UN : पिछले कुछ वर्षों में विश्व की परिस्थितियों को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि किसी क्षेत्र में युद्ध छिड़ जाने के बाद उसे समाप्त करना बेहद कठिन हो जाता है। संयुक्त राष्ट्र सहित अनेक अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ शांति और सुरक्षा बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध हैं, लेकिन विभिन्न क्षेत्रों में जारी संघर्ष उनकी प्रभावशीलता पर सवाल खड़े करते हैं। क्या मौजूदा वैश्विक व्यवस्था युद्धों को रोकने और उनका स्थायी समाधान निकालने में सफल हो रही है?
रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध इसका प्रमुख उदाहरण है। इस संघर्ष में बड़े पैमाने पर जान-माल का नुकसान हुआ है, लाखों लोग विस्थापित हुए हैं और बुनियादी ढाँचे को गंभीर क्षति पहुँची है। दूसरी ओर, पश्चिम एशिया में ईरान, अमेरिका और इज़राइल के बीच तनाव ने क्षेत्रीय शांति तथा वैश्विक स्थिरता को लेकर चिंताएँ बढ़ाई हैं।
इन संघर्षों का प्रभाव युद्धरत देशों तक सीमित नहीं रहता। ऊर्जा की कीमतों, अंतरराष्ट्रीय व्यापार, खाद्य पदार्थों की लागत और आपूर्ति शृंखलाओं पर पड़ने वाला दबाव अनेक देशों की अर्थव्यवस्थाओं को प्रभावित करता है। महँगाई बढ़ने से आम नागरिकों का जीवन कठिन होता है और सरकारों के सामने आर्थिक चुनौतियाँ तथा सामाजिक असंतोष बढ़ सकते हैं। एशिया में तनाव का एक महत्त्वपूर्ण पहलू होर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा है। यह समुद्री मार्ग वैश्विक तेल और प्राकृतिक गैस की आपूर्ति के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। यहाँ सैन्य तनाव, जहाजों पर हमले या समुद्री यातायात में गंभीर बाधा आने से अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार प्रभावित हो सकते हैं। कच्चे तेल और गैस की कीमतों में वृद्धि का असर परिवहन, विनिर्माण, बिजली उत्पादन और कृषि सहित अनेक क्षेत्रों पर पड़ता है। ईंधन महँगा होने से वस्तुओं और सेवाओं की लागत बढ़ सकती है, जिससे महँगाई पर दबाव पड़ता है और आर्थिक विकास धीमा होने का खतरा पैदा होता है। यदि ऊर्जा आपूर्ति लंबे समय तक बाधित रहती है, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था में मंदी की आशंकाएँ भी बढ़ सकती हैं। हालाँकि, तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का कारण केवल युद्ध नहीं होता। उत्पादन संबंधी निर्णय, वैश्विक माँग, भंडार की स्थिति और वित्तीय बाजार भी कीमतों को प्रभावित करते हैं। इसी प्रकार, अंतरराष्ट्रीय उड़ानों, व्यापार और निवेश पर संघर्षों का प्रभाव उनकी तीव्रता, अवधि और संबंधित देशों की नीतियों पर निर्भर करता है।
पश्चिम एशिया में सैन्य गतिविधियों और हवाई क्षेत्र संबंधी प्रतिबंधों के कारण उड़ानें प्रभावित हो सकती हैं, जबकि समुद्री मार्गों की असुरक्षा से जहाजरानी और व्यापार की लागत बढ़ सकती है। मिसाइलों, ड्रोन और आधुनिक सैन्य तकनीक के बढ़ते इस्तेमाल ने युद्ध की प्रकृति को भी बदल दिया है। किसी सैन्य कार्रवाई का प्रभाव संबंधित देशों की सीमाओं से बाहर तक पहुँच सकता है, विशेषकर तब, जब ऊर्जा प्रतिष्ठानों, सैन्य ठिकानों और प्रमुख समुद्री मार्गों की सुरक्षा खतरे में पड़ जाए।
पश्चिम एशिया में तनाव और कूटनीति की चुनौती
ईरान, अमेरिका और इज़राइल के बीच तनाव का समाधान केवल सैन्य दबाव से निकालना कठिन है। प्रतिबंधों, सैन्य कार्रवाइयों और जवाबी हमलों से तत्काल दबाव तो बनाया जा सकता है, लेकिन इससे राजनीतिक विवाद अपने आप समाप्त नहीं होते। लंबे समय तक संघर्ष जारी रहने पर नागरिकों की सुरक्षा, क्षेत्रीय स्थिरता और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर पड़ सकता है।
