Democracy : जनता ही इतिहास की रचना करती है और जनता का इतिहास ही वास्तविक इतिहास होता है। जनता का उद्धार कोई सम्राट, देवता या जननायक नहीं करता, बल्कि जनता स्वयं अपने संघर्षों और प्रयासों से अपना उद्धार करती है। इन्हीं संघर्षों के माध्यम से उसकी मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है, उसकी स्वतंत्रता सुरक्षित रहती है और वह अपनी स्वतंत्रता को बनाए रखने में सक्षम होती है। जनता के अतिरिक्त कोई दूसरा उसे दान के रूप में मुक्ति नहीं दे सकता। इसलिए जनता पर दया करके उसके उद्धार के लिए संघर्ष करने की धारणा उचित नहीं है। वास्तविक आवश्यकता जनता के साथ खड़े होने और उसके संघर्षों से सीखने की है। नीतिगत दृष्टि से सरकार को भी जनता से शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए। हम दूसरे सिद्धांतों और अन्य देशों के जनसंघर्षों के इतिहास का अध्ययन करके उनसे सीख सकते हैं। यहाँ तक कि हम अपने विरोधियों से भी शिक्षा ले सकते हैं। लेकिन सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि हम जनता से सीखें, क्योंकि उसका ज्ञान और अनुभव व्यापक होता है तथा उसकी रचनात्मक शक्ति परिवर्तन का बड़ा आधार बन सकती है। इसलिए जनता को शिक्षा देने से पहले हमें स्वयं जनता से शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए। ऐसे में प्रश्न उठता है कि क्या आज हम जनता की वास्तविक भावनाओं, अपेक्षाओं और आवश्यकताओं को समझने का पर्याप्त प्रयास कर रहे हैं?
देश में आज जो राजनीतिक तनाव और टकराव दिखाई दे रहा है, उसके कारणों और परिणामों पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। क्या यह स्थिति देश और लोकतंत्र के हित में है? यदि किसी आंदोलन का उद्देश्य जनहित में परिवर्तन लाना है, तो उसके मुद्दों, मांगों और परिणामों का निष्पक्ष मूल्यांकन होना चाहिए। लेकिन यदि राजनीतिक टकराव बढ़कर नियंत्रण से बाहर हो जाए, तो उसके परिणाम किसी के हित में नहीं होंगे।
हमारा लोकतंत्र अनेक चुनौतियों का सामना कर चुका है और देश की जनता अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हुई है। यदि नागरिक अपने अधिकारों की मांग करते हैं, तो उनकी बात सुनी जानी चाहिए। विशेष रूप से युवाओं में व्याप्त असंतोष को केवल विरोध या अव्यवस्था के रूप में देखकर खारिज नहीं किया जा सकता। उनकी चिंताओं को समझना और उनका समाधान तलाशना आवश्यक है। युवाओं के भीतर उठ रहे असंतोष को शांत करना ज़रूरी है, लेकिन यह शांति केवल बल प्रयोग से स्थापित नहीं की जा सकती। इसके लिए संवाद, संवेदनशीलता और पारस्परिक विश्वास का वातावरण बनाना होगा। सरकार, प्रशासन और आंदोलनकारियों—सभी को ऐसा रास्ता तलाशना चाहिए, जिससे असहमति व्यक्त करने का अधिकार भी सुरक्षित रहे और कानून-व्यवस्था भी बनी रहे।
प्रदर्शनकारियों के साथ पुलिस के व्यवहार को लेकर उठने वाले सवाल भी गंभीर हैं। यदि शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे लोगों को जबरन हटाया जाता है, बसों में ठूँसकर ले जाया जाता है या उनके साथ अनुचित व्यवहार किया जाता है, तो ऐसी कार्रवाइयों की निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में पुलिस की कार्रवाई कानून, पारदर्शिता और जवाबदेही के दायरे में होनी चाहिए। कुछ प्रदर्शनकारियों ने यह आरोप भी लगाया है कि पुलिस की वर्दी में ऐसे लोग मौजूद थे जिनकी पहचान स्पष्ट नहीं थी और जिन्होंन प्रदर्शनकारियों के साथ मारपीट की। इसी तरह, प्रदर्शन को कवर करने वाले पत्रकारों के साथ कथित दुर्व्यवहार की शिकायतें भी सामने आई हैं। इन आरोपों की स्वतंत्र जाँच आवश्यक है। यदि पत्रकारों को घटनास्थल पर काम करने से रोका जाता है या उनके साथ हिंसा होती है, तो जनता तक सही और विश्वसनीय जानकारी पहुँचाने की प्रक्रिया प्रभावित होती है। स्वतंत्र पत्रकारिता लोकतंत्र का एक महत्त्वपूर्ण स्तंभ है और उसकी सुरक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए। दिल्ली में चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision—SIR) को लेकर विपक्ष द्वारा उठाए गए सवालों ने चुनावी पारदर्शिता पर बहस को फिर से केंद्र में ला दिया है। विपक्षी दलों का आरोप है कि मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण और चुनाव प्रक्रिया में अनियमितताएँ हुई हैं। वे मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका पर सवाल उठाते हुए उनके इस्तीफे अथवा उन्हें पद से हटाने की मांग कर रहे हैं।
विपक्ष ने कथित ‘वोट चोरी’ के मुद्दे पर भी चिंता जताई है। उसका कहना है कि मतदाता सूचियों में होने वाले बदलावों और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली की निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए। इसके अतिरिक्त, दिल्ली के ऐतिहासिक विरोध स्थल जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति और विरोध-प्रदर्शनों के लिए निर्धारित स्थानों को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं।
दूसरी ओर, सरकार और प्रशासन की ओर से ऐसे प्रदर्शनों को कानून-व्यवस्था के लिए चुनौती बताए जाने की बात सामने आई है। यहाँ यह समझना आवश्यक है कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोध करने का अधिकार और कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी, दोनों महत्त्वपूर्ण हैं। इन दोनों के बीच संतुलन स्थापित करना प्रशासन का दायित्व है। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनावों में विपक्षी दलों को मिले जनसमर्थन का उल्लेख करते हुए यह तर्क दिया जा सकता है कि उनकी आवाज़ को राजनीतिक विमर्श में महत्त्व मिलना चाहिए। उपलब्ध चुनावी आँकड़ों के अनुसार, कांग्रेस ने 99 सीटें जीती थीं, जबकि विपक्षी दलों के व्यापक गठबंधन ने कुल 234 सीटें प्राप्त की थीं। हालाँकि, सीटों की संख्या और मत प्रतिशत अलग-अलग तथ्य हैं। इसलिए किसी भी गठबंधन का सटीक मत प्रतिशत प्रस्तुत करते समय दलों की सूची, मतों के आधार और निर्वाचन आयोग के आधिकारिक आँकड़ों का स्पष्ट उल्लेख होना चाहिए। विपक्षी सांसदों ने राष्ट्रपति भवन की ओर मार्च किया और राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को ज्ञापन सौंपकर चुनाव प्रक्रिया से संबंधित अपनी चिंताओं से अवगत कराया। विपक्ष की ओर से मुख्य चुनाव आयुक्त की भूमिका की जाँच और चुनावी प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं पर कार्रवाई की मांग की गई।
राहुल गांधी की ओर से राष्ट्रपति के साथ हुई बातचीत को लेकर जो बयान दिया गया, उसके अनुसार विपक्ष को लगा कि राष्ट्रपति ने उनकी बातों को गंभीरता से सुना। दूसरी ओर, राष्ट्रपति भवन से जुड़े सूत्रों की ओर से इस बयान पर आपत्ति जताए जाने की बात भी सामने आई।
विपक्षी दलों ने चुनाव प्रक्रिया से जुड़े आरोपों को न्यायपालिका के समक्ष उठाने की भी बात कही है। उनका तर्क है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण और चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए न्यायिक हस्तक्षेप आवश्यक है। दूसरी ओर, न्यायालयों की भूमिका और उनके समक्ष प्रस्तुत याचिकाओं का मूल्यांकन कानून तथा उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर किया जाना चाहिए। किसी भी आरोप की सत्यता का निर्धारण केवल राजनीतिक दावों से नहीं हो सकता।
यदि मुख्य चुनाव आयुक्त या चुनाव आयोग के विरुद्ध गंभीर आरोप लगाए जाते हैं, तो उनका परीक्षण निर्धारित संवैधानिक और कानूनी प्रक्रियाओं के अनुसार होना चाहिए। किसी संवैधानिक पदाधिकारी को हटाने की प्रक्रिया भी कानून में निर्धारित प्रावधानों के अधीन होती है। इसलिए राजनीतिक मांग और कानूनी रूप से संभव कार्रवाई के बीच अंतर समझना आवश्यक है।
लोकतंत्र की शक्ति केवल चुनाव कराने या बहुमत प्राप्त करने में नहीं, बल्कि जनता के विश्वास को बनाए रखने में भी निहित है। चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था की निष्पक्षता पर जनता का भरोसा लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। इसी तरह, चुनावी प्रक्रिया पर उठने वाले सवालों का उत्तर तथ्यों, पारदर्शिता और उचित जाँच के माध्यम से दिया जाना चाहिए। यदि विपक्ष को चुनाव प्रक्रिया में अनियमितताओं की आशंका है, तो उसे अपने आरोपों के समर्थन में साक्ष्य प्रस्तुत करने चाहिए। वहीं, संबंधित संस्थाओं की जिम्मेदारी है कि वे उठाए गए सवालों का स्पष्ट और तथ्यपरक उत्तर दें। इससे न केवल विवाद का समाधान तलाशने में सहायता मिलेगी, बल्कि जनता का विश्वास भी मजबूत होगा। राजनीतिक असहमति को शत्रुता में बदल देना किसी भी लोकतंत्र के लिए उचित नहीं है। सरकार को विरोध की आवाज़ सुननी चाहिए, विपक्ष को जिम्मेदारी के साथ अपने सवाल उठाने चाहिए और प्रशासन को निष्पक्षता बनाए रखनी चाहिए। शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना और कानून का पालन सुनिश्चित करना एक-दूसरे के विरोधी उद्देश्य नहीं हैं।
आज आवश्यकता इस बात की है कि राजनीतिक पक्ष अपने-अपने दावों से आगे बढ़कर तथ्यों, संवाद और संवैधानिक मर्यादाओं को प्राथमिकता दें। यदि कोई आरोप सही है, तो उसकी निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए; यदि कोई दावा गलत है, तो उसे प्रमाणों के आधार पर स्पष्ट किया जाना चाहिए। अंततः, जनता केवल इतिहास की निर्माता ही नहीं, बल्कि लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति भी है। जनता की आवाज़ सुनना, उसके अनुभवों से सीखना और उसके अधिकारों का सम्मान करना किसी भी सरकार की जिम्मेदारी है। लोकतंत्र की परिपक्वता इस बात से तय होती है कि वह असहमति को किस तरह स्वीकार करता है और विवादों का समाधान कितनी निष्पक्षता से करता है ।
(लेखक वरिष्ट पत्रकार और स्तंभकार हैं)