Middle East War : महायुद्ध का महासंकट: क्या खत्म हो गया अमेरिका का ‘प्रोटेक्टिव अंब्रेला’?

Madhukar Srivastava
  • ​मिडिल ईस्ट की बर्बादी, पेट्रो-डॉलर का अंत और सोने की सेल – बदल रहा है दुनिया का नक्शा!
  • मिडिल ईस्ट में महायुद्ध का नया मोड़: अमेरिका-इजरायल की जंग, लेकिन कीमत चुका रहे गल्फ देश!

•• तेल, सोना और डॉलर की जंग ने बदली वैश्विक ताकत की दिशा

Middle East War : मिडिल ईस्ट में ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच जारी संघर्ष अब सिर्फ सैन्य युद्ध नहीं रह गया है, बल्कि यह तेल, डॉलर और वैश्विक अर्थव्यवस्था की जंग बनता जा रहा है। ईरान लगातार खाड़ी देशों के एयरपोर्ट, तेल रिफाइनरी और बड़े होटल इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बना रहा है, जिससे पूरे क्षेत्र में टूरिज्म, व्यापार और ट्रांसपोर्ट लगभग ठप हो चुका है।

गल्फ देशों की अर्थव्यवस्था पर सीधा वार

युद्ध के कारण यूएई, कतर और अन्य खाड़ी देशों की लगभग 90% फ्लाइट्स प्रभावित हो चुकी हैं। स्ट्रेट ऑफ़ हॉर्मुज़ में संकट के कारण तेल निर्यात बाधित है और अरब देशों की सबसे बड़ी कमाई का स्रोत लगभग बंद हो गया है। बढ़ती महंगाई, इंश्योरेंस प्रीमियम और स्टोरेज कॉस्ट ने व्यापार को और मुश्किल बना दिया है।

युद्ध ईरान-अमेरिका का, बलि चढ़ रहे खाड़ी देश!

​इतिहास गवाह है कि युद्ध की आग हमेशा पड़ोसियों को झुलसाती है। अमेरिका और इजरायल की ईरान से जंग ने पूरे मिडिल ईस्ट को ‘डेथ ज़ोन’ में बदल दिया है। ईरान के हमलों ने केवल सैन्य ठिकानों को ही नहीं, बल्कि खाड़ी देशों की लाइफलाइन—एयरपोर्ट्स, होटल्स और तेल रिफाइनरियों—को भी निशाना बनाया है।

पेट्रो-डॉलर सिस्टम पर खतरा

दशकों से गल्फ देशों और अमेरिका के बीच एक समझौता था—सुरक्षा के बदले तेल सिर्फ डॉलर में बेचना और डॉलर को अमेरिकी अर्थव्यवस्था में निवेश करना।
इसी कारण सऊदी अरब, यूएई और कतर जैसे देशों ने अमेरिकी बॉन्ड, रियल एस्टेट और बड़ी टेक कंपनियों में भारी निवेश किया।

गोल्ड मार्केट में भूचाल: दुबई में 30% डिस्काउंट!

​जिस दुबई को ‘सिटी ऑफ गोल्ड’ कहा जाता है, वहां आज सोना डिस्काउंट पर मिल रहा है। यह कोई सेल नहीं, बल्कि मजबूरी और डर का संकेत है।

  • ​पैरालाइज्ड इकोनॉमी: ट्रांसपोर्ट और बिजनेस ठप होने से लिक्विडिटी का संकट।
  • ​स्टोरेज और इंश्योरेंस: बढ़ते प्रीमियम और स्टोरेज फीस ने व्यापारियों की कमर तोड़ दी है।
  • ​ट्रेडर का पलायन: सुरक्षित गलियारों के अभाव में अंतरराष्ट्रीय खरीदार गायब हैं।

पेट्रो-डॉलर का पतन: $2.3 ट्रिलियन की ‘विदाई’

गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल (GCC) के देशों ने संकेत दिया है कि वे अमेरिका में किए गए लगभग 2.3 ट्रिलियन डॉलर के निवेश को वापस निकालने पर विचार कर रहे हैं। अगर ऐसा हुआ तो यह डॉलर और अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा झटका साबित हो सकता है।

​दशकों पुराना ‘सुरक्षा के बदले डॉलर’ का समझौता अब कागज का टुकड़ा मात्र रह गया है।
1.​धोखे का एहसास: खाड़ी देशों (GCC) को समझ आ गया है कि अमेरिका उन्हें ढाल की तरह इस्तेमाल कर रहा है।

2.​ डी-डॉलरलाइजेशन (De-Dollarization): सऊदी अरब, UAE और कतर ने अमेरिका में किए गए अपने 2.3 ट्रिलियन डॉलर के निवेश को वापस खींचने की चेतावनी दी है।

3.​ इकोनॉमिक रीटेलियेशन: डॉलर और बॉन्ड्स को एक ‘जियो-पोलिटिकल लीवर’ की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। अगर सुरक्षा नहीं, तो डॉलर का साथ भी नहीं।

ठप हुआ ग्लोबल ट्रेड: होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) बंद!

​दुनिया की रगों में दौड़ने वाला तेल अब रुक गया है।

  • ​UAE और कतर की 90% फ्लाइट्स रद्द हैं।
  • ​शिपिंग रूट्स बंद होने से सप्लाई चेन पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है।
  • ​खाड़ी देशों का राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit) आसमान छू रहा है क्योंकि आय के दोनों मुख्य स्रोत—तेल और पर्यटन—मरणशय्या पर हैं।

ऐतिहासिक बदलाव: ग्लोबल पावर शिफ्ट

​अब खाड़ी देश अमेरिका के सामने गिड़गिड़ा नहीं रहे, बल्कि शर्तें रख रहे हैं।
​”या तो एंटी-मिसाइल सिस्टम और फाइटर जेट्स दो, या फिर डॉलर के साम्राज्य के पतन के लिए तैयार रहो।”
​यह एक नए युग की शुरुआत है जहाँ अरब देशों ने अपनी वित्तीय ताकत को हथियार बना लिया है। अगर अमेरिका ने तुरंत कदम नहीं उठाए, तो वॉशिंगटन में आने वाला आर्थिक संकट दुनिया ने पहले कभी नहीं देखा होगा।

मध्य पूर्व अब अमेरिका का ‘पार्किंग लॉट’ नहीं रहा। सुरक्षा के अभाव में डॉलर का गिरना तय है और सोने की यह भारी सेल दरअसल एक पुराने साम्राज्य के अंत की घोषणा है।

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