Jharkhand Students Protest : झारखंड के छात्र आंदोलनों की एक अनकही खूबसूरती यह है कि यहाँ की सड़कों पर कोई पत्रकार किसी छात्र से JPSC या JSSC का फुल फॉर्म पूछकर उसकी योग्यता नापने का दुस्साहस नहीं कर रहा। डर वाजिब है—क्योंकि छात्र तो पूरी निष्ठा से जवाब दे देंगे, लेकिन पलटकर अगर छात्रों ने रिपोर्टर से ‘मास कम्युनिकेशन’ की बुनियादी परिभाषा पूछ ली, तो हाथ में महंगे आईफोन और माइक थामे बगलें झांकने की नौबत आ जाएगी।
सड़कों पर उतरा हर छात्र किसी क्रांति के जीवित दस्तावेज जैसा है। इन्हीं के बीच एक ऐसा युवा चेहरा भी है, जिसे देश का संविधान ज़बानी रटा हुआ है। जब वह “हम भारत के लोग…” से बोलना शुरू करता है, तो बिना साँस लिए फर्राटेदार तरीके से अपनी बात रखता चला जाता है। उसे डर है कि कहीं उसके साँस लेने भर की देर में उसकी आवाज़ दबा न दी जाए—और दुर्भाग्य से, आज का मीडिया माहौल कुछ ऐसा ही कर रहा है।
फिलहाल, झारखंड का यह छात्र आंदोलन अपने सबसे ‘रौद्र रूप’ में पहुँच चुका है। अब तक जिन बाहरी चेहरों को दिल्ली में रहने और झारखंड न आने के ताने मिल रहे थे, वे सब अब इस आंदोलन का हिस्सा बन रहे हैं। अलग-अलग तारीखों पर विधानसभा घेराव की घोषणाएं हो रही हैं। लेकिन भीड़ और समर्थन के इस सैलाब के साथ एक बड़ी चुनौती भी खड़ी हो गई है।
आंदोलनकारी छात्र चाहे कितने भी पढ़े-लिखे और समझदार क्यों न हों, खतरा इस बात का है कि ‘रील कल्चर’ से संचालित इस दौर में अगर यह प्रदर्शन एक बार सनसनी की भेंट चढ़ गया, तो माइक का टुकड़ा पकड़े यूट्यूबर्स का तांता लग जाएगा। डर इस बात का है कि न्याय की माँग कर रहा एक सच्चा और संजीदा आंदोलन केवल व्यूज और कंटेंट बटोरने वाली ‘एंटरटेनमेंट की मंडी’ बनकर न रह जाए।
अगले तीन दिन इस आंदोलन के भविष्य और दिशा तय करने के लिए बेहद निर्णायक होने वाले हैं।
