Pitru Paksha : पितृपक्ष का भावनात्मक पक्ष

Bindash Bol

ध्रुव गुप्त
(आईपीएस) पटना

Pitru Paksha : पितृपक्ष का आरम्भ हो गया है। पितृपक्ष माने दैनंदिन के कामों से थोड़ा अवकाश निकालकर अपने पूर्वजों और दिवंगत प्रिय लोगों को याद करने का अवसर। मरने के बाद किसी का क्या होता है, यह सवाल मानवता को सदा से परेशान करता रहा है। विज्ञान कहता है कि देह के अंत के बाद सब समाप्त हो जाता है। शरीर से अलग आत्मा का कोई अस्तित्व ही नही। धर्म और अध्यात्म कहते हैं कि मृत्यु के बाद देह तो मिट्टी में मिल जाती है लेकिन सूक्ष्म देह या आत्माएं प्रेत बनकर काम्य वस्तुओं, प्रिय लोगों और स्थानों के गिर्द भटकते हुए अगले जीवन की परिस्थितियां तलाश करती हैं। ऐसा है तो पितृपक्ष या श्राद्ध में किए जाने वाले कर्मकांड या पितरों को अर्पित की जानेवाली संपति, भोजन और कपड़ों का क्या मतलब ? भौतिक देह नहीं तो भौतिक वस्तुओं की क्या आवश्यकता ? तार्किक यह है कि पितृपक्ष में परिवार के लोग रोज कुछ समय साथ बैठें और अपने प्रिय दिवंगतों और उनसे जुडी अच्छी बातों को याद करें। मृत्यु के बाद पूर्वजों की किसी आयाम में उपस्थिति है तो उन्हें यह देखकर खुशी जरूर होगी कि उनके अपने उनके बाद भी सम्मान के साथ उन्हें याद करते हैं। अगर आप मानते हैं कि देह से अलग आत्मा का अस्तित्व नहीं तब भी पितृपक्ष अपने पूर्वजों के प्रति आभार प्रकट कर भावनात्मक तौर पर खुद को समृद्ध करने का अवसर तो है ही।


पेंटिंग _ Arun Misra

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