मनोज कुमार
Gaganyaan mission : भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम इन दिनों एक बेहद रोमांचक दौर में है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने 24 अगस्त की सुबह गगनयान मिशन की दिशा में एक बड़ी छलांग लगाई है।
श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र में किए गए पहले ‘इंटीग्रेटेड एयर ड्रॉप टेस्ट’ (IADT-01) ने साबित कर दिया कि भारत अब अपने अंतरिक्ष यात्रियों को सुरक्षित अंतरिक्ष यात्रा के बाद धरती पर ला सकता है।
इसरो का यह परीक्षण दरअसल गगनयान मिशन के लिए तैयार किए जा रहे मानवयुक्त क्रू मॉड्यूल की सुरक्षा से सीधे जुड़ा है। टेस्ट के तहत एक भारी टेस्ट क्रू मॉड्यूल को चिनूक हेवी लिफ्ट हेलिकॉप्टर की मदद से तीन किलोमीटर की ऊंचाई से गिराया गया। जैसे ही मॉड्यूल हवा में गिरा, उस पर लगा हाईटेक पैराशूट सिस्टम सक्रिय हो गया— पहले छोटे बेलनाकार पैराशूट (ड्रोग), फिर पायलट और अंत में मुख्य पैराशूट खुले। इस सिस्टम की बदौलत भारी मॉड्यूल की रफ्तार धीरे-धीरे इतनी कम हो गई कि वह समुद्र की सतह पर बिल्कुल सुरक्षित ढंग से उतर गया।
इसरो, DRDO, भारतीय वायुसेना, नौसेना और कोस्ट गार्ड जैसी कई एजेंसियों ने मिलकर इस महत्वपूर्ण मिशन को अंजाम दिया। पैराशूट सिस्टम में कुल दस अलग-अलग पैराशूट इस्तेमाल हुए, जो गगनयान मिशन के असली वापसी क्रम से पूरी तरह मेल खाते हैं। इनका उद्देश्य एक ही है— अंतरिक्ष से लौट रहे भारतीय क्रू मॉड्यूल की स्पीड को सुरक्षित सीमा तक घटाना, ताकि किसी भी हालात में क्रू की जान को खतरा न हो।
इसरो का कहना है कि आने वाले महीनों में ऐसे और भी टेस्ट किए जाएंगे। इनमें पैराशूट सिस्टम को अलग-अलग परिस्थितियों में, अलग ऊंचाई और मौसम में, हर संभावना को ध्यान में रखते हुए परखा जाएगा। दिसंबर 2025 में अनमैन्ड (बिना इंसान) गगनयान मिशन लॉन्च होगा और इसके बाद 2028 में भारत अपने पहले अंतरिक्ष यात्रियों को अंतरिक्ष में भेजने का सपना सच होते देख सकता है।
गगनयान मिशन के ये प्रयास न सिर्फ भारत की तकनीकी क्षमता और आत्मनिर्भरता को दुनिया के सामने रखेंगे, बल्कि करोड़ों भारतीयों के लिए गर्व और आत्मविश्वास का कारण भी बन जाएंगे।
ISRO की यह छलांग भविष्य की अंतरिक्ष यात्राओं के लिए भारत का रास्ता खोल रही है, और देश को स्पेस सुपरपावर क्लब में शामिल करने के एक कदम नजदीक ले जा रही है।
