- खरसावां गोलीकांड का जनरल डायर कौन?
- स्टील सिटी जमशेदपुर से करीब साठ किलोमीटर की दूरी पर आदिवासी बहुल कस्बा खरसावां
- गोलीकांड का प्रमुख कारण था खरसावां के उड़ीसा राज्य में विलय का विरोध
- हजारों आदिवासी लोगों की भीड़ पर पुलिस ने मशीन गनों से फायरिंग कर दी थी। इसमें हजारों लोग मारे गए थे। समाजवादी नेता राम मनोहर लोहिया ने तो इसे आजाद भारत का जलियां वाला बाग कांड करार दिया था।
Kharsawan massacre : 1 जनवरी 1948…। देश आज़ादी की नई सुबह में सांस ले रहा था। लेकिन खरसावां की धरती पर
हज़ारों आदिवासी अपने हक़ और पहचान की आवाज़ लेकर खड़े थे। उस दिन अपने देश की पुलिस ने ही हजारों आदिवासियों की भीड़ पर मशीन गनों से दनादन फायरिंग की थी।
उन्हें जवाब मिला- मशीन गनों से। पुलिस की गोलियों ने एक साथ लोगों की सांसें, सपने और इतिहास—सब छलनी कर दिए।इसमें कितने लोगों की मौत हुई, इसके अलग-अलग दावे किए जाते हैं।
यह कोई उपद्रव नहीं था, यह एक जनसंहार था। जिसे समाजवादी नेता डॉ. राम मनोहर लोहिया ने खुलकर कहा—“आजाद भारत का जालियांवाला बाग।”
दुखद बात यह थी कि यह घटना उस दौर में हुई, जब देश स्वतंत्रता के बाद पहले नए साल का जश्न मना रहा था। आइए जानते हैं, क्या था यह 75 साल पुराना यह खरसावां हत्याकांड…
भारत की स्वतंत्रता के पश्चात तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के साथ पूरा देश उमंग में था और गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल के नेतृत्व में रियासतों का विलय हो रहा था। उसी दौरान सिंहभूम स्टेट में आने वाले सरायकेला और खरसावां को लेकर समस्या खड़ी हो गई। इन दोनों क्षेत्रों के लोग झारखंडी संस्कृति का पालन करने वाले थे, जबकि उनके शासन उड़िया भाषी थे। शासकों ने ओडिशा के साथ सरायकेला और खरसावां के विलय का प्रस्ताव रख दिया और जनता की मंशा को नजरअंदाज कर दिया गया। इस प्रस्ताव को भारत सरकार ने भी स्वीकार कर लिया था, जिससे झारखंडी आदिवासी समाज में गुस्सा भड़क गया। दरअसल यह पूरा प्लान प्रभावशाली उड़िया नेता विजय कुमार पाणी ने बनाया था। उनका यह भी प्रस्ताव था कि चक्रधरपुर का ओडिशा में विलय कर दिया जाए।

खरसावां का उड़ीसा में विलय के विरोध में एकजुट हुए थे आदिवासी
दरअसल, खरसावां को उड़ीसा राज्य में विलय करने का फैसला वहां के राजा ने लिया। लेकिन आदिवासी और स्थानीय लोग इस विलय का विरोध कर रहे थे। लेकिन सरायकेला के साथ खरसावां रियासत का भी उड़ीसा में विलय का समझौता हो चुका था। 1 जनवरी 1948 को यह समझौता लागू होना था। उस समय के बड़े आदिवासी नेता जयपाल सिंह मुंडा ने भी इस फैसले का विरोध करते हुए आदिवासियों से 1 जनवरी को खरसावां पहुंचकर विलय के खिलाफ आवाज बुलंद करने का आह्वान किया। इसी आह्वान पर खरसावां में दूरदराज इलाको से लेकर आसपास के इलाकों के हजारों आदिवासियों की भीड़ सभा में पहुंची थी। आदिवासी समाज के लोग अपने पारंपरिक हथियारों के साथ इकट्ठा हो रहे थे।
इस फैसले के खिलाफ हजारों लोग उतर आए और इसके आजादी की दूसरी लड़ाई आदिवासियों ने करार दिया। जयपाल सिंह मुंडा भी पर ही लिखी गई पुस्तक ‘द लाइफ एंड टाइम्स ऑफ जयपाल सिंह मुंडा’ में संतोष किरो लिखते हैं कि यह झारखंडी लोगों के लिए अपनी पहचान बचाने का आंदोलन था। वह लिखते हैं, ‘कांग्रेस और ओडिशा की कांग्रेस सरकारें झारखंड की आबादी को लेकर चिंतित नहीं थीं। जयपाल को लगा इस तरह तो झारखंडियों का भविष्य अंधेरे में चला जाएगा। उन्होंने झारखंड की अलग पहचान और अस्तित्व की मांग को लेकर आंदोलन शुरू कर दिया।’
मशीनगन गाड़ कर लकीर खींच कर लोगों को दी गई चेतावनी
