Jharkhand : ममता की अटूट डोर: 20 साल बाद मिला मां का पता, पति ने ठुकराया पर बेटे ने खोल दी अपनी बांहें

Bindash Bol

* 20 साल बाद लौटी मां… पति ने ठुकराया, बेटे ने कहा — “मां, अब मैं हूं न”

* लापता मां, अधूरा बचपन और इंतजार के 20 साल… अब खत्म होगा ममता का वनवास

जितेंद्र सिंह

Jharkhand : वक्त की धूल कितनी भी गहरी क्यों न हो, ममता की खुशबू कभी फीकी नहीं पड़ती। झारखंड के धनबाद से निकलकर आई यह कहानी किसी फिल्मी पटकथा जैसी लग सकती है, लेकिन इसके पीछे छिपे आंसू और उम्मीदें बिल्कुल असली हैं। यह कहानी है एक ऐसे बेटे की, जिसकी आंखों का इंतजार 20 साल बाद खत्म होने को है, और एक ऐसी मां की, जो अपनों के होते हुए भी दो दशकों तक बेघर रही।

यादों के धुंधलके से हकीकत तक का सफर

​दो दशक पहले, पूर्वी टुंडी के कांशीटांड़ गांव से कबली देवी अचानक लापता हो गई थीं। एक छोटा बच्चा, जिसने अपनी मां की उंगली थामकर चलना सीखा था, रातों-रात अनाथ सा हो गया। पति राजू मुर्मू ने कुछ साल इंतजार किया, फिर उन्हें मृत मानकर अपनी नई दुनिया बसा ली। समय बीतता गया, और कबली देवी का नाम गांव की चर्चाओं से लगभग मिट चुका था।
​लेकिन कुदरत को कुछ और ही मंजूर था। हाल ही में खबर आई कि कबली देवी सात समंदर पार नहीं, बल्कि देश के दूसरे कोने केरल के एक सरकारी आश्रय गृह में सुरक्षित हैं। 20 साल बाद जब यह खबर धनबाद पहुंची, तो लगा जैसे वक्त ठहर गया हो।

जब रिश्तों ने मुंह मोड़ा, तो ममता की जीत हुई

​इस कहानी का सबसे विचलित कर देने वाला पहलू तब सामने आया जब पति राजू मुर्मू ने उन्हें वापस अपनाने से इनकार कर दिया। पुरानी यादों और बीते कल को पीछे छोड़ चुके पति के लिए अब कबली देवी महज एक ‘अतीत’ बन चुकी थीं। पर कहते हैं न कि पिता केवल रक्षक होता है, लेकिन बेटा मां का अंश होता है।
​जवान हो चुके बेटे समर मुर्मू ने जब सुना कि उसकी मां जिंदा है, तो उसकी आंखों से आंसू छलक पड़े। पिता के इनकार ने उसे कमजोर नहीं, बल्कि और भी अडिग बना दिया।

“अगर मेरे पिता के घर के दरवाजे उनके लिए बंद हैं, तो मैं अपनी मां के लिए नया घर बनाऊंगा। मेरी दुनिया तो उन्हीं से शुरू हुई थी।”  — समर मुर्मू, कबली देवी का पुत्र

‘मां, मैं हूं न…’

​समर मुर्मू की जिद और प्यार ने आज पूरे प्रशासनिक अमले को झकझोर दिया है। उसने प्रशासन से गुहार लगाई है कि उसकी मां को केरल से वापस लाया जाए। समर का कहना है कि उसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि 20 साल पहले क्या हुआ था या आज उसके पिता क्या सोचते हैं; उसे बस अपनी मां चाहिए। वह उनकी सेवा करना चाहता है और उन खाली बरसों को प्यार से भरना चाहता है जो उन्होंने अकेलेपन में गुजारे।

प्रशासन की पहल और उम्मीद की किरण

​बेटे की इस भावुक अपील पर धनबाद प्रशासन ने भी तत्परता दिखाई है। मां-बेटे को मिलाने की कागजी और कानूनी प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। जिला प्रशासन अब केरल के उस आश्रय गृह से संपर्क साध रहा है ताकि जल्द से जल्द कबली देवी को उनके बेटे की गोद में वापस लाया जा सके।

यह कहानी हमें सिखाती है कि रिश्ते केवल खून के नहीं, बल्कि भावनाओं के होते हैं। जहां एक तरफ पति ने सामाजिक और व्यक्तिगत कारणों से पल्ला झाड़ लिया, वहीं एक बेटे ने यह साबित कर दिया कि ‘मां’ शब्द का कर्ज कभी चुकाया नहीं जा सकता। अब पूरे धनबाद की निगाहें उस मोड़ पर टिकी हैं, जब समर अपनी मां के गले लगेगा और 20 साल का लंबा वनवास खत्म होगा। यह महज एक वापसी नहीं, बल्कि ममता के विश्वास की जीत होगी।

TAGGED:
Share This Article
Leave a Comment