरसंघ चालक मोहन भागवत कहते हैं कि हम हिंदू समाज को एक समान मानते हैं। दुनिया इसमें जाति, भाषा, संप्रदाय का भेद करती है। उनका कहना है कि हमारी बुद्धि अपनों को पहचानती है और अपने लिए कर्म को प्रेरित करते है। स्वयं सरसंघचालक कहते हैं कि मुगलों ने 500 साल राज किया। बिल्कुल सच है कि उन्होंने हमारे ऊपर शासन करके हमें लूटा, लेकिन क्या वे आज की पीढ़ी के थे? मुगलों के जरिये जो कुछ भी किया गया, कई सौ वर्ष पहले किया गया, लेकिन क्या हम अब भी उनसे बदला लेने के लिए कटिबद्ध हैं, जबकि आज वे हमारे हो चुके हैं। इसलिए जब उनके प्रति हम विशेष का भाव समाज को देते हैं, तो यह उचित नहीं लगता।
हमारे संविधान में समाज को बराबर का दर्जा दिया है। संविधान हमारे देश का सबसे बड़ा ग्रन्थ है, तो फिर क्या हम उसे मानने से इनकार कर देंगे । संगठित पूरे देश को होना है, न कि एक हिंदू समाज को ही। वहीं, दूसरी तरह देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री, जो स्वयं एक ‘योगी’ हैं, समय समय पर इस तरह की बात कर देते हैं जिससे समाज का एक खास समुदाय विचलित हो जाता है। फिर घात लगाकर किसी न किसी तरह हिन्दुओं पर निशाना साधता है और बड़ी से बड़ी वारदात को अंजाम देता है। लेकिन,सवाल यह है कि क्या हम उनकी पीठ पर हाथ रखकर वर्तमान समय के साथ उन्हें भी चलने के लिए प्रेरित और प्रोत्साहित नहीं कर सकते! मुख्यमंत्री बिल्कुल सच कहते हैं जाति, मत और सांप्रदाय के नाम पर सामाज को बांटने का कुचक्र वही परिणाम लाता है, जो आज बांग्ला देश में हो रहा है। लेकिन, उनके इस उद्गार की आलोचना भी हो रही है और कहा जा रहा है कि भारत में जो अल्पसंख्यकों पर तथाकथित अत्याचार हो रहा है, उसकी ही प्रतिक्रिया बांग्ला देश और पाकिस्तान में तो नहीं देखी जा रही है। युद्ध लड़ने के लिए हमारी सेना तो विश्व में अपना स्थान बनाकर रखी है, लेकिन हम अपनी आंतरिक मतभेदों को कैसे दूर करेंगे, विचार तो इस पर करना ही पड़ेगा। यह बात समझ से बाहर है कि हम समाज के एक वर्ग के सामने ऐसी स्थिति क्यों उत्पन्न करने चाहते हैं कि वह दोयम दर्जे का समाज है और समय—समय पर अपनी उपस्थिति की याद दिलाता है। एक ही बात बार—बार कहने और याद दिलाने से ऐसी बातें एक तरह से रटा दी जाती हैं, जिसे वह कभी भुला नहीं पाता।
उधर, देश के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल, जिन पर प्रधानमंत्री ने देश की सुरक्षा की जिम्मेदारी सौंपी है, वह भारत मंडपम के एक कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में देश के युवाओं को संदेश देते हैं कि अतीत में हुई घटनाओं का बदला लेने का समय आ गया है और उन्हें अपनी आग दिखानी चाहिए। उनका यह कथन किस कालखंड का है, इसका उल्लेख उन्होंने नहीं किया, लेकिन उसके जो निहितार्थ आज बुद्धजीवियों द्वारा निकाले जा रहे हैं, वह भारत का अल्पसंख्यक ही हो सकते हैं। पता नहीं हमारे समाज की अग्रिम पंक्तियों के लोग इस बात को क्यों भूल जाते कि देश में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जो हत्या हुई थी, वह अल्पसंख्यकों ने नहीं की थी । जस्टिस आत्माराम ने हत्या के आरोपी नौ लोगों में एक को सरकारी गवाह बन जाने की वजह से बरी कर दिया, एक को निर्दोष, पांच को उम्रकैद और दो जो सजा—ए—मौत दी थी। इनमें से कोई भी किसी अन्य समुदाय से नहीं था। हां, ठीक है उस बंटवारे के काल में दंगे भड़कने के कारण अनेक निरपराध हिंदू—मुसलमान मारे गए। तो क्या इतने वर्षों बाद भी हम उसी लकीर को पीटते रहेंगे और समाज के वातावरण को दूषित करते रहेंगे! फिर हमारे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार किस आग को मिटाने की बात कर रहे है। क्या उनकी मंशा यह है कि देश में दंगे भड़कें। यह ठीक है कि पांच सौ वर्षों तक मुगलों के राज्य करने के बाद उन्होंने भारतीयता को अपना लिया और जो कुछ देश का नुकसान हुआ, वह तो अंग्रेजों की नीतियों के कारण ही हुआ था। औपनिवेशिक शासक ने पहले ही सोच लिया था कि यदि हमें भारत पर लंबे समय तक राज करना है, तो हिंदू—मुसलमान के बीच फूट डालो, तभी वह अपने शासन को कायम रख सकेंगे। वे इस मकसद में सफल हुए और उन्होंने हमारे बीच फूट डालकर अपना हित साधते रहे। अब अंग्रेज तो चले गए, फिर हम उस लकीर को क्यों पीट रहे हैं? कहीं आज के राजनीतिज्ञों की मंशा अंग्रेजों की ही तर्ज पर इन दोनों प्रमुख संप्रदायों के बीच फूट डालो और लंबे समय तक राज्य करो की तो नहीं है?
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं)।