दूसरी तरफ उड़ीसा पुलिस भी खरसावां को अपने राज्य में मिलाने के लिए सभी आवश्यक तैयारी कर चुकी थी। कई बुजुर्ग बताते हैं कि गोलीकांड के दिन खरसावां में ब्लॉक आफिस और डाक बंगला के निकट मैदान में हजारों की भीड़ इकट्ठा हो गई, तो वहां पर एक मशीनगन गाड़ कर एक लकीर खींच दी गई थी। पुलिस की ओर कहा गया कि भीड़ इस लकीर को पार कर राजा से मिलने की कोशिश न करें। लेकिन अचानक हजारों की भीड़ पर पुलिस की ओर से मशीनगन से दनादन फायरिंग शुरू हो गई।
मरने वालों की संख्या 30 हजार तक बताई जाती है
अंत में 1 जनवरी, 1948 को आदिवासी महासभा के बैनर तले खरसावां में बड़ी संख्या में लोग जुटे। इनमें महिलाएं भी शामिल थीं और इन लोगों की पीठ पर तीर और धनुष थे। कई दिनों का राशन-पानी पीठ पर ही लादकर ये लोग खरसावां के हाट मैदान में पहुंचे थे। ये लोग चक्रधरपुर, सरायकेला, खरसावां और जमशेदपुर जैसे इलाकों से आए थे। ये लोग जब सरकार के प्रतिनिधियों को ज्ञापन देकर लौट रहे थे तो उड़िया पुलिस ने उन पर फायरिंग शुरू कर दी। इस गोलीकांड में मारे गए लोगों की संख्या के बारे में बहुत कम दस्तावेज उपलब्ध हैं। पूर्व सांसद और महाराजा पीके देव की किताब ‘मेमोयर ऑफ ए बायगॉन एरा’ के मुताबिक इस घटना में दो हजार लोग मारे गए थे। वहीं तब के कलकत्ता से प्रकाशित अंग्रेजी अखबार द स्टेट्समैन ने घटना के तीसरे दिन अपने तीन जनवरी के अंक में इस घटना से संबंधित एक खबर छापी, जिसका शीर्षक था- ‘35 आदिवासी किल्ड इन खरसावां’। इस गोलीकांड की जांच के लिए ट्रिब्यूनल का भी गठन किया गया, पर उसकी रिपोर्ट का क्या हुआ, किसी को पता नहीं।’ हालांकि गैर-आधिकारिक दावों में मारे गए लोगों की संख्या 30 हजार तक बताई जाती है।

कुएं में भर दी गई थी लाशें
खरसावां गोलीकांड के बारे में जानकार बताते हैं कि जब हजारों की भीड़ पर अचानक फायरिंग हुई तो कई लोगों की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि बड़ी संख्या में लोग घायल भी हो गए। अभी जो शहीद स्थल था, उसी के निकट एक कुआं था। इस कुएं का निर्माण राजा रामचंद्र सिंहदेव ने कराया था। उसी कुएं में लाश फेंक दी गई। इतना ही नहीं अधमरे लोगों से भर दिया गया और फिर उसे ढक दिया गया।
खरसावां गोलीकांड के कारण उड़ीसा में विलय रुका
खरसावां गोलीकांड पर पूरे देश में प्रतिक्रिया हुई। इस घटना के बाद खरसावां-सरायकेला और चक्रधरपुर का उड़ीसा में विलय रोक दिया गया। घटना के बाद उस जगह पर हर साल 1 जनवरी को आदिवासी रीति-रिवाज से पूजा अर्चना कर शहीदों को नमन किया जाता है।
राम मनोहर लोहिया ने बताया था दूसरा जलियांवाला कांड
इस घटना पर राम मनोहर लोहिया ने दुख जाहिर करते हुए इसकी तुलना जलियांवाला बाग हत्याकांड से की थी। उन्होंने कहा था, ‘यह दूसरा जलियांवाला बांग कांड था। जलियांवाला बांग हत्याकांड भारत की आजादी के आंदोलन में अहम भूमिका रखता है। उस कांड को विदेशी सरकार ने अंजाम दिया था और विदेशी जनरल डायर के आदेश पर ही यह हुआ था। अब आजाद भारत में ओडिशा सरकार ने अपने ही लोगों पर यह जुल्म ढाया है। इससे शर्मनाक और दुर्भाग्यपूर्ण कुछ नहीं हो सकता।’
इस घटना के 75 साल से अधिक समय बाद भी देश और झारखंडियों के जेहन में कई सवाल आज भी वैसे ही खड़े हैं, जिसका उत्तर मिलना बाकी है।
👉जालियांवाला बाग में हत्यारे का नाम इतिहास ने दर्ज किया। खरसावां में लाशें गिरीं, पर नाम आज भी ग़ायब है।
👉जांच आयोग बना, रिपोर्ट कभी सामने नहीं आई।
👉शहीदों की संख्या पर बहस है, लेकिन इंसाफ़ पर सन्नाटा।
👉आज सवाल सिर्फ अतीत का नहीं, लोकतंत्र की आत्मा का है—
जब देश आज़ाद था, तो आदिवासी क्यों मारे गए?
👉और सबसे बड़ा सवाल—
खरसावां गोलीकांड का जनरल डायर कौन था?