ईरान और अमेरिका के बीच बातचीत की संभावनाओं के संदर्भ में युद्धविराम, प्रतिबंधों में राहत, तेल निर्यात, जमी हुई संपत्तियों और होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही जैसे मुद्दे महत्त्वपूर्ण हो सकते हैं। हालाँकि, किसी विशेष प्रस्ताव, कथित शर्त या युद्धविराम योजना की स्थिति का आकलन करने से पहले संबंधित सरकारों के आधिकारिक वक्तव्यों और विश्वसनीय समाचार स्रोतों से पुष्टि करना आवश्यक है। अपुष्ट दावों को स्थापित तथ्य के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।
किसी भी संघर्ष में समझौते तक पहुँचना तब और कठिन हो जाता है, जब संबंधित पक्षों को यह आशंका हो कि बातचीत के दौरान भी उन पर हमला हो सकता है। इसलिए युद्धविराम की निगरानी, समझौतों के पालन की व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। स्थायी शांति के लिए केवल लड़ाई रोकना पर्याप्त नहीं है; इसके साथ विश्वास बहाली और सुरक्षा संबंधी चिंताओं का समाधान भी आवश्यक है।
रूस-यूक्रेन युद्ध और स्थायी शांति की तलाश
रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध का स्थायी समाधान अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने बड़ी चुनौती बना हुआ है। केवल अस्थायी युद्धविराम से दीर्घकालिक शांति सुनिश्चित नहीं की जा सकती। किसी भी समझौते में दोनों देशों की सुरक्षा संबंधी चिंताओं, क्षेत्रीय विवादों और भविष्य में संघर्ष दोबारा शुरू होने की आशंका पर विचार करना होगा।
रूस की सुरक्षा संबंधी दलीलें और उसके सैन्य उद्देश्य यूक्रेन की संप्रभुता तथा क्षेत्रीय अखंडता की माँग से टकराते रहे हैं। दूसरी ओर, यूक्रेन भविष्य में संभावित हमलों से बचाव के लिए भरोसेमंद सुरक्षा गारंटी चाहता है। विस्थापित नागरिकों की वापसी, युद्धबंदियों का प्रश्न और क्षतिग्रस्त बुनियादी ढाँचे का पुनर्निर्माण भी शांति प्रक्रिया के महत्त्वपूर्ण पहलू हैं। अमेरिका और अन्य अंतरराष्ट्रीय पक्षों के कूटनीतिक प्रयास तभी प्रभावी हो सकते हैं, जब वे तत्काल लड़ाई रोकने से आगे बढ़कर दीर्घकालिक समाधान की दिशा में काम करें। किसी वार्ता की वास्तविक स्थिति का आकलन करते समय यह देखना आवश्यक है कि संबंधित पक्ष किन प्रस्तावों पर सहमत हुए हैं और कौन-से मुद्दे अब भी विवादित हैं।
युद्धविराम अपने आप में शांति की गारंटी नहीं है। यदि उसके पीछे राजनीतिक समाधान, विश्वसनीय निगरानी और समझौते के उल्लंघन की स्थिति में कार्रवाई की स्पष्ट व्यवस्था न हो, तो संघर्ष दोबारा भड़क सकता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने चुनौती केवल युद्ध रुकवाने की नहीं, बल्कि टिकाऊ शांति स्थापित करने की भी है।
वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में भारत की विदेश नीति का एक महत्त्वपूर्ण आधार रणनीतिक स्वायत्तता और संवाद पर जोर देना रहा है। भारत विभिन्न देशों के साथ अपने संबंध बनाए रखते हुए अंतरराष्ट्रीय विवादों के शांतिपूर्ण समाधान की वकालत करता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह कथन कि “यह युद्ध का युग नहीं है”, संघर्षों के समाधान में बातचीत और कूटनीति को प्राथमिकता देने के भारत के व्यापक संदेश को दर्शाता है। रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया के तनाव के संदर्भ में भारत के सामने संतुलन बनाए रखने की चुनौती है। रूस के साथ उसके महत्त्वपूर्ण रणनीतिक और आर्थिक संबंध हैं, वहीं अमेरिका, इज़राइल और खाड़ी देशों के साथ भी व्यापक हित जुड़े हुए हैं। इसलिए भारत की नीति को केवल किसी एक पक्ष का समर्थन या विरोध मानकर नहीं देखा जा सकता। इसमें राष्ट्रीय हितों, ऊर्जा सुरक्षा, क्षेत्रीय स्थिरता और भारतीय नागरिकों की सुरक्षा जैसे अनेक पहलू शामिल हैं। बड़े संघर्ष के दौरान उनकी सुरक्षा भारत की प्राथमिक चिंताओं में शामिल हो जाती है। इसके