ध्रुव गुप्त
(आईपीएस) पटना
Navratri 2026 : देश में महिषासुर-मर्दिनी मां दुर्गा की आराधना का नौ दिवसीय पर्व नवरात्र मनाया जा रहा है। महिषासुर को आमतौर पर एक बलवान, दुराचारी शासक या शैतानी शक्ति के रूप में चित्रित किया जाता है जिसे देवताओं की सम्मिलित शक्ति की प्रतीक देवी दुर्गा ने मार डाला था। बात इतनी सीधी नहीं है। महिषासुर के बारे में यह भ्रम इस शब्द का गलत अर्थ करने से पैदा हुआ है। यह नाम महिष और असुर शब्दों के योग से बना है। महिष का प्राचीन अर्थ महा शक्तिमान है। शक्तिशाली रानी को आज भी महिषी ही कहा जाता है। महिष का भैंसा के अर्थ में प्रयोग बाद के पुराणों में हुआ है। असुर का अर्थ भी नकारात्मक शक्ति नहीं है। वैदिक कोष के अनुसार ’असुराति दादाति इति असुर’ अर्थात जो असु अथवा प्राण दे वह असुर है। महिषासुर प्राचीन काल का एक लोकप्रिय और शूरवीर असुर नायक था। स्वयं पुराण भी स्वीकार करते हैं कि वह अपने समय का सबसे बड़ा आर्येतर योद्धा था। अपने विस्तार के क्रम में देव कहे जाने वाले आर्य राजाओं ने कई बार उसे पराजित करने की कोशिशें कीं लेकिन असफल ही रहे। उलटे महिषासुर ने उन्हें पराजित कर उनके स्वर्ग या वैभवशाली नगरों पर अधिकार कर लिया। हताश देवों ने अंततः इस तथ्य का पता लगाया कि महिषासुर स्त्रियों और पशुओं के विरुद्ध हथियार नहीं उठाता है। उसके चरित्र के इस उज्ज्वल पक्ष का लाभ उठाते हुए देवों ने युद्ध में वीरांगना देवी दुर्गा को भेजकर उसे पराजित कर मार डालने में सफलता हासिल की। महिष अपने लोगों में कितना लोकप्रिय था इसका अनुमान इस तथ्य से लगता है कि हजारों साल बाद झारखंड में असुर जनजाति के लोग अबभी उसकी पूजा करते हैं। बुंदेलखंड के गांव चौका सोरा में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित एक महिषासुर स्मारक मंदिर आज भी मौजूद है।
हमारा राष्ट्र पिछले हजारों वर्षों में हजारों आस्थाओं, संस्कृतियों और जातियों के बीच संघर्ष और समन्वय की विराट कोशिशों से बना है। हमारे यहां युद्ध जीतने वालों को ही नहीं,बल्कि युद्ध में पराजित और मृत योद्धाओं को भी सम्मान देने की परंपरा रही है। यहां देवी दुर्गा की भी पूजा होती है और महिषासुर की भी। राम की भी और रावण की भी। नाग जनजाति के सबसे बड़े संहारक जनमेजय की भी और नागों के जातीय नायकों – वासुकि और शेषनाग की भी। यह सांस्कृतिक विविधता हमारे देश की खूबसूरती है। पुराणों के रूप में हमारा प्राचीन इतिहास आर्येत्तर जातियों द्वारा नहीं, बल्कि आर्य राजाओं के पुरोहितों द्वारा लिखा गया। आश्रयदाताओं के महिमामंडन के उद्देश्य से विपक्षियों को शैतान या बुराइयों के प्रतीक के रूप में चित्रित करना उनकी मजबूरी थी। हमारे आगे वैसी विवशता नहीं होनी चाहिए। हमारे लिए वीरांगना देवी दुर्गा वंदनीय हैं लेकिन असुर जनजाति के जननायक महिष के प्रति भी हमारे मन में सम्मान होना चाहिए।