Crude Price Hike :मध्य पूर्व में तनाव अब खुले युद्ध में बदल चुका है। अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर बड़े पैमाने पर सैन्य हमले शुरू कर दिए हैं, जिसमें तेहरान समेत कई शहरों में विस्फोट की खबरें हैं। इस घटना ने वैश्विक तेल बाजार में हड़कंप मचा दिया है। क्रूड ऑयल की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं और दुनिया भर के निवेशक व आम लोग इस बात से चिंतित हैं कि क्या यह आग भारत की जेब तक पहुंच जाएगी? भारत अपनी जरूरत का 85% से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है, और इसमें से बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों (सऊदी अरब, UAE, इराक आदि) से आता है, जो होर्मुज स्ट्रेट से गुजरता है।
ईरान: एक प्रमुख तेल उत्पादक देश
अमेरिकी प्रतिबंधों की मार झेलने के बावजूद ईरान आज भी दुनिया के शीर्ष 10 तेल उत्पादकों में शामिल है। ‘ओपेक’ (OPEC) के आंकड़ों के अनुसार, ईरान वर्तमान में लगभग 3.1 मिलियन बैरल प्रतिदिन तेल का उत्पादन करता है। ग्लोबल रिस्क मैनेजमेंट के मुख्य विश्लेषक अर्ने लोहमैन रासमुसेन के अनुसार, 1974 में ईरान अमेरिका और सऊदी अरब के बाद दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक था (6 मिलियन बैरल प्रतिदिन)। ईरान के पास दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चे तेल का भंडार है। सालों के कड़े अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद, इसके तेल उद्योग की स्थिति वेनेजुएला जैसे देशों से काफी बेहतर है।
होर्मुज जलडमरूमध्य: सबसे बड़ा खतरा
तेल बाजार के लिए सबसे बड़ा जोखिम होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकेबंदी है, जिसे ठप करने की धमकी ईरान अक्सर देता रहा है। यह मध्य पूर्व के अमीर तेल उत्पादक देशों को शेष विश्व से जोड़ने वाला मुख्य समुद्री मार्ग है। अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन (EIA) के अनुसार, 2024 में इस मार्ग से प्रतिदिन लगभग 20 मिलियन बैरल कच्चा तेल गुजरा, जो वैश्विक खपत का करीब 20 प्रतिशत है। यह जलमार्ग काफी संकरा (लगभग 50 किलोमीटर चौड़ा) और उथला (अधिकतम 60 मीटर गहरा) है।
इस मार्ग पर सुरक्षा को लेकर जरा सा भी संदेह होने पर जहाजों के बीमा प्रीमियम में भारी उछाल आ सकता है। सैक्सो बैंक के विश्लेषक ओले हैनसेन के अनुसार, केवल सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के पास ही वैकल्पिक (बाईपास) बुनियादी ढांचा है, जिसकी अधिकतम क्षमता मात्र 2.6 मिलियन बैरल प्रतिदिन है।
अत्यधिक लाभदायक तेल और चीन पर निर्भरता
ईरान वर्तमान में 1.3 से 1.5 मिलियन बैरल प्रतिदिन निर्यात करता है। अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण इसका 80% से अधिक हिस्सा बाजार मूल्य से कम कीमत पर चीनी रिफाइनरियों मुख्यतः स्वतंत्र टीपॉट रिफाइनरियों को जाता है।
ड्रैगन इस वैश्विक संकट को एक बड़े कारोबारी मौके की तरह इस्तेमाल कर रहा है। आइए समझते हैं कि आखिर पर्दे के पीछे क्या चल रहा है और आपकी रसोई से लेकर रोजमर्रा के खर्चों पर इसका क्या असर होगा।
युद्ध की आड़ में चीन ने कैसे भर ली अपनी तिजोरी?
जब पूरी दुनिया संभावित आर्थिक नुकसान से डरी हुई है, तब चीन चुपचाप अपनी ऊर्जा तिजोरी भरने में जुटा है। हाल के दिनों में चीन ने रूस, सऊदी अरब और ईरान से बड़े पैमाने पर कच्चा तेल खरीदा है। सऊदी अरब की प्रमुख ऑयल शिपिंग कंपनी ‘बहरी’ ने चीन को पांच विशाल सुपरटैंकर भेजे हैं, जो पिछले छह महीनों में सबसे बड़ी खेप है।
बात सिर्फ यहीं खत्म नहीं होती। सऊदी अरब ने अगले महीने चीन को 8 मिलियन बैरल अतिरिक्त तेल भेजने की तैयारी कर ली है। अमेरिका के साथ बढ़ती तल्खी के बीच ईरान ने भी चीन को तेल की सप्लाई कई गुना तेज कर दी है। 15 से 20 फरवरी के बीच ईरान का क्रूड निर्यात 200 फीसदी उछलकर 20 मिलियन बैरल पर पहुंच गया। यह रोजाना करीब 3 मिलियन बैरल बैठता है, जो ईरान के सामान्य एक्सपोर्ट से कहीं ज्यादा है। सैटेलाइट तस्वीरों ने भी इस बात पर मुहर लगाई है कि ईरानी बंदरगाहों पर तेल टैंकरों की संख्या 8 से बढ़कर 18 हो गई है। पिछले साल अमेरिकी हमले से पहले और 2024 की शुरुआत में भी ईरान ने बिल्कुल ऐसा ही पैटर्न अपनाया था।
भारत के लिए खतरे की घंटी, जेब पर कैसे पड़ेगी मार?
