कबीर संजय
LION : बीते पांच सालों में शेरों की आबादी में 32 फीसदी का इजाफा हुआ है। वर्ष 2020 में हुई शेर गणना में 674 शेरों की मौजूदगी दर्ज की गई थी। जबकि, वर्ष 2025 की गणना बताती है कि अब शेरों की संख्या 891 पर पहुंच गई है। यानी पांच सालों में 32.2 फीसदी का इजाफा हुआ है। यह खबर खुश होने वाली है या परेशान करने वाली। मुझसे पूछा जाए तो मैं कहूंगा कि खबर पर चिंता तो जरूर जाहिर करनी चाहिए। क्यों भला। इसके पीछे कई कारण है।
शेरों के संरक्षण के प्रति लोगों को जागरुक करने के लिए दस अगस्त को विश्व शेर दिवस मनाया जाता है। इस दस अगस्त को यानी बीते रविवार को पर्यावरण मंत्रालय की ओर से शेरों की ताजी गणना की रिपोर्ट जारी की गई है। इसमें ही शेरों की संख्या में हुई इस बढ़ोतरी की जानकारी दी गई है।
कभी भारत के एक बड़े भू-भाग में शेर पाए जाते थे। भारत ही नहीं बल्कि आसपास के भी कई देशों में इनकी मौजूदगी थी। हरियाणा और दिल्ली में भी शेरों का पर्यावास मौजूद था। दिल्ली रिज पर शायद 1836 में अंतिम बार शेर की साइटिंग को दर्ज किया गया था। शेरों के साथ हमेशा ही ताकत और रौब जुड़ा रहा है। लेकिन, शेरों की यही शक्ति उनकी मौत का कारण बन गया। खुद को ज्यादा से ज्यादा बहादुर दिखाने के लिए शेरों का जमकर शिकार किया गया। अपनी हेकड़ी में शिकारी उनकी खालों को अपने यहां प्रदर्शित भी करते थे। उनके लिए यह एक प्रकार से बहादुरी का तमगा था।
यहां तक कि शेर भारत में लगभग विलुप्त हो गए। माना जाता है कि गुजरात के जूनागढ़ में एक समय उनकी संख्या 20 से भी कम बची थी। जब नवाब जूनागढ़ ने उनके शिकार पर प्रतिबंध लगा दिया। भारत में शेरों का संरक्षण की शुरुआत वहीं से मानी जा सकती है। इसके बाद से ही लगातार किए जाने वाले प्रयासों के चलते शेरों की संख्या में यह बढ़ोतरी हुई है। इसलिए निश्चित तौर पर शेरों का अगर कुनबा बढ़ता है तो यह एक खुशी की खबर है। संरक्षण के लिए किए जाने वाले प्रयासों की यह सफलता भी है।
लेकिन, इसके साथ ही संरक्षण के साथ जुड़े कई मुद्दे हैं, जिनकी लगातार अनदेखी की जा रही है। सोशल माध्यमों पर इस तरह के वीडियो भरे पड़े हैं, जिनमें शेरों और इंसान का आमना-सामना हो रहा है। अभी सप्ताह भर पहले ही अपने शिकार को खाने जा रहे एक शेर के बहुत करीब एक युवक पहुंच गया था। इसका वीडियो वायरल हो रहा था। जबकि, इसके कुछ ही दिन पहले एक निर्माणाधीन इमारत की छत पर सो रहे मजदूरों के पास टहलते-घूमते शेर पहुंच गए थे। गुजरात से आने वाले इस तरह के वीडियो की भरमार है। आखिर ऐसा क्यों है।
इसके पीछे कारण है कि शेरों की आबादी बढ़ने के साथ उन्हें ज्यादा बड़े जंगल की जरूरत पड़ रही है। लेकिन, उन्हें पर्याप्त जगह नहीं मिल रही है। वे कसमसा रहे हैं। रिपोर्ट बताती है कि शेरों की आबादी का केवल बीस फीसदी हिस्सा ही 258 वर्ग किलोमीटर में बसे गिर नेशनल पार्क के कोर एरिया में रहते हैं। बाकी शेर इसके बफर एरिया या जंगल की परिधि पर रहते हैं। जहां इंसानों के साथ अक्सर ही उनका आमना सामना हो जाता है। परिधि पर रहने वाले ये शेर आमतौर पर मवेशियों के शिकार पर या मरे हुए मवेशियों पर गुजारा कर रहे हैं। हर बार जब इंसान के साथ इनकी मुठभेड़ होती है तो इंसान और शेर दोनों का ही जीवन संकट में पड़ जाता है। ऐसे में इंसान के साथ आमना-सामना होने की इतनी ज्यादा घटनाएं निश्चित तौर पर शुभ संकेत नहीं कही जा सकती हैं।
शेरों को गुजरात के गिर क्षेत्र से अलग एक घर दिए जाने की कवायद काफी लंबी रही है। लेकिन, इसे गुजरात के प्राइड से जोड़कर एक तरह से हमेशा से ही कोशिश यह होती रही है कि इन्हें गुजरात से बाहर नहीं जाने दिया जाए। इस संबंध में लंबी कानूनी लड़ाई के बाद वर्ष 2013 के अप्रैल में सुप्रीम कोर्ट ने शेरों की आबादी के कुछ हिस्से को कूनो नेशनल पार्क मध्य प्रदेश में बसाने के निर्देश दिए थे। लेकिन, संयोग ऐसा रहा कि नवाब जूनागढ़ के आधुनिक संस्करण 2014 में दिल्ली चले आए। इसके बाद उनकी इच्छा के विरोध में परिंदा भी पर कैसे मार सकता था। तो कुछ नहीं हुआ। शेरों का कुनबा तो बढ़ा, लेकिन छोटे से घर में बढ़ती आबादी के चलते वे कसमसाने लगे।
हमारे यहां शेरों की जो प्रजाति पाई जाती है उसे एशियाई शेर कहा जाता है। यह प्रजाति अफ्रीकी शेरों से अलग है। पहले यह भारत समेत आसपास के कई देशों में पाई जाती थी। लेकिन, अब यह सिर्फ गुजरात में ही पाई जाती है। हो सकता है कि आने वाले समय में इसे एशियाई शेर कहना भी बंद कर दिया जाए।
इसे गुजराती शेर कहना ज्यादा उपयुक्त माना जाने लगे…
