Deepawali : आत्मप्रकाश से लोकमंगल तक

Himkar Shyam

Deepawali : उत्सवधर्मिता भारतीय संस्कृति की आत्मा रही है। हमारे पर्व-त्योहार केवल उल्लास और उमंग के अवसर नहीं, बल्कि जीवन-मूल्यों, सांस्कृतिक चेतना और सामूहिक संवेदना के संवाहक भी हैं। इसी उत्सवधर्मी परंपरा का एक विशिष्ट पर्व है दीपावली, जो अमावस्या की सघन कालिमा के बीच प्रकाश का शाश्वत संदेश लेकर आती है। यह अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक होने के साथ-साथ मनुष्य के भीतर ज्ञान, विवेक और मानवीय संवेदना के जागरण का अवसर भी है।

दीपोत्सव आशा, उत्साह और नई ऊर्जा का संचार करने वाला ज्योति पर्व है। दीप प्रज्ज्वलित करने की परंपरा के पीछे यही मंगलकामना निहित है कि अज्ञान और निराशा का अंधकार हमारे मन में तथा संवेदनहीनता और वैमनस्य का अंधेरा सामाजिक जीवन में स्थान न पाए। बाहरी परिवेश को प्रकाशमय बनाने के साथ अंतर्मन को सद्भाव, विवेक और सकारात्मकता से समृद्ध करने का संकल्प ही इस पर्व को वास्तविक अर्थ प्रदान करता है।

दीपक दीपावली का मूल प्रतीक है, जो भारतीय संस्कृति में शुभता, मंगल और ज्ञान का द्योतक है। अमावस्या की गहन अँधेरी रात में मिट्टी का एक छोटा-सा दीप भी आशा और आस्था की लौ जगाने की सामर्थ्य रखता है। उसकी ज्योति अज्ञान से ज्ञान और असत्य से सत्य की ओर अग्रसर होने की प्रेरणा देती है। ‘असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मा अमृतं गमय॥’ का वैदिक उद्घोष इसी शाश्वत जीवन-दृष्टि को अभिव्यक्त करता है। इसीलिए दीपावली का मर्म केवल घर-आँगन को रोशन करने तक सीमित नहीं है, बल्कि जीवन को ज्ञान, विवेक और मानवीय मूल्यों से आलोकित करने में निहित है।

दीपावली पर गणेश-लक्ष्मी का संयुक्त पूजन बुद्धि और समृद्धि के संतुलन का सांस्कृतिक संदेश देता है। गणेश विवेक और शुभारंभ के प्रतीक हैं, जबकि लक्ष्मी धन-वैभव और ऐश्वर्य की अधिष्ठात्री हैं। यह परंपरा हमें स्मरण कराती है कि समृद्धि का अर्थ केवल धन-संपत्ति का अर्जन नहीं, बल्कि उसके साथ सद्बुद्धि, विनम्रता और उदारता का होना भी है। विवेक, संवेदनशीलता और लोकमंगल की भावना से जुड़ा वैभव ही वास्तविक समृद्धि है।

दीपावली पर मिट्टी के दीप जलाने की परंपरा हमारी लोक-संस्कृति और सामूहिक चेतना से जुड़ी है। कुम्हार के श्रम और शिल्प-कौशल से आकार लेने वाला दीप केवल प्रकाश का साधन नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और सृजनशीलता का प्रतीक है। बिजली की झालरों और इलेक्ट्रॉनिक लाइटों के बढ़ते चलन के बावजूद मिट्टी के दीयों की सांस्कृतिक महत्ता बनी हुई है। इन्हें जलाना अपनी परंपरा के साथ कारीगरों के श्रम और हुनर का सम्मान करना भी है।

हालाँकि, पर्व की बाहरी भव्यता और बाजार की चकाचौंध के बीच उसकी आत्मिक आभा धूमिल पड़ती दिख रही है। खुशियाँ उपभोग और प्रदर्शन से जुड़ रही हैं, जबकि आत्मीयता, सहयोग और सामूहिकता का भाव कमजोर हो रहा है। जगमगाते बाजारों और घरों के बीच उन बस्तियों को भी याद रखना जरूरी है, जहाँ आज भी बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। विडम्बना है कि एक ओर भारत विश्व की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, वहीं दूसरी ओर देश की लगभग 80 करोड़ आबादी को मुफ्त खाद्यान्न उपलब्ध कराने वाली सरकारी व्यवस्था आर्थिक विषमता और खाद्य सुरक्षा की चुनौती को उजागर करती है।

संपत्ति का असमान वितरण भी आर्थिक विकास और सामाजिक वास्तविकता के बीच की खाई को उजागर करता है। विश्व असमानता रिपोर्ट 2026 के अनुसार, भारत की शीर्ष 10 प्रतिशत आबादी के पास देश की कुल संपत्ति का लगभग 65 प्रतिशत हिस्सा है, जबकि निचली 50 प्रतिशत आबादी की हिस्सेदारी महज 6.4 प्रतिशत है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या दीपोत्सव का उजाला समाज के हर वर्ग तक पहुँच रहा है? जिन कुम्हारों के हाथों से दीये आकार लेते हैं और जिन श्रमिकों के परिश्रम से शहर रोशन होते हैं, उनके जीवन में भी खुशियों का उजास होना चाहिए। पर्व की सार्थकता स्थानीय कारीगरों को प्रोत्साहन देने, जरूरतमंदों के साथ खुशियाँ बाँटने, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक सद्भाव को बढ़ावा देने में है। उत्सव का वास्तविक आनंद तभी पूर्ण होगा, जब उसकी खुशियाँ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचें।

ऐसे समय में भगवान बुद्ध का ‘अप्प दीपो भव’ अर्थात् स्वयं अपना दीपक बनो, का संदेश और अधिक प्रासंगिक हो उठता है। यह आत्मबोध और विवेकपूर्ण जीवन-दृष्टि अपनाने की प्रेरणा देता है। अपने भीतर सद्विचारों का प्रकाश जगाने और अपने आचरण से दूसरों के जीवन को आलोकित करने का भाव ही इसका मूल आशय है। अज्ञान, अहंकार, ईर्ष्या और संवेदनहीनता जैसी प्रवृत्तियों का प्रतिकार दया, करुणा, सेवा और सह-अस्तित्व जैसे मानवीय मूल्यों से ही संभव है। गीतकार गोपालदास नीरज की लोकप्रिय पंक्तियाँ भी इसी भावना को स्वर देती हैं—

जलाओ दीये तो रहे ध्यान इतना
अंधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।

दीपावली की सार्थकता भी इसी विचार में निहित है कि हमारे हिस्से का उजाला दूसरों के जीवन में आशा और उल्लास का संचार करे। अपने सुख में दूसरों की खुशियों को शामिल करने की संवेदना ही इस पर्व को वास्तविक अर्थ प्रदान करती है। दीपों की सामूहिक ज्योति मानो इसी भारतीय दर्शन को अभिव्यक्त करती है—‘सर्वे भवन्तु सुखिनः।’

TAGGED:
Share This Article
Leave a Comment