अतिरिक्त, भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए आयात पर काफी हद तक निर्भर है। यदि होर्मुज जलडमरूमध्य या लाल सागर जैसे प्रमुख समुद्री मार्गों पर यातायात बाधित होता है, तो इसका असर भारत के आयात बिल, परिवहन लागत और घरेलू महँगाई पर पड़ सकता है। भारत के लिए आवश्यक है कि अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्ग सुरक्षित और खुले रहें तथा नागरिकों और नागरिक बुनियादी ढाँचे को निशाना बनाने से बचा जाए। साथ ही, ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाना, आपूर्ति शृंखलाओं को मजबूत करना और आर्थिक जोखिमों से निपटने की तैयारी जारी रखना भी महत्त्वपूर्ण है। युद्ध और ऊर्जा संकट का बोझ अक्सर उन देशों पर अधिक पड़ता है, जिनके पास महँगे आयात, खाद्य असुरक्षा और आर्थिक झटकों से निपटने के सीमित साधन होते हैं। ऐसे में भारत संवाद को प्रोत्साहित करने और वैश्विक संस्थाओं को अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं में सुधार की आवश्यकता पर लंबे समय से चर्चा होती रही है। बदलती वैश्विक शक्ति-संरचना के अनुरूप निर्णय लेने की प्रक्रिया को अधिक प्रतिनिधिक और प्रभावी बनाना आवश्यक है। लेकिन संस्थागत सुधार अपने आप में पर्याप्त नहीं होंगे। सदस्य देशों की राजनीतिक इच्छाशक्ति और अंतरराष्ट्रीय नियमों के प्रति प्रतिबद्धता भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण है।
अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ संवाद के मंच उपलब्ध करा सकती हैं, मानवीय सहायता के प्रयासों को समन्वित कर सकती हैं और संघर्षों को कम करने के लिए दबाव बना सकती हैं। फिर भी, जब प्रमुख शक्तियों के हित आपस में टकराते हैं या देश समझौतों का पालन करने से पीछे हटते हैं, तो इन संस्थाओं की प्रभावशीलता सीमित हो जाती है। यही कारण है कि युद्धों को रोकने के लिए अंतरराष्ट्रीय नियमों के साथ-साथ उनके निष्पक्ष अनुपालन की व्यवस्था भी जरूरी है। ईरान-अमेरिका तनाव और रूस-यूक्रेन युद्ध यह संकेत देते हैं कि आधुनिक विश्व में सैन्य शक्ति के बावजूद स्थायी शांति स्थापित करना आसान नहीं है। मिसाइलों, ड्रोन और आर्थिक प्रतिबंधों के माध्यम से दबाव बनाया जा सकता है, लेकिन राजनीतिक विवादों का समाधान केवल इन उपायों से संभव नहीं है। संघर्ष लंबा खिंचने पर उसका सबसे अधिक बोझ आम नागरिकों को उठाना पड़ता है।
अंतरराष्ट्रीय समुदाय को सैन्य तनाव कम करने, मानवीय सहायता पहुँचाने, नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और विश्वसनीय वार्ता के लिए परिस्थितियाँ बनाने पर ध्यान देना चाहिए। संबंधित पक्षों के बीच संवाद, भरोसेमंद मध्यस्थता और समझौतों के पालन की स्पष्ट व्यवस्था शांति प्रक्रिया को मजबूत कर सकती है।
अंततः सवाल यह है कि क्या दुनिया बार-बार युद्ध छिड़ने के बाद शांति स्थापित करने की कोशिश करती रहेगी, या ऐसे प्रभावी तंत्र विकसित कर पाएगी, जो संघर्षों को बड़े युद्ध में बदलने से पहले रोक सकें? इसका उत्तर अंतरराष्ट्रीय नेतृत्व की इच्छाशक्ति, देशों की आपसी समझ और वैश्विक संस्थाओं की प्रभावशीलता पर निर्भर करेगा। दुनिया को ऐसी व्यवस्था की आवश्यकता है, जिसमें सैन्य टकराव के बजाय संवाद को प्राथमिकता मिले और राजनीतिक मतभेदों का समाधान मानवता की सुरक्षा को ध्यान में रखकर किया जाए। युद्ध का अंत केवल हथियारों की खामोशी नहीं है; वास्तविक शांति तभी स्थापित होती है, जब भय, असुरक्षा और संघर्ष के मूल कारणों को दूर करने के लिए ठोस प्रयास किए जाएँ। आज वैश्विक समुदाय के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह तात्कालिक राजनीतिक लाभ से ऊपर उठकर दीर्घकालिक शांति और मानवीय सुरक्षा को प्राथमिकता दे।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं।)