यह पूरी उथल-पुथल भारत के लिए एक बड़ा अलर्ट है। पिछले कारोबारी सत्र में ब्रेंट क्रूड 2.03 डॉलर (2.87 फीसदी) की तेजी के साथ 72.87 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर बंद हुआ। अगर होर्मुज का रास्ता बंद होता है और तेल 95 से 110 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचता है, तो इसका सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।
भारत अपनी कुल तेल जरूरत का लगभग 85 फीसदी हिस्सा विदेशों से आयात करता है। चिंता की बात यह है कि हमारे देश का आधे से ज्यादा तेल इसी प्रभावित रास्ते से आता है। कच्चे तेल के महंगे होने का सीधा मतलब है कि भारत में पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ेंगे। ईंधन महंगा होने से माल ढुलाई का खर्च बढ़ेगा, जिससे राशन, सब्जियां और रोजमर्रा की सभी चीजों की कीमतों में उछाल आएगा।
भारत पर असर को विस्तार से समझिए
अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए इस सैन्य हमले का भारत पर बहुत गहरा और बहुआयामी असर पड़ सकता है। भारत अपनी कच्चे तेल की कुल जरूरत का लगभग 85% आयात करता है, इसलिए मध्य पूर्व में कोई भी अस्थिरता सीधे भारत की ऊर्जा सुरक्षा और व्यापक आर्थिक स्थिरता को चुनौती देती है। इस भू-राजनीतिक संकट का भारत की अर्थव्यवस्था और आम आदमी की जेब पर पड़ने वाला संभावित असर-
पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर सीधा असर
वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमत अगर $100 प्रति बैरल के पार जाती है, तो भारतीय तेल विपणन कंपनियों (OMCs) की रिफाइनिंग लागत में भारी वृद्धि होगी। यदि सरकार उत्पाद शुल्क में कटौती करके इस झटके को खुद नहीं सहती है, तो पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में प्रति लीटर ₹5 से ₹10 तक का उछाल आ सकता है। बता दें कि यह महज अनुमान है। सरकार की ओर से कुछ भी आदेश नहीं आया है।
रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भारत ने रूसी तेल का लाभ उठाया था, लेकिन यदि लाल सागर और होर्मुज जलडमरूमध्य में युद्ध के कारण जहाजों की आवाजाही बाधित होती है, तो माल ढुलाई और बीमा लागत इतनी बढ़ जाएगी कि कोई भी रियायती तेल अंततः महंगा ही पड़ेगा।
भारतीय अर्थव्यवस्था पर व्यापक प्रभाव
डीजल की कीमतें बढ़ने से देश भर में माल ढुलाई और ट्रांसपोर्टेशन महंगा हो जाएगा। इसका सीधा असर रोजमर्रा की चीजों, एफएमसीजी (FMCG) उत्पादों, फलों और सब्जियों की कीमतों पर पड़ेगा, जिससे खुदरा महंगाई दर (CPI) भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के निर्धारित लक्ष्य से ऊपर जा सकती है।
तेल महंगा होने से भारत को आयात के लिए अधिक डॉलर खर्च करने होंगे। इससे भारत का ‘करंट अकाउंट डेफिसिट’ (चालू खाता घाटा) बढ़ेगा और डॉलर की बढ़ती मांग के कारण भारतीय रुपये में भारी गिरावट आ सकती है। रुपया कमजोर होने से इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स से लेकर खाने का तेल तक, हर आयातित वस्तु महंगी हो सकती हैं।
सामरिक और कूटनीतिक चुनौतियां
होर्मुज जलडमरूमध्य से भारत का एक बड़ा तेल आयात होता है। इसके बाधित होने की स्थिति में भारत को अपने सामरिक पेट्रोलियम भंडार (SPR) पर निर्भर होना पड़ेगा, जो फिलहाल केवल कुछ ही दिनों की आपातकालीन आपूर्ति सुनिश्चित कर सकते हैं। भारत ने ईरान के चाबहार बंदरगाह में भारी रणनीतिक निवेश किया है, जो मध्य एशिया तक पहुंचने का एक अहम मार्ग है। इस क्षेत्र में युद्ध की स्थिति भारत के ‘इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर’ (INSTC) प्रोजेक्ट को भी अधर में डाल सकती है। इस अस्थिरता के कारण अरब सागर और हिंद महासागर क्षेत्र में व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा एक बड़ी चुनौती बन जाएगी, जिससे भारतीय नौसेना को अपनी गश्त और रणनीतिक तैनाती को और मजबूत करना पड़ेगा।
