Shardiya Navratri 2026 : शारदीय नवरात्र आज से शुरू हो रहा है। रविवार को आश्विन शुक्ल प्रतिपदा में चित्रा नक्षत्र, वैधृति योग और द्विपुष्कर योग के साथ बव करण, तुला लग्न का संयोग बन रहा है।
इस बार नवरात्र 10 दोनों का होगा। दो दिन अष्टमी तिथि होने से 10 दिन तक देवी माता की उपासना होगी। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, नवरात्रि पर्व में तिथि का बढ़ना शुभ माना गया है।
नवरात्र के दौरान वेदमंत्रों की ध्वनि से पूरा शहर गूंजायमान रहेगा। घर और पूजा पंडालों में दस दिन तक माता के विभिन्न स्वरूपों की पूजा होगी।
गज पर होगा आगमन और विदाई
ज्योतिषाचार्य एवं विद्वानों के मुताबिक शारदीय नवरात्र के पहले दिन में रविवार होने से देवी मां का आगमन गज यानि हाथी पर पर होगा। वहीं विजयादशमी को बुधवार दिन होने से देवी की विदाई भी हाथी पर ही होगा।
देवी भागवत पुराण के अनुसार, देवी दुर्गा के हाथी पर आगमन और विदाई शुभ, सौख्य, समृद्धि, आर्थिक उन्नति एवं सुवृष्टि प्रदायक होता है। इससे देश, कृषि, पर्यावरण, जीव-जंतु और मनुष्य सभी को लाभ होगा।
वेदोक्त मंत्रोच्चार के साथ होगा घट स्थापना
ज्योतिषाचार्य एवं विद्वानों ने बताया कि आज से शुरू हो रहे शारदीय नवरात्र के प्रथम दिन में वेदोक्त मंत्रोच्चार करते हुए कलश स्थापना का विशेष महत्व होता है। इसीलिए इसकी स्थापना शुभ मुहूर्त में करना फलदायी होगा।
कलश पूजन से सुख- समृद्धि, धन, वैभव, ऐश्वर्य, शांति, पारिवारिक उन्नति तथा रोग-शोक का नाश होता है। कलश-गणेश की पूजा से शारदीय नवरात्र का महाअनुष्ठान आरंभ हो जायेगा। इस बार चतुर्थी तिथि की वृद्धि और अष्टमी-नवमी एक दिन होने से पूरे दस दिन तक माता की आराधना होगी।
कलश स्थापना से मिलेगा सुख-समृद्धि
देवी पुराण के हवाले से कहा कि नवरात्र व्रत-पूजा में कलश स्थापन का विशेष महत्व है। कलश में ब्रह्मा, विष्णु, रूद्र, नवग्रहों, सभी नदियों, सागरों-सरोवरों, सातों द्वीपों, षोडश मातृकाओं, चौसठ योगिनियों सहित सभी तैंतीस करोड़ देवी-देवताओं का वास होता है।
धर्मशास्त्र में अनुसार, नवरात्र में कलश की पूजा करने से सुख- समृद्धि, धन, वैभव, ऐश्वर्य, शांति, पारिवारिक उन्नति तथा रोग-शोक का नाश होता है। कलश स्थापना आश्विन शुक्ल प्रतिपदा को अभिजीत मुहूर्त के करना श्रेयस्कर होगा।
महागौरी माता की दो दिन होगी पूजा
ज्योतिषाचार्य और विद्वानों के मुताबिक शारदीय नवरात्र के दौरान अष्टमी तिथि दो दिन होने से महागौरी माता की पूजा दो दिन होगी। आश्विन मास के शुक्लपक्ष की अष्टमी दो दिन 18 और 19 अक्टूबर को रहेगा। नवरात्र में अष्टमी का व्रत और माता श्रृंगार पूजा 18 अक्टूबर को होगा। इसीलिए इस बार शारदीय नवरात्र दस दिन का हो गया है। वहीं महासप्तमी 17 अक्टूबर को तथा महानवमी का व्रत एवं पूजन 20 अक्टूबर मंगलवार होगा।
नवरात्रि में मां दुर्गा का धरती पर आगमन
शारदीय नवरात्र में दौरान देवी दुर्गा स्वयं धरती पर आती है और भक्तों की प्रार्थनाएं सुनती है।.इसीलिए यह समय आत्मशुद्धि, साधना और देवी कृपा प्राप्त करने का श्रेष्ठ अवसर माना जाता है। सनातन धर्मावलंबियों नवरात्र के पहले दिन निराहार या फलाहार रहते हुए अपने घर, मंदिर व पूजा पंडालों में घट स्थापना के बाद दुर्गा सप्तशती, रामचरितमानस, सुंदरकांड, रामरक्षा स्त्रोत्र, दुर्गा सहस्त्र नाम, अर्गला, कवच, कील, सिद्ध कुंजिका स्त्रोत्र आदि का पाठ आरंभ करेंगे।
सप्तशती का पाठ सर्वदा कल्याणकारी
दुर्गा पूजा के दौरान दुर्गा सप्तशती व अन्य धार्मिक ग्रंथों के पाठ करने या संकल्प देकर योग्य ब्राह्मणों द्वारा करवाने से अनिष्ट ग्रहों से छुटकारा, रोग-शोक का नाश, पीड़ाओं से मुक्ति, धन-धान्य, ऐश्वर्य, ज्ञान, वैभव, कौशल में वृद्धि, पारिवारिक सौहार्द, समाजिक समरसता, आपसी प्रेम, निरोग काया तथा स्थिर लक्ष्मी की प्राप्ति होती है।
वार से होता है देवी के आगमन और गमन का निर्णय
देवी भागवत पुराण के अनुसार नवरात्र का पहला दिन और अंतिम दिन में जो वार होता है, उसी से देवी के आगमन एवं गमन का निर्णय होता है। नवरात्र के पहले दिन रविवार एवं सोमवार रहने पर देवी का आगमन गज पर, मंगलवार और शनिवार को घोड़ा पर, गुरुवार व शुक्रवार को डोला पर, बुधवार को नौका पर होता है।
नवरात्र के अंतिम दिन यानि विजयादशमी को रविवार और सोमवार होने पर देवी की विदाई महिष पर, मंगलवार और शनिवार को चरणायुध पर, बुधवार व शुक्रवार को हाथी पर, गुरुवार को नर वाहन पर होती है।
