Dhar Bhojshala : ज्ञान की अधिष्ठात्री वाग्देवी: भोजशाला विवाद और सत्य की गूंज

Bindash Bol


Dhar Bhojshala : सदियों से इतिहास के पन्नों और विवादों के धुएं में छिपी धार की भोजशाला को आखिरकार मध्य प्रदेश हाई कोर्ट से न्याय का सवेरा मिला है, जिसने यह साफ कर दिया कि यह परिसर और कुछ नहीं, बल्कि ज्ञान की देवी माँ वाग्देवी का पवित्र धाम है।

भोजशाला मामला: हाई कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय

​मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक और युगांतरकारी फैसला सुनाते हुए यह निष्कर्ष निकाला है कि धार जिले में स्थित विवादित भोजशाला-कमल मौला मस्जिद परिसर का मूल और वास्तविक धार्मिक स्वरूप ‘भोजशाला’ ही है। अदालत ने स्पष्ट रूप से इसे देवी वाग्देवी (सरस्वती) के मंदिर के रूप में स्वीकार किया है।
​भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की वैज्ञानिक सर्वेक्षण रिपोर्ट और ऐतिहासिक साक्ष्यों को आधार बनाते हुए कोर्ट ने माना कि इस परिसर का निर्माण एक भव्य मंदिर के रूप में किया गया था। इस निर्णय ने न केवल कानूनी विवाद को एक नई दिशा दी है, बल्कि करोड़ों सनातन धर्मावलंबियों की आस्था को भी संवैधानिक संबल प्रदान किया है।

कौन हैं माँ वाग्देवी?

​’वाग्देवी’ शब्द दो शब्दों के मेल से बना है— वाक् (वाणी) और देवी। अर्थात, जो वाणी, ज्ञान, बुद्धि, कला, साहित्य और संगीत की अधिष्ठात्री हैं, वही वाग्देवी हैं। सनातन परंपरा में इन्हें देवी सरस्वती का ही स्वरूप माना जाता है।

​ऋग्वेद से लेकर पुराणों तक में वाग्देवी की महिमा का वर्णन है। वे केवल अक्षरों की देवी नहीं हैं, बल्कि चेतना, विवेक और अभिव्यक्ति का आधार हैं। धार की भोजशाला में स्थापित माँ वाग्देवी की मूल प्रतिमा अत्यंत अलौकिक और कलात्मक है, जो वर्तमान में लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में रखी हुई है। हिंदू समाज लंबे समय से इस प्रतिमा को वापस भारत लाने और भोजशाला में पुनर्स्थापित करने की मांग कर रहा है।

राजा भोज और भोजशाला का गौरवशाली इतिहास

​भोजशाला का इतिहास 11वीं सदी के महान विद्वान, कलाप्रेमी और परमार वंश के राजा भोज से जुड़ा है। राजा भोज स्वयं एक प्रकांड पंडित और कई ग्रंथों के रचयिता थे। उन्होंने सन 1034 में धार में एक भव्य विश्वविद्यालय (सरस्वती कंठाभरण) की स्थापना की थी, जिसे ‘भोजशाला’ कहा गया।

* ज्ञान का वैश्विक केंद्र: यह केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि एक ऐसा विश्वविद्यालय था जहां देश-विदेश से छात्र दर्शन, व्याकरण, खगोलशास्त्र और संगीत की शिक्षा लेने आते थे।

* इतिहास की त्रासदी: 13वीं और 14वीं सदी में अलाउद्दीन खिलजी और बाद में कमालुद्दीन मौला के काल में इस सांस्कृतिक धरोहर पर आक्रमण हुए और इसे मस्जिद के स्वरूप में बदलने का प्रयास किया गया। लेकिन स्तंभों पर उकेरे गए संस्कृत श्लोक, सनातन प्रतीक और वाग्देवी की स्तुतियां आज भी इसके मंदिर होने की गवाही चीख-चीख कर दे रही थीं।

सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व

​हाई कोर्ट का यह फैसला केवल एक जमीन के टुकड़े का मालिकाना हक तय नहीं करता, बल्कि यह भारत की खोई हुई सांस्कृतिक विरासत को पुनर्जीवित करने का एक जरिया है। वसंत पंचमी के दिन भोजशाला में माँ वाग्देवी की पूजा का विशेष महत्व है। इस निर्णय के बाद अब यह सिद्ध हो चुका है कि जिस स्थान पर सदियों तक केवल विवाद की राजनीति होती रही, वह मूल रूप से ज्ञान की अविरल गंगा बहाने वाला शिक्षा का मंदिर था।